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सीखें: वैदिक ज्योतिष, सरल भाषा में

हर पन्ना शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान करके लिखा गया है, और हर बात के साथ उसका आधार लिखा है।

यह वैदिक ज्योतिष की लाइब्रेरी है, सरल भाषा में: 27 नक्षत्र, 12 राशियाँ, 9 ग्रह, 12 भाव, 16 वर्ग कुंडलियाँ, दशा, योग, दोष, पंचांग, संस्कार, त्योहार और उपाय। हर पन्ने पर उसके आधार ग्रंथ लिखे हैं, और कुंडली सहेजी हो तो आपकी अपनी स्थिति उसी पन्ने पर दिखती है।

349 पन्ने

छूकर समझिए

महादशा "जीवन-नदी" →

दशा-शेष का स्लाइडर →

भारत की कुंडली: 15 अगस्त 1947 →

ज्योतिष शब्दकोश →

नक्षत्र · 27 पन्ने

नक्षत्र

अश्विनी नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

अश्विनी 27 नक्षत्रों में पहला है और पूरी तरह मेष राशि में आता है। इसके स्वामी केतु और देवता अश्विनी कुमार हैं; परंपरा इसे नई शुरुआत, फुर्ती...

नक्षत्र

भरणी नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

भरणी 27 नक्षत्रों में दूसरा है और पूरी तरह मेष राशि में आता है। इसके स्वामी शुक्र और देवता धर्मराज (यम) हैं; परंपरा इसे ज़िम्मेदारी उठाने, ग...

नक्षत्र

कृत्तिका नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

कृत्तिका 27 नक्षत्रों में तीसरा है; इसका पहला चरण मेष में और बाकी तीन वृषभ में आते हैं। इसके स्वामी सूर्य और देवता अग्नि हैं; परंपरा इसे स्प...

नक्षत्र

रोहिणी नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

रोहिणी 27 नक्षत्रों में चौथा है और पूरी तरह वृषभ राशि में आता है। इसके स्वामी चंद्र और देवता ब्रह्मा (प्रजापति) हैं; परंपरा इसे बढ़त, सुंदरत...

नक्षत्र

मृगशिरा नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

मृगशिरा 27 नक्षत्रों में पाँचवाँ है; इसके पहले दो चरण वृषभ में और बाकी दो मिथुन में आते हैं। इसके स्वामी मंगल और देवता चंद्रमा (सोम) हैं; पर...

नक्षत्र

आर्द्रा नक्षत्र: स्वामी, देवता, स्वभाव और नामाक्षर

आर्द्रा 27 नक्षत्रों में छठा है और पूरी तरह मिथुन राशि में आता है। इसके स्वामी राहु और देवता रुद्र हैं; परंपरा इसे गहरी सोच, सवाल करने और बद...

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राशियाँ · 12 पन्ने

राशियाँ

मेष राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

मेष राशिचक्र की पहली राशि है, जिसके स्वामी मंगल हैं और तत्व अग्नि। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और मेष लग्न...

राशियाँ

वृषभ राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

वृषभ राशिचक्र की दूसरी राशि है, जिसके स्वामी शुक्र हैं और तत्व पृथ्वी। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और वृषभ...

राशियाँ

मिथुन राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

मिथुन राशिचक्र की तीसरी राशि है, जिसके स्वामी बुध हैं और तत्व वायु। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और मिथुन लग...

राशियाँ

कर्क राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

कर्क राशिचक्र की चौथी राशि है, जिसके स्वामी चंद्र हैं और तत्व जल। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और कर्क लग्न...

राशियाँ

सिंह राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

सिंह राशिचक्र की पाँचवीं राशि है, जिसके स्वामी सूर्य हैं और तत्व अग्नि। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और सिंह...

राशियाँ

कन्या राशि: स्वभाव, नक्षत्र और नामाक्षर

कन्या राशिचक्र की छठी राशि है, जिसके स्वामी बुध हैं और तत्व पृथ्वी। यहाँ इसका स्वभाव परंपरा के अनुसार, इसके नक्षत्र, नौ नामाक्षर और कन्या लग...

