ज्योतिष शब्दकोश
लग्न, भाव, नक्षत्र, दशा, नवांश, तिथि, मुहूर्त: कुंडली और पंचांग के सबसे ज़रूरी शब्द, हर विषय में एक-एक पंक्ति में। पूरी शब्दावली साइट पर हर कठिन शब्द के साथ खुलती है।
- अंतर्दशा (भुक्ति) (Antardasha (bhukti))
- महादशा के भीतर का दूसरा स्तर, जो उसी क्रम में नौ हिस्सों में बँटता है; अवधि = महादशा वर्ष × उप-स्वामी वर्ष ÷ 120।
- अंश, कला, विकला (Ansha, kala, vikala (degree, minute, second))
- राशिचक्र के माप: एक राशि 30 अंश, एक अंश 60 कला, एक कला 60 विकला।
- अक्षवेदांश (D45) (Akshavedamsa (D45))
- राशि के पैंतालीस हिस्से; पिता की ओर की विरासत और चरित्र से जोड़ा जाता है।
- अधि योग (Adhi yoga)
- चंद्रमा से छठे, सातवें और आठवें भावों में सौम्य ग्रह।
- अधिक मास (Adhika masa)
- वह चंद्र मास जिसमें कोई संक्रांति न पड़े; लगभग हर 32–33 महीने में आता है और पुरुषोत्तम मास भी कहलाता है।
- अनफा योग (Anapha yoga)
- चंद्रमा से बारहवें भाव में सूर्य के सिवा कोई ग्रह।
- अन्नप्राशन (Annaprashan)
- शिशु को पहली बार अन्न चखाने का संस्कार; ठोस आहार कब शुरू हो, यह डॉक्टर तय करते हैं।
- अभिजित (Abhijit (nakshatra))
- उत्तराषाढ़ा के अंत और श्रवण के आरंभ का छोटा हिस्सा, जिसे कुछ मुहूर्त-ग्रंथ 28वाँ नक्षत्र गिनते हैं।
- अभिजित मुहूर्त (Abhijit muhurta)
- दिन के पंद्रह मुहूर्तों में आठवाँ, स्थानीय मध्याह्न के आसपास।
- अमांत (Amanta)
- अमावस्या पर ख़त्म होने वाला महीना; गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में प्रचलित।
- अमावस्या (Amavasya)
- कृष्ण पक्ष की अंतिम (तीसवीं) तिथि, जब चंद्रमा दिखाई नहीं देता।
- अयन (Ayana)
- सूर्य की उत्तर (उत्तरायण) या दक्षिण (दक्षिणायन) की ओर गति के छह-छह महीने; पंचांग में उत्तरायण प्रायः मकर संक्रांति से गिना जाता है।
- अयनांश (Ayanamsa)
- सायन (ऋतु-आधारित) और निरयन (तारा-आधारित) राशिचक्र के बीच का अंतर; आज लगभग 24 अंश।
- अवकहड़ा चक्र (Avakahada chakra)
- चंद्र राशि और नक्षत्र से बनी छोटी तालिका: नाम-अक्षर, वर्ण, वश्य, योनि, गण, नाड़ी, तत्त्व और पाया।
- अष्टकवर्ग (Ashtakavarga)
- सात ग्रह और लग्न, इन आठ योगदानकर्ताओं से हर राशि को अंक देने की गिनती-पद्धति; गोचर पढ़ने में काम आती है।
- अष्टकूट (Ashtakoot)
- कुंडली-मिलान के आठ कूट (वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट, नाड़ी), कुल 36 अंक।
- अष्टोत्तरी दशा (Ashtottari dasha)
- आठ ग्रहों (केतु के बिना) की 108 वर्ष की दशा-पद्धति, जो कुछ शर्तों पर प्रयोग होती है।
- अस्त (Asta (combustion))
- ग्रह का सूर्य के इतने पास होना कि वह सूर्य की चमक में दिखना बंद हो जाए; दूरी हर ग्रह के लिए अलग है।
- आज का नक्षत्र (Day's nakshatra)
- पंचांग का तीसरा अंग: जिस नक्षत्र में आज चंद्रमा है।
- आत्मकारक (Atmakaraka)
