परिचय
शुक्र सुबह या शाम के आकाश में सबसे चमकीला तारा-सा दिखता है; इसे भोर का तारा भी कहते हैं। ज्योतिष में शुक्र को असुरों का गुरु, शुक्राचार्य, कहा गया है, जो विद्या और कला के जानकार थे।
सूर्य के पास रहने के कारण शुक्र कुंडली में सूर्य से दो राशियों से ज़्यादा दूर नहीं जाता। इसकी दो राशियाँ हैं: वृषभ और तुला।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि शुक्र इन विषयों का कारक है:
- प्रेम, अपनापन और साझेदारी
- कला, संगीत, नृत्य और सौंदर्य की समझ
- सुख-सुविधा, वाहन और आराम
- मेल-जोल, शिष्टता और जीवन का आनंद
परंपरा में शुक्र को विवाह और जीवनसाथी का कारक भी माना गया है; पर रिश्तों की बात पूरी कुंडली से पढ़ी जाती है, एक ग्रह से नहीं।
काम के संदर्भ में परंपरा शुक्र को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें कला, डिज़ाइन, सौंदर्य, मेहमान-नवाज़ी या लोगों को आनंद देना हो।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
शुक्र की अपनी राशियाँ वृषभ और तुला हैं। उच्च स्थिति मीन 27° पर मानी जाती है और नीच स्थिति कन्या 27° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। तुला के पहले 15 अंश मूलत्रिकोण हैं; तुला का बाकी हिस्सा और वृषभ स्वराशि।
नैसर्गिक संबंध में शुक्र के मित्र बुध और शनि हैं; सम गुरु और मंगल हैं; और पुराने वर्गीकरण में शत्रु चंद्र और सूर्य गिने जाते हैं। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। शुक्र के लिए यह 330 विरूप (5.5 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = शुक्र का कुल षड्बल ÷ 330
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि शुक्र के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
शुक्र का नैसर्गिक बल 42.86 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल शुक्र को इस स्थान पर मिलता है: 4था भाव (उत्तर)। स्थान बल के ओज-युग्म हिस्से में शुक्र को अंक सम राशि और सम नवांश में मिलते हैं, चंद्र की तरह; बाकी पाँच ग्रहों को विषम में।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में शुक्र की महादशा 20 वर्ष की होती है, जो सबसे लंबी है। परंपरा मानती है कि इस समय रिश्ते, साझेदारी, घर की सुख-सुविधा, कला और रुचियों जैसे विषय आगे आते हैं।
पर असल रंग इस पर टिका है कि शुक्र आपकी कुंडली में कहाँ है, किन भावों का स्वामी है और कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
परंपरा में शुक्रवार शुक्र का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से शुक्र का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ शुक्राय नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
शुक्रवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़ा चावल या मिश्री दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।