परिचय
शनि आँख से दिखने वाले ग्रहों में सबसे धीमा है: एक राशि में लगभग ढाई साल रहता है और पूरा चक्र करीब 29.5 साल में करता है। इसीलिए इसे "शनैश्चर" कहा गया, यानी धीरे चलने वाला। पुराणों में शनि सूर्य के पुत्र हैं।
शनि की दो राशियाँ हैं: मकर और कुंभ। सामान्य 7वीं दृष्टि के साथ शनि अपने से 3रे और 10वें भाव को भी देखता है।
शनि के चंद्र राशि पर गोचर के बारे में साइट पर एक अलग, शांत पेज है। यहाँ हम शनि को एक ग्रह के रूप में समझते हैं।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि शनि इन विषयों का कारक है:
- धैर्य, अनुशासन और लंबी मेहनत
- समय, नियम और ज़िम्मेदारी
- सेवा, न्याय और ईमानदारी
- बुज़ुर्ग, मेहनतकश लोग और समाज का साथ
काम के संदर्भ में परंपरा शनि को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें लगन, व्यवस्था, लंबी योजना, सेवा या संस्थाओं का काम हो।
परंपरा यह भी मानती है कि शनि जो देता है, वह मेहनत से और धीरे-धीरे देता है, और वह टिकता है। ये झुकाव हैं, तय बातें नहीं; शनि का भाव, राशि और दशा मिलकर ही अर्थ देते हैं।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
शनि की अपनी राशियाँ मकर और कुंभ हैं। उच्च स्थिति तुला 20° पर मानी जाती है और नीच स्थिति मेष 20° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। कुंभ के पहले 20 अंश मूलत्रिकोण हैं; कुंभ का बाकी हिस्सा और मकर स्वराशि।
नैसर्गिक संबंध में शनि के मित्र बुध और शुक्र हैं; सम गुरु हैं; और पुराने वर्गीकरण में शत्रु मंगल, चंद्र और सूर्य गिने जाते हैं। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। शनि के लिए यह 300 विरूप (5 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = शनि का कुल षड्बल ÷ 300
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि शनि के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
शनि का नैसर्गिक बल 8.57 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल शनि को इस स्थान पर मिलता है: 7वाँ भाव (पश्चिम)। शनि का नैसर्गिक बल सात ग्रहों में सबसे कम है, पर यह हर कुंडली में बराबर एक स्थिर अंश है, इसलिए किसी एक व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कहता। शनि की 3री और 10वीं विशेष दृष्टि दृक् बल में अलग से गिनी जाती है।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है। परंपरा मानती है कि इस समय ज़िम्मेदारी, लगन, काम में स्थिरता, लंबी योजनाएँ और सेवा जैसे विषय आगे आते हैं। परंपरा इसे मेहनत से कुछ टिकाऊ बनाने का समय मानती है।
असल रंग इस पर टिका है कि शनि आपकी कुंडली में कहाँ है, किन भावों का स्वामी है और कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
परंपरा में शनिवार शनि का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से शनि का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ शनैश्चराय नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
शनिवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़े काले तिल या भोजन दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।