- जैमिनी पद्धति में अपनी राशि में सबसे अधिक अंश वाला ग्रह, जिसे 'आत्मा का कारक' माना जाता है।
- आपोक्लिम (Apoklima (cadent houses))
- पणफर के बाद वाले भाव: तीसरा, छठा, नौवाँ और बारहवाँ।
- आवश्यक बल (Required shadbala)
- रमन के अनुसार हर ग्रह के लिए तय न्यूनतम अंक, जैसे सूर्य 300 और बुध 420 विरूप।
- इष्टकाल (Ishtakaal)
- सूर्योदय से जन्म के क्षण तक बीता समय, जो घटी-पल में लिखा जाता है।
- उच्च (Uchcha (exaltation))
- वह राशि (और अंश) जहाँ परंपरा किसी ग्रह को सबसे ऊँची गरिमा में मानती है, जैसे सूर्य मेष 10° पर।
- उच्च बल (Uchcha bala)
- ग्रह की अपने नीच बिंदु से दूरी पर आधारित स्थान बल का हिस्सा; उच्च बिंदु पर 60 विरूप।
- उत्तर भारतीय कुंडली (North Indian chart style)
- हीरे के आकार वाली कुंडली, जिसमें भाव अपनी जगह स्थिर रहते हैं और राशि-अंक बदलते हैं।
- उदय तिथि (Udaya tithi)
- सूर्योदय के समय चल रही तिथि, जिससे ज़्यादातर व्रत और दिन की तिथि मानी जाती है।
- उपचय (Upachaya (houses of growth))
- तीसरा, छठा, दसवाँ और ग्यारहवाँ भाव, जिनके फल परंपरा के अनुसार समय और प्रयास के साथ बढ़ते हैं।
- उपनयन (Upanayan)
- यज्ञोपवीत धारण कर वेद-अध्ययन की शुरुआत का संस्कार।
- उपरत्न (Uparatna (substitute gem))
- किसी रत्न का कम-ख़र्च वाला परंपरागत विकल्प, जो हर रत्न के साथ दिखाया जाता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- उपाय (Upaya (remedy))
- परंपरा में बताए आचरण, प्रार्थना, दान या वस्तुएँ; ePandit पर केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा, ₹0 वाले पहले।
- ऋतु (Ritu (season))
- दो-दो महीने की छह ऋतुएँ: वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर।
- एकादशी (Ekadashi)
- हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, जो एक प्रचलित व्रत-दिन है।
- कक्ष्या (Kakshya)
- अष्टकवर्ग में हर राशि के 3°45′ के आठ हिस्से, जिनसे गोचर को और बारीकी से पढ़ा जाता है।
- कन्या (Kanya (Virgo))
- छठी राशि, पृथ्वी तत्त्व, द्विस्वभाव; स्वामी बुध।
- करण (Karana)
- आधी तिथि (6°); कुल 11 करण, 4 स्थिर और 7 चर।
- कर्क (Karka (Cancer))
- चौथी राशि, जल तत्त्व, चर; स्वामी चंद्र।
- कर्म भाव (Karma bhava (10th house))
- दसवाँ भाव: काम, पेशा, पद और समाज में पहचान।
- कलत्र भाव (Kalatra bhava (7th house))
- सातवाँ भाव: जीवनसाथी, साझेदारी और दूसरों से व्यवहार।
- कारक (Karaka (significator))
- जिस ग्रह को किसी विषय का प्रतिनिधि माना जाता है, जैसे गुरु (बृहस्पति) संतान का और शुक्र विवाह का।
- कार्यकारी शुभ ग्रह (Functional benefic)
- वह ग्रह जो लग्न के हिसाब से अच्छे भावों (जैसे 1, 5, 9) का स्वामी होने से उस कुंडली में सहायक माना जाए।
- काल बल (Kala bala (temporal strength))