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ग्रह · 9 पन्ने

ग्रह

सूर्य: आत्मविश्वास और रोशनी का ग्रह

सूर्य नवग्रहों में केंद्र माना जाता है। परंपरा इसे आत्मविश्वास, पिता, अधिकार और जीवन की रोशनी से जोड़ती है। इस पेज पर उसकी राशियाँ, षड्बल और...

ग्रह

चंद्र: मन और भावनाओं का ग्रह

चंद्र जिस राशि में होता है, वही आपकी चंद्र राशि है, और जिस नक्षत्र में होता है वही जन्म-नक्षत्र। परंपरा चंद्र को मन, माँ और भावनाओं से जोड़त...

ग्रह

मंगल: साहस और ऊर्जा का ग्रह

मंगल को परंपरा साहस, ऊर्जा, पहल और भाई-बहनों से जोड़ती है। इस पेज पर मंगल को एक ग्रह के रूप में समझते हैं: उसकी राशियाँ, दृष्टि, षड्बल और मह...

ग्रह

बुध: बुद्धि और बातचीत का ग्रह

बुध को परंपरा बुद्धि, वाणी, हिसाब-किताब और सीखने से जोड़ती है। इस पेज पर उसकी राशियाँ, षड्बल और 17 वर्ष की महादशा सरल भाषा में हैं।

ग्रह

गुरु: ज्ञान और मार्गदर्शन का ग्रह

गुरु, जिन्हें गुरु भी कहते हैं, को परंपरा ज्ञान, धर्म, शिक्षक और संतान से जोड़ती है। इस पेज पर उनकी राशियाँ, दृष्टि, षड्बल और महादशा सरल...

ग्रह

शुक्र: प्रेम, कला और सौंदर्य का ग्रह

शुक्र को परंपरा प्रेम, कला, सौंदर्य और जीवन के सुख से जोड़ती है। इसकी महादशा 20 वर्ष की है, जो नौ दशाओं में सबसे लंबी है।

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भाव · 12 पन्ने

भाव

पहला भाव: लग्न, यानी तनु भाव

पहला भाव, यानी लग्न या तनु भाव, कुंडली का शुरुआती बिंदु है। परंपरा इसे स्वभाव, दुनिया से मिलने के ढंग और जीवन की सामान्य दिशा से जोड़ती है;...

भाव

दूसरा भाव: धन भाव

दूसरा भाव, यानी धन भाव, परंपरा में जमा पूँजी, परिवार, वाणी और खान-पान से जुड़ा है। परंपरा इसे संजोने का भाव मानती है, किसी रकम का नहीं।

भाव

तीसरा भाव: सहज या पराक्रम भाव

तीसरा भाव, यानी सहज या पराक्रम भाव, परंपरा में साहस, अपनी मेहनत, छोटे भाई-बहन और बातचीत से जुड़ा है। यह उपचय भाव है, जिसे परंपरा समय के साथ...

भाव

चौथा भाव: सुख या बंधु भाव

चौथा भाव, यानी सुख या बंधु भाव, परंपरा में घर, माँ, ज़मीन-मकान, वाहन और मन की शांति से जुड़ा है। यह केंद्र भाव है और कुंडली की तली में, जड़ो...

भाव

पाँचवाँ भाव: पुत्र या विद्या भाव

पाँचवाँ भाव, यानी पुत्र या विद्या भाव, परंपरा में संतान, बुद्धि, पढ़ाई, रचनात्मकता और पूर्व पुण्य से जुड़ा है। यह त्रिकोण भाव है, जिसे परंपर...

भाव

षष्ठ भाव: सेवा, ऋण और प्रतिस्पर्धा

छठा भाव परंपरा में सेवा, रोज़ की दिनचर्या, ऋण और प्रतिस्पर्धा से जुड़ा है। इसका पुराना नाम रिपु भाव है, पर इसका असली अर्थ है चुनौतियों का सा...

