परिचय
पुष्य कर्क राशि में 3°20′ से 16°40′ तक फैला है, इसलिए इसके चारों चरण कर्क में ही आते हैं। "पुष्य" का अर्थ है पोषण करने वाला, पुष्ट करने वाला। इसका प्रतीक गाय का थन या फूल माना जाता है: दोनों ही बिना शोर के दूसरों को पोषण देने की ओर इशारा करते हैं। मुहूर्त की परंपरा में पुष्य को बहुत-से कामों की शुरुआत के लिए अच्छा नक्षत्र माना जाता है।
विंशोत्तरी दशा में पुष्य के स्वामी शनि हैं, जिनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। पुष्य में जन्मे व्यक्ति की पहली महादशा शनि की होती है; कितने वर्ष बचे हैं, यह चंद्रमा की सटीक स्थिति से निकलता है। इसकी योनि मेष (भेड़) है।
स्वभाव (परंपरा मानती है)
परंपरा मानती है कि पुष्य का स्वभाव देखभाल करने वाला, ज़िम्मेदार और श्रद्धा से भरा होता है। गुरु देवताओं के गुरु हैं और शनि धीरज व अनुशासन के ग्रह; इन दोनों के मेल से ज्योतिष की परंपरा इस नक्षत्र को ज्ञान, नियम और सेवा से जोड़ती है। जैसे माँ बिना कहे बच्चे की ज़रूरत समझ लेती है, वैसी संवेदना भी इसकी पहचान मानी जाती है।
देव गण होने से परंपरा यहाँ सरलता और भलाई की प्रवृत्ति देखती है। ये सब प्रवृत्तियाँ हैं, किसी व्यक्ति के बारे में तय बातें नहीं। असली तस्वीर पूरी कुंडली से बनती है: लग्न, चंद्र राशि, ग्रह और चल रही दशा।
शक्तियाँ और ध्यान रखने की बातें
शक्तियाँ: परंपरा पुष्य को भरोसेमंद होने, धीरे-धीरे पर पक्का काम करने और दूसरों को सहारा देने से जोड़ती है। परिवार, संस्था या समाज, जहाँ भी हों, वहाँ चीज़ों को सँभालकर रखना इसकी खूबी मानी जाती है।
ध्यान रखने की बातें: जो मन सबकी देखभाल में लगा रहता है, वह कभी-कभी अपना ध्यान रखना भूल जाता है, या नियमों पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दे देता है। परंपरा सलाह देती है कि अपने आराम को भी जगह देना और नियमों के साथ थोड़ा लचीलापन रखना, इस नक्षत्र को और सहज बनाता है।
काम और रुचियाँ
परंपरा पुष्य को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें पोषण, सेवा और व्यवस्था हो: पढ़ाना और मार्गदर्शन, भोजन और डेयरी से जुड़े काम, समाज-सेवा और संस्थाएँ चलाना, वित्त और प्रबंधन, या धर्म और परंपरा से जुड़े क्षेत्र। ये विषय हैं, कोई तय पेशा नहीं; असली दिशा पूरी कुंडली और अपनी रुचि से बनती है।
रिश्ते
रिश्तों में परंपरा पुष्य को भरोसेमंद, ध्यान रखने वाले और परिवार को साथ लेकर चलने वाले स्वभाव से जोड़ती है। ऐसे लोग प्यार अक्सर देखभाल के रूप में जताते हैं। अपनी भावनाएँ भी शब्दों में कह देना और साथी को भी अपनी देखभाल करने का मौका देना, रिश्ते में बराबरी और गरमाहट लाता है।
कुंडली मिलान में गण, योनि और नाड़ी जैसे पहलू देखे जाते हैं, पर वे पूरे मिलान का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं।
आस्था
परंपरा में हर नक्षत्र के एक देवता माने गए हैं। मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार पुष्य के देवता गुरु हैं। गुरु देवताओं के गुरु हैं, जो ज्ञान, विवेक और प्रार्थना से जुड़े माने जाते हैं। परंपरा इसी से पुष्य को ज्ञान और श्रद्धा से जोड़ती है।
जो चाहें, वे शांत मन से यह नाम-मंत्र ले सकते हैं:
ॐ बृहस्पतये नमः
(नक्षत्र-देवता: मुहूर्त-चिंतामणि, नक्षत्र-प्रकरण 1; नाम-मंत्र परंपरा में प्रचलित)
दान (लोक मान्यता, वैकल्पिक): किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराना। इसे किसी डर से नहीं, मन की खुशी से करें; न करें तो भी कोई बात नहीं।
नामाक्षर
अवकहड़ा चक्र की परंपरा में पुष्य के चारों चरणों के अक्षर ये हैं:
- चरण 1 (कर्क): हु
- चरण 2 (कर्क): हे
- चरण 3 (कर्क): हो
- चरण 4 (कर्क): डा
नाम रखने की परंपरा में जन्म के चरण का अक्षर नाम का पहला अक्षर माना जाता है। यह एक परंपरा है; नाम चुनना परिवार का अपना फ़ैसला है। नामाक्षर कैलकुलेटर से अपना अक्षर देखिए।
अपनी पूरी तस्वीर के लिए मुफ़्त कुंडली में अपना नक्षत्र, चरण और दशा देखिए।