- जन्म का दिन-रात, पक्ष, वर्ष, मास, वार और होरा से मिलने वाला बल।
- काल सर्प (शांत जाँच) (Kaal sarp (calm check))
- सातों ग्रहों का राहु-केतु के एक ओर होना; BPHS इसका नाम नहीं लेता, यह बाद का वर्गीकरण है; ePandit इसे केवल एक पैटर्न के रूप में दिखाता है।
- कुंडली (Birth chart (kundli))
- जन्म के समय आकाश का नक्शा: बारह भाव, बारह राशियाँ और नौ ग्रह।
- कुंभ (Kumbha (Aquarius))
- ग्यारहवीं राशि, वायु तत्त्व, स्थिर; स्वामी शनि।
- कृष्ण पक्ष (Krishna paksha)
- पूर्णिमा से अमावस्या तक का घटते चंद्रमा का पखवाड़ा।
- केंद्र (Kendra (angular houses))
- पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव; परंपरा इन्हें कुंडली के खंभे मानती है।
- केंद्राधिपति दोष (Kendradhipati dosha)
- सौम्य ग्रह के केंद्र का स्वामी होने पर उसकी सौम्यता कम मानने का शास्त्रीय नियम।
- केतु (Ketu)
- चंद्रमा की कक्षा का दक्षिणी पात, जो राहु से ठीक 180° पर रहता है।
- केमद्रुम योग (Kemadruma yoga)
- चंद्रमा के दोनों ओर (2, 12) सूर्य के सिवा कोई ग्रह न होना; ज़्यादातर कुंडलियों में कोई न कोई निवारण लागू होता है।
- क्षय तिथि (Kshaya tithi)
- वह तिथि जो एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ख़त्म हो जाए, इसलिए पंचांग में 'छूट' जाती है।
- क्षय मास (Kshaya masa)
- वह दुर्लभ चंद्र मास जिसमें दो संक्रांतियाँ पड़ें।
- खवेदांश (D40) (Khavedamsa (D40))
- राशि के चालीस हिस्से; माता की ओर की विरासत से जोड़ा जाता है।
- गंडमूल (Gandmool)
- छह नक्षत्रों (अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती) में जन्म; शांति वैकल्पिक है और यह किसी के लिए दुर्भाग्य का संकेत नहीं।
- गंडांत (Gandanta)
- जल और अग्नि राशियों के जोड़ पर नक्षत्रों की संधि का बहुत छोटा समय (रेवती–अश्विनी, आश्लेषा–मघा, ज्येष्ठा–मूल)।
- गजकेसरी योग (Gajakesari yoga)
- चंद्रमा से केंद्र (1, 4, 7, 10) में गुरु।
- गण (Gana)
- नक्षत्र से तीन समूह: देव, मनुष्य, राक्षस; राक्षस एक पुराना श्रेणी-नाम है, बुरा नहीं; मिलान में 6 अंक।
- गण दोष (Gana dosha)
- मिलान में दोनों के गण का मेल न बैठना; ePandit इसे निवारण के साथ दिखाता है।
- गर्भाधान (Garbhadhan)
- सोलह संस्कारों में पहला, संतान की कामना से जुड़ा।
- गुण मिलान (Guna milan)
- अष्टकूट से वर-वधू की कुंडली के अंक गिनना; अंक अकेले कभी विवाह तय नहीं करते।
- गुरु (Guru (Jupiter))
- ज्ञान, धर्म और संतान का कारक माना जाने वाला ग्रह; धनु और मीन का स्वामी, कर्क में उच्च।
- गुलिक काल (Gulika kaal)
- शनि से जुड़ा दिन का एक आठवाँ हिस्सा, दक्षिण भारतीय पंचांगों में।
- गोचर (Gochara (transit))
- ग्रहों की वर्तमान चाल को जन्म-कुंडली, पारंपरिक रूप से जन्म-राशि से, मिलाकर पढ़ना।
- गोधूलि (Godhuli)
- सूर्यास्त के आसपास का समय, जिसे कई परंपराएँ विवाह के लिए चुनती हैं।