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वर्ग कुंडलियाँ · 16 पन्ने

वर्ग कुंडलियाँ

अक्षवेदांश (D45): सामान्य विचार, और बाद की परंपरा में पिता की ओर की विरासत

अक्षवेदांश (D45) हर राशि को 40 कला के पैंतालीस भागों में बाँटता है। पराशर इसे सब तरह के विचार से जोड़ते हैं, और बाद की परंपरा इसमें पिता की...

वर्ग कुंडलियाँ

चतुर्थांश (D4): घर, संपत्ति और भाग्य का वर्ग

चतुर्थांश (D4) हर राशि को 7°30′ के चार भागों में बाँटता है। ये भाग उसी राशि और उससे चौथी, सातवीं, दसवीं राशि में जाते हैं, और परंपरा इसे घर,...

वर्ग कुंडलियाँ

चतुर्विंशांश (D24): विद्या और पढ़ाई का वर्ग

चतुर्विंशांश (D24), जिसे सिद्धांश भी कहते हैं, हर राशि को 1°15′ के चौबीस भागों में बाँटता है। परंपरा इसे विद्या, पढ़ाई और ज्ञान से जोड़ती है...

वर्ग कुंडलियाँ

दशमांश (D10): काम और करियर का वर्ग

दशमांश (D10) हर राशि को 3-3 अंश के दस भागों में बाँटता है। परंपरा इसे काम, करियर और समाज में पद से जोड़ती है, और इसे दसवें भाव के साथ पढ़ती...

वर्ग कुंडलियाँ

द्रेष्काण (D3): भाई-बहन और साहस का वर्ग

द्रेष्काण (D3) हर राशि को 10-10 अंश के तीन भागों में बाँटता है। पराशर की विधि में ये भाग उसी राशि, उससे पाँचवीं और नौवीं राशि में जाते हैं,...

वर्ग कुंडलियाँ

द्वादशांश (D12): माता-पिता का वर्ग

द्वादशांश (D12) हर राशि को 2°30′ के बारह भागों में बाँटता है, जो उसी राशि से क्रम से चलते हैं। परंपरा इसे माता-पिता और उनसे मिली विरासत से ज...

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महादशा और अंतर्दशा · 81 पन्ने

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में केतु अंतर्दशा

केतु की महादशा में केतु की अंतर्दशा को केतु–केतु दशा भी कहते हैं।

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में शुक्र अंतर्दशा

केतु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा को केतु–शुक्र दशा भी कहते हैं।

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में सूर्य अंतर्दशा

केतु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा को केतु–सूर्य दशा भी कहते हैं।

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में चंद्र अंतर्दशा

केतु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा को केतु–चंद्र दशा भी कहते हैं।

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में मंगल अंतर्दशा

केतु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा को केतु–मंगल दशा भी कहते हैं।

महादशा और अंतर्दशा

केतु महादशा में राहु अंतर्दशा

केतु की महादशा में राहु की अंतर्दशा को केतु–राहु दशा भी कहते हैं।

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नक्षत्र चरण · 108 पन्ने

नक्षत्र चरण

अश्विनी नक्षत्र, चरण 1: अंश, नवांश और नामाक्षर

अश्विनी का चरण 1 मेष 0°00′ से मेष 3°20′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

नक्षत्र चरण

अश्विनी नक्षत्र, चरण 2: अंश, नवांश और नामाक्षर

अश्विनी का चरण 2 मेष 3°20′ से मेष 6°40′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

नक्षत्र चरण

अश्विनी नक्षत्र, चरण 3: अंश, नवांश और नामाक्षर

अश्विनी का चरण 3 मेष 6°40′ से मेष 10°00′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

नक्षत्र चरण

अश्विनी नक्षत्र, चरण 4: अंश, नवांश और नामाक्षर

अश्विनी का चरण 4 मेष 10°00′ से मेष 13°20′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

नक्षत्र चरण

भरणी नक्षत्र, चरण 1: अंश, नवांश और नामाक्षर

भरणी का चरण 1 मेष 13°20′ से मेष 16°40′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

नक्षत्र चरण

भरणी नक्षत्र, चरण 2: अंश, नवांश और नामाक्षर

भरणी का चरण 2 मेष 16°40′ से मेष 20°00′ तक फैला है (कुल 3°20′)।

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ज्योतिष की बातें · 26 पन्ने

ज्योतिष की बातें

अष्टकवर्ग क्या है और इसके अंक कैसे पढ़ें?

