परिचय
गुरु सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है, और ज्योतिष में इसे देवताओं का गुरु कहा गया है। यह लगभग एक साल में एक राशि पार करता है और करीब बारह साल में पूरा चक्र। गुरुवार इसी के नाम पर है।
गुरु की दो राशियाँ हैं: धनु और मीन। सामान्य 7वीं दृष्टि के साथ गुरु अपने से 5वें और 9वें भाव को भी देखता है। परंपरा में गुरु की दृष्टि को सहारा देने वाली माना जाता है।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि गुरु इन विषयों का कारक है:
- ज्ञान, समझ और सही सलाह
- शिक्षक, गुरु और बड़े मार्गदर्शक
- धर्म, आस्था और नैतिकता
- संतान और परिवार का विस्तार
- धन को सँभालने की समझ
काम के संदर्भ में परंपरा गुरु को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें पढ़ाना, सलाह देना, न्याय, धर्म या वित्त की समझ हो।
ये झुकाव हैं, तय बातें नहीं। गुरु का भाव, राशि, दृष्टि और दशा मिलकर ही अर्थ देते हैं।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
गुरु की अपनी राशियाँ धनु और मीन हैं। उच्च स्थिति कर्क 5° पर मानी जाती है और नीच स्थिति मकर 5° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। धनु के पहले 10 अंश मूलत्रिकोण हैं; धनु का बाकी हिस्सा और मीन स्वराशि।
नैसर्गिक संबंध में गुरु के मित्र मंगल, चंद्र और सूर्य हैं; सम शनि हैं; और पुराने वर्गीकरण में शत्रु बुध और शुक्र गिने जाते हैं। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। गुरु के लिए यह 390 विरूप (6.5 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = गुरु का कुल षड्बल ÷ 390
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि गुरु के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
गुरु का नैसर्गिक बल 34.29 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल गुरु को इस स्थान पर मिलता है: लग्न (पूर्व)। रमन की विधि में काल बल के त्रिभाग हिस्से में गुरु को हर कुंडली में पूरे 60 विरूप मिलते हैं। गुरु की 5वीं और 9वीं विशेष दृष्टि दृक् बल में अलग से गिनी जाती है।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में गुरु की महादशा 16 वर्ष की होती है। परंपरा मानती है कि इस समय पढ़ाई, सीखना-सिखाना, परिवार का बढ़ना, आस्था और सही सलाह जैसे विषय आगे आते हैं।
पर असल रंग इस पर टिका है कि गुरु आपकी कुंडली में कहाँ है, किन भावों का स्वामी है और कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
परंपरा में गुरुवार गुरु का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से गुरु का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ बृहस्पतये नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
गुरुवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़ी चने की दाल दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।