- ग्रह (Graha)
- ज्योतिष के नौ 'पकड़ने वाले' पिंड: सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु।
- ग्रह मैत्री (कूट) (Graha maitri (koota))
- दोनों की चंद्र राशियों के स्वामियों की मित्रता; मिलान में 5 अंक।
- ग्रह युद्ध (Graha yuddha (planetary war))
- मंगल से शनि तक के किन्हीं दो ग्रहों का एक अंश के भीतर आ जाना; शास्त्र इसमें एक को विजयी मानते हैं।
- ग्रह शांति (Graha shanti)
- किसी ग्रह के लिए पूजा और हवन का अनुष्ठान, BPHS के अंतिम अध्यायों में वर्णित; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा, कभी डर से नहीं।
- घटी (Ghati (ghatika))
- समय की पारंपरिक इकाई: दिन-रात का साठवाँ हिस्सा, यानी 24 मिनट।
- चंद्र (Chandra (Moon))
- मन और माता का कारक माना जाने वाला ग्रह; कर्क का स्वामी, वृषभ में उच्च।
- चंद्र कुंडली (Chandra kundli (Moon chart))
- वही कुंडली, पर चंद्रमा की राशि को पहला भाव मानकर पढ़ी गई।
- चंद्र बल (Chandra bala)
- दिन के चंद्रमा की राशि जन्म-राशि से किस भाव में है, यह देखना; 1, 3, 6, 7, 10, 11 परंपरा में अनुकूल।
- चंद्र मास (Chandra masa (lunar month))
- एक अमावस्या से अगली (या एक पूर्णिमा से अगली) तक का महीना, लगभग 29.5 दिन।
- चंद्र-मंगल योग (Chandra-Mangala yoga)
- चंद्रमा और मंगल का एक राशि में होना (रमन परस्पर दृष्टि भी गिनते हैं)।
- चतुर्थांश (D4) (Chaturthamsa (D4))
- राशि के चार हिस्से; घर और संपत्ति से जोड़ा जाता है।
- चतुर्विंशांश (D24) (Chaturvimshamsa (D24))
- राशि के चौबीस हिस्से; विद्या से जोड़ा जाता है।
- चर कारक (Chara karaka)
- अंशों के क्रम से बदलने वाले सात कारक: आत्म, अमात्य, भ्रातृ, मातृ, पुत्र, ज्ञाति और दार कारक।
- चर दशा (Chara dasha)
- जैमिनी पद्धति की राशि-आधारित दशा, जिसमें ग्रहों की जगह राशियों की बारी चलती है।
- चर राशि (Chara rashi (movable sign))
- मेष, कर्क, तुला और मकर; परंपरा इन्हें गति और शुरुआत से जोड़ती है।
- चेष्टा बल (Chesta bala (motional strength))
- ग्रह की चाल, ख़ासकर वक्री होने से मिलने वाला बल; मंगल से शनि तक के लिए।
- चौघड़िया (Choghadiya)
- दिन और रात को आठ-आठ हिस्सों में बाँटने वाली पद्धति (अमृत, शुभ, लाभ, चर, उद्वेग, काल, रोग); ये नाम पारंपरिक लेबल हैं।
- छाया ग्रह (Chhaya graha (shadow planet))
- राहु और केतु का नाम, क्योंकि ये गणित के बिंदु हैं, कोई पिंड नहीं।
- जन्म नक्षत्र (Janma nakshatra (birth star))
- जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो; दशा और नाम-अक्षर इसी से निकलते हैं।
- जन्म राशि (Janma rashi (Moon sign))
- जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में हो; उत्तर भारत में आम बोलचाल की 'राशि' यही है।
- जप (Japa)
- किसी मंत्र या नाम का गिनकर बार-बार पाठ, प्रायः माला पर; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- जातकर्म (Jatakarma)
- जन्म के तुरंत बाद का संस्कार, जिसमें शिशु का स्वागत किया जाता है।
- जैमिनी पद्धति (Jaimini system)
- जैमिनी सूत्रों पर आधारित पद्धति, जिसमें चर कारक, राशि-दृष्टि और चर दशा जैसे साधन हैं।
- ज्योतिष (Jyotish)
- वेदांग के रूप में आकाश के ज्योतियों से समय और जीवन को पढ़ने की भारतीय विद्या।
- ढैया (Dhaiya)
- जन्म-राशि से चौथी या आठवीं राशि में शनि का लगभग ढाई वर्ष का गोचर; साढ़े साती की तरह इसे भी बाकी कुंडली के साथ पढ़ा जाता है।
- तत्त्व (Tattva (element))
- राशियों के चार तत्त्व: अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल, जो मेष से क्रम में दोहराते हैं।
- तनु भाव (Tanu bhava (1st house))
- पहला भाव: शरीर, स्वभाव और जीवन की दिशा।
- ताजिक (वर्षफल) (Tajik (varshaphal))
- वार्षिक कुंडली की पद्धति, जो सूर्य के अपनी जन्म-स्थिति पर लौटने के क्षण के लिए बनती है।
- तात्कालिक मैत्री (Tatkalika maitri (temporary friendship))
- किसी कुंडली में एक-दूसरे से 2, 3, 4, 10, 11, 12वें भाव में बैठे ग्रह उस कुंडली में मित्र माने जाते हैं।
- तारा (कूट) (Tara (koota))
- एक के जन्म-नक्षत्र से दूसरे के नक्षत्र तक की गिनती से बना कूट; मिलान में 3 अंक।
- तारा बल (Tara bala)
- जन्म-नक्षत्र से दिन के नक्षत्र तक गिनकर नौ ताराओं (जन्म, संपत, विपत, क्षेम…) में से कौन-सी है, यह देखना।
- तिथि (Tithi)
- चंद्रमा का सूर्य से हर 12° आगे बढ़ना एक तिथि है; एक चंद्र मास में 30 तिथियाँ।
- तुला (Tula (Libra))
- सातवीं राशि, वायु तत्त्व, चर; स्वामी शुक्र।
- त्रिंशांश (D30) (Trimshamsa (D30))
- राशि के पाँच असमान हिस्से (मंगल, शनि, गुरु, बुध, शुक्र के); जीवन की चुनौतियों से जोड़ा जाता है।
- त्रिकोण (Trikona (trines))
- पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव, जिन्हें 'लक्ष्मी स्थान' भी कहा जाता है।
- दक्षिण भारतीय कुंडली (South Indian chart style)
- चौकोर कुंडली, जिसमें राशियाँ अपनी जगह स्थिर रहती हैं और लग्न पर निशान लगता है।
- दशम (MC) (Midheaven (MC))
- क्रांतिवृत्त का वह बिंदु जो जन्म के समय आकाश में सबसे ऊँचा (मध्याह्न रेखा पर) हो।
- दशमांश (D10) (Dashamsa (D10))
- राशि के दस हिस्से; काम और करियर से जोड़ा जाता है।
- दशा (Dasha)
- जीवन के समय को ग्रहों की बारी-बारी चलने वाली अवधियों में बाँटने की पद्धति।
- दशा संधि (Dasha sandhi)
- एक महादशा के ख़त्म होने और अगली के शुरू होने का जोड़; परंपरा इसे बदलाव का समय मानती है।
- दशानाथ (Dashanath (dasha lord))
- जिस ग्रह की दशा चल रही हो, वह उस अवधि का स्वामी।
- दान (Daan (charity))
- ज़रूरतमंद को कुछ देना, जिसे परंपरा ग्रहों से जोड़ती है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- दारकारक (Darakaraka)
- जैमिनी पद्धति में सबसे कम अंश वाला ग्रह, जिसे जीवनसाथी का कारक माना जाता है।
- दिग्बल (Dig bala (directional strength))
- किसी ग्रह को किसी एक भाव (दिशा) में मिलने वाला पूरा अंक; जैसे सूर्य-मंगल को दसवें में।
- दुःस्थान (त्रिक) (Dusthana (trik houses))
- छठा, आठवाँ और बारहवाँ भाव; यह मेहनत, बदलाव और ख़र्च के भावों का तकनीकी समूह-नाम है, कोई फ़ैसला नहीं।
- दुरुधरा योग (Durudhara yoga)
- चंद्रमा से दूसरे और बारहवें दोनों भावों में (सूर्य के सिवा) ग्रह।
- दुर्मुहूर्त (Durmuhurta)
- हर वार के कुछ मुहूर्त, जिन्हें मुहूर्त-ग्रंथ शुभ काम के लिए अलग रखते हैं।
- दृग् बल (Drik bala (aspectual strength))
- दूसरे ग्रहों की दृष्टि से मिलने या घटने वाला बल।
- दृष्टि (Drishti (aspect))
- एक ग्रह का दूसरे भाव पर 'देखना'; हर ग्रह सातवें को देखता है, मंगल 4-8, गुरु 5-9 और शनि 3-10 को भी।
- दोष (Dosha)
- किसी ख़ास ग्रह-स्थिति का पारंपरिक नाम जिसे शास्त्र ध्यान से देखने को कहते हैं; ePandit इसे निवारण के साथ, बिना डर के दिखाता है।
- द्रेष्काण (D3) (Drekkana (D3))
- राशि के 10-10 अंश के तीन हिस्से; भाई-बहन से जोड़ा जाता है।
- द्वादशांश (D12) (Dwadashamsa (D12))
- राशि के बारह हिस्से; माता-पिता से जोड़ा जाता है।
- द्विस्वभाव राशि (Dwiswabhava rashi (dual sign))
- मिथुन, कन्या, धनु और मीन; इनमें चर और स्थिर दोनों के गुण माने जाते हैं।
- धन भाव (Dhana bhava (2nd house))
- दूसरा भाव: संचय, परिवार, वाणी और भोजन।
- धन योग (Dhana yoga)
- दूसरे-ग्यारहवें और पाँचवें-नौवें भाव के स्वामियों का संबंध, जिसे परंपरा कमाई से जोड़ती है; किसी रक़म का वादा नहीं।
- धनु (Dhanu (Sagittarius))
- नौवीं राशि, अग्नि तत्त्व, द्विस्वभाव; स्वामी गुरु।
- धर्म (भाग्य) भाव (Dharma bhava (9th house))
- नौवाँ भाव: धर्म, गुरु, पिता, लंबी यात्रा और भाग्य।
- नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा (Tithi groups (Nanda to Purna))
- तिथियों के पाँच समूह, जो हर पाँच तिथि पर दोहराते हैं; रिक्ता (4, 9, 14) को परंपरा नई शुरुआत के लिए कम चुनती है।
- नक्षत्र (Nakshatra)
- राशिचक्र के 13°20′ के 27 हिस्से, जिनमें चंद्रमा लगभग एक दिन रहता है।
- नक्षत्र देवता (Nakshatra deity)
- हर नक्षत्र से जुड़ा देवता, जैसे अश्विनी के अश्विनी कुमार।
- नक्षत्र समूह (मुहूर्त) (Nakshatra groups (muhurta))
- मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार स्वभाव से सात समूह: ध्रुव, चर, मृदु, क्षिप्र, मिश्र, उग्र और तीक्ष्ण।
- नक्षत्र स्वामी (Nakshatra lord)
- विंशोत्तरी क्रम में हर नक्षत्र का स्वामी ग्रह, जैसे अश्विनी का केतु।
- नाड़ी (Nadi)
- नक्षत्र से तीन समूह: आदि, मध्य, अंत्य; मिलान में सबसे ज़्यादा, 8 अंक।
- नाड़ी दोष (Nadi dosha)