अष्टकवर्ग एक गिनती की पद्धति है: सात ग्रहों की अपनी-अपनी तालिका (भिन्नाष्टकवर्ग) हर राशि को 0 से 8 तक बिंदु देती है, और सबका जोड़ सर्वाष्टकव...

ज्योतिष की बातें

कुंडली मिलान कैसे होता है?

उत्तर भारत में कुंडली मिलान अष्टकूट से होता है: आठ कूट, कुल 36 गुण। ePandit पहले नाड़ी, भकूट, गण और मंगल के दोष और उनके परिहार (जब दोष लागू नहीं माना जाता) देखता है, फिर...

ज्योतिष की बातें

अवकहड़ा चक्र क्या है?

अवकहड़ा चक्र जन्म-कुंडली के साथ छपने वाली एक छोटी तालिका है, जो चंद्रमा की राशि और नक्षत्र से बनती है: नामाक्षर, वर्ण, वश्य, योनि, गण, नाड़ी...

ज्योतिष की बातें

भकूट दोष क्या है, और इसके परिहार क्या हैं?

भकूट अष्टकूट मिलान का 7 अंक वाला कूट है, जो दोनों चंद्र राशियों की दूरी से निकलता है। 2-12, 5-9 या 6-8 पर इसे भकूट दोष कहते हैं। मुहूर्त-चिं...

ज्योतिष की बातें

बुधादित्य योग क्या है?

बुधादित्य योग तब माना जाता है जब सूर्य और बुध एक ही राशि में हों। यह बहुत आम स्थिति है; रमन इसमें शर्त जोड़ते हैं कि बुध सूर्य से 10° के भीत...

ज्योतिष की बातें

भाव-चलित (चलित कुंडली) क्या है?

भाव-चलित कुंडली भावों को राशि की सीमा से नहीं, लग्न और दशम के असली अंशों से बाँटती है। इससे पता चलता है कि कोई ग्रह, जो राशि-कुंडली में एक भ...

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पंचांग · 12 पन्ने

पंचांग

अभिजित मुहूर्त: दोपहर का शांत समय

मुहूर्त-चिंतामणि दिन को 15 मुहूर्तों में बाँटता है, और इनमें आठवाँ अभिजित है, जो स्थानीय दोपहर के आसपास लगभग 48 मिनट का होता है। परंपरा इसे...

पंचांग

चंद्र बल: आज का चंद्रमा, आपकी जन्म-राशि से

चंद्र बल में आज के चंद्रमा की राशि को आपकी जन्म-राशि से गिना जाता है। मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार 1, 3, 6, 7, 10 और 11वाँ स्थान अनुकूल है, और...

पंचांग

चौघड़िया: दिन के आठ हिस्से

चौघड़िया दिन और रात को 8-8 हिस्सों में बाँटकर हर हिस्से को अमृत, शुभ, लाभ, चर, उद्वेग, काल या रोग नाम देने की परंपरा है। यह पश्चिम भारत में...

पंचांग

होरा: दिन के 24 घंटे और उनके स्वामी

होरा दिन का एक 'घंटा' है, और हर होरा का एक स्वामी ग्रह होता है: सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र, शनि, गुरु, मंगल के क्रम में। मुहूर्त-चिंतामणि कहता...

पंचांग

करण: आधी तिथि का माप

करण पंचांग का पाँचवाँ अंग है: एक करण आधी तिथि के बराबर होता है। कुल 11 करण हैं, 4 स्थिर और 7 चर। सातवाँ चर करण विष्टि ही "भद्रा" कहलाता है,...

पंचांग

मुहूर्त: अच्छा समय कैसे चुना जाता है

मुहूर्त चुनने में पंचांग के पाँच अंग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण), मुहूर्त का लग्न, और व्यक्ति के लिए तारा बल और चंद्र बल देखे जाते हैं। इ...

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संस्कार · 9 पन्ने

संस्कार

अन्नप्राशन: बच्चे का पहला निवाला

अन्नप्राशन वह संस्कार है जिसमें बच्चे को पहली बार अन्न का स्वाद दिया जाता है। मुहूर्त-चिंतामणि बेटे के लिए छठा या आठवाँ और बेटी के लिए पाँचव...

संस्कार

जातकर्म: नवजात का पहला संस्कार

जातकर्म वह संस्कार है जो बच्चे के जन्म के समय किया जाता है: पिता का आशीर्वाद, प्रार्थना, और माँ की गोद में पहला आहार। पुरानी रीति में बच्चे...

संस्कार

कर्णवेध: कान छिदवाने का संस्कार

कर्णवेध में बच्चे के कान छेदे जाते हैं। मुहूर्त-चिंतामणि इसके लिए छठे से आठवें महीने, या किसी विषम वर्ष का समय बताता है। कई समुदायों में यह...

संस्कार

मुंडन: बच्चे के पहले बाल

मुंडन (चूड़ाकर्म) में बच्चे के जन्म के बाल पहली बार उतारे जाते हैं। मनुस्मृति इसके लिए पहला या तीसरा वर्ष बताती है, कई परिवार पाँचवाँ वर्ष भ...

संस्कार

नामकरण: बच्चे को उसका नाम देने का दिन

नामकरण बच्चे का पहला बड़ा संस्कार है, जिसमें घर-परिवार मिलकर उसे नाम देता है। परंपरा जन्म के 11वें या 12वें दिन, या बाद के किसी अच्छे दिन, स...

संस्कार

निष्क्रमण: बच्चे की पहली सैर

निष्क्रमण वह संस्कार है जिसमें बच्चे को पहली बार घर से बाहर ले जाकर सूर्य और आकाश के दर्शन कराए जाते हैं। मुहूर्त-चिंतामणि इसके लिए जन्म से...

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त्योहार · 37 पन्ने

त्योहार

अक्षय तृतीया: दान और नई शुरुआत का दिन

अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया है। निर्णय सिंधु के अनुसार वह तृतीया ली जाती है जो पूर्वाह्न में हो, और दोनों दिन हो तो दूसरा दिन; यह युगादि...

त्योहार

अमावस्या: चाँद-रहित रात, शांत स्मरण का दिन

अमावस्या हर महीने कृष्ण पक्ष की आख़िरी तिथि है, जब चाँद सूर्य के बहुत पास होने से दिखाई नहीं देता। धर्मसिंधु स्नान-दान के लिए परली अमावस्या...

त्योहार

भाई दूज: बहन के घर भाई का भोजन

भाई दूज (यम द्वितीया) कार्तिक शुक्ल द्वितीया है, दिवाली का पाँचवाँ दिन। धर्मसिंधु इसकी कथा देता है: यमुना ने अपने भाई यम को इसी दिन घर बुलाक...

त्योहार

चैत्र नवरात्रि: वसंत में देवी की नौ रातें

चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक देवी की नौ रातें हैं, और नवमी राम नवमी है। धर्मसिंधु कहता है कि इसी प्रतिपदा से देवी-नवरात्र...

त्योहार

छठ पूजा: डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य

छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी का सूर्य और छठी मैया का व्रत है: चार दिन, नहाय-खाय से उषा-अर्घ्य तक। षष्ठी की शाम डूबते सूर्य को और सप्तमी की भोर उगत...

त्योहार

देवउठनी एकादशी: भगवान के जागने का उत्सव

देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी है। परंपरा मानती है कि आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से सोए भगवान विष्णु इस दिन जागते हैं और चातुर...

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