- वर-वधू के जन्म-नक्षत्रों की एक ही नाड़ी होना; मुहूर्त-चिंतामणि इसके तीन निवारण देता है।
- नाभस योग (Nabhasa yogas)
- पूरी कुंडली में ग्रहों के फैलाव के आकार से बने योग; इनमें से एक 'सर्प योग' है।
- नाम अक्षर (Name syllable)
- जन्म-नक्षत्र के पद से मिलने वाला अक्षर, जिससे नाम शुरू करने की परंपरा है।
- नामकरण (Namkaran)
- शिशु का नाम रखने का संस्कार, प्रायः 11वें या 12वें दिन; पहला अक्षर जन्म-नक्षत्र के पद से।
- निरयन (Nirayana (sidereal))
- तारों के सापेक्ष नापा गया राशिचक्र; भारतीय ज्योतिष इसी का उपयोग करता है।
- निवारण (भंग) (Cancellation (bhanga))
- शास्त्रों में दी वे शर्तें जिनसे कोई योग या दोष लागू नहीं माना जाता; ePandit इन्हें साथ में दिखाता है।
- निष्क्रमण (Nishkraman)
- शिशु को पहली बार घर से बाहर ले जाकर सूर्य-दर्शन कराने का संस्कार।
- नीच (Neecha (debilitation))
- उच्च राशि से ठीक सातवीं राशि; यह गरिमा की एक तकनीकी स्थिति है, अकेले कोई फ़ैसला नहीं।
- नीचभंग (Neecha bhanga)
- कुछ शर्तें पूरी होने पर नीच स्थिति का 'भंग' (रद्द) माना जाना।
- नीचभंग राज योग (Neecha bhanga raja yoga)
- नीच ग्रह के नीचत्व रद्द होने की शर्तें पूरी होने पर फलदीपिका का गिना हुआ राज योग।
- नैसर्गिक बल (Naisargika bala (natural strength))
- हर ग्रह का स्थिर प्राकृतिक बल; सूर्य का सबसे अधिक (60 विरूप) और शनि का सबसे कम।
- नैसर्गिक मैत्री (Naisargika maitri (natural friendship))
- ग्रहों के बीच स्थायी मित्र, सम और शत्रु संबंध, जो हर कुंडली में एक जैसे रहते हैं।
- पंच महापुरुष योग (Pancha Mahapurusha yogas)
- मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि का लग्न से केंद्र में अपनी या उच्च राशि में होना।
- पंचक (Panchaka)
- चंद्रमा का कुंभ और मीन राशि (धनिष्ठा के उत्तरार्ध से रेवती तक) में रहना, जब परंपरा कुछ काम टालती है।
- पंचधा मैत्री (Panchadha maitri (fivefold relation))
- नैसर्गिक और तात्कालिक मैत्री को जोड़कर बने पाँच दर्जे: अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु, अधिशत्रु।
- पंचांग (Panchang)
- दिन के पाँच अंगों (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) वाला हिंदू कैलेंडर।
- पंचांग शुद्धि (Panchang shuddhi)
- मुहूर्त के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पाँचों को जाँचना।
- पक्ष (Paksha)
- चंद्र मास का आधा हिस्सा, 15 तिथियों का: शुक्ल या कृष्ण।
- पणफर (Panaphara (succedent houses))
- केंद्रों के बाद वाले भाव: दूसरा, पाँचवाँ, आठवाँ और ग्यारहवाँ।
- पद (चरण) (Pada (quarter))
- नक्षत्र का चौथाई हिस्सा, 3°20′; 108 पदों में से हर एक का अपना नाम-अक्षर है।
- परंपरा (स्रोत-लेबल) (Parampara (source label))
- जीवित परंपरा से आई बात का लेबल, जो हमारे ग्रंथ-संग्रह में नहीं मिली।
- पराशरी पद्धति (Parashari system)
- बृहत् पराशर होरा शास्त्र पर आधारित पद्धति, जिसमें विंशोत्तरी दशा और भाव-स्वामित्व मुख्य हैं; ePandit इसी पर चलता है।
- परिवर्तन योग (Parivartana yoga)
- दो भावों के स्वामियों का एक-दूसरे की राशि में बैठना (राशि-विनिमय)।
- पल (Pala (vighati))
- एक घटी का साठवाँ हिस्सा, यानी 24 सेकंड।
- पाया (Pāya)
- जन्म-पत्री में लिखी लोक-प्रथा (सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा); इससे कोई संस्कार या भाग्य तय नहीं होता।
- पितृ स्मरण (शांत जाँच) (Pitru check (calm))
- 'पितृ दोष' नाम हमारे ग्रंथों में नहीं मिला; ePandit केवल नौवें भाव और सूर्य की स्थिति दिखाता है, और श्राद्ध को पूर्वजों के स्मरण की जीवित परंपरा मानता है।
- पुत्र भाव (Putra bhava (5th house))
- पाँचवाँ भाव: संतान, बुद्धि, विद्या और पूर्व-पुण्य।
- पूर्णिमा (Purnima)
- शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं तिथि, जब चंद्रमा पूरा होता है।
- पूर्णिमांत (Purnimanta)
- पूर्णिमा पर ख़त्म होने वाला महीना; उत्तर भारत में प्रचलित।
- प्रत्यंतर दशा (Pratyantar dasha)
- अंतर्दशा के भीतर का तीसरा स्तर, उसी अनुपात से बँटा हुआ।
- प्रश्न (Prashna (horary))
- प्रश्न पूछे जाने के क्षण की कुंडली से उत्तर देखने की पद्धति।
- प्राण दशा (Prana dasha)
- सूक्ष्म दशा के भीतर का पाँचवाँ स्तर, जो कुछ घंटों का होता है।
- बिंदु (Bindu)
- अष्टकवर्ग में किसी योगदानकर्ता का किसी राशि को दिया गया एक अंक।
- बुध (Budh (Mercury))
- बुद्धि, वाणी और व्यापार का कारक माना जाने वाला ग्रह; मिथुन और कन्या का स्वामी, कन्या में उच्च।
- बुधादित्य योग (Budha-Aditya yoga)
- सूर्य और बुध का एक ही राशि में होना; बहुत आम योग, नाम परंपरा से।
- ब्रह्म मुहूर्त (Brahma muhurta)
- सूर्योदय से पहले का मुहूर्त (लगभग 96 से 48 मिनट पहले), जिसे परंपरा अध्ययन और ध्यान के लिए चुनती है।
- भकूट (Bhakoot)
- दोनों चंद्र राशियों के बीच की दूरी से बना कूट; मिलान में 7 अंक।
- भकूट दोष (Bhakoot dosha)
- दोनों चंद्र राशियों का 2–12, 5–9 या 6–8 पर होना; राशि-स्वामी एक हों या मित्र हों तो नहीं गिना जाता।
- भद्र योग (Bhadra yoga)
- बुध से बनने वाला पंच महापुरुष योग।
- भद्रा (विष्टि) (Bhadra (Vishti karana))
- सातवाँ चर करण, जिसे परंपरा नई शुरुआत के लिए नहीं चुनती; यह केवल समय चुनने का नियम है।
- भांश (D27) (Bhamsha / Saptavimshamsa (D27))
- राशि के सत्ताईस हिस्से; स्वभाव और सामर्थ्य से जोड़ा जाता है।
- भाव (Bhava (house))
- कुंडली के बारह हिस्से, जिनमें हर एक जीवन के कुछ विषयों से जुड़ा माना जाता है।
- भाव चलित (Bhava chalit)
- लग्न और दशम के असली अंशों से भाव बाँटने वाली कुंडली; ePandit श्रीपति पद्धति लेता है।
- भाव बल (Bhava bala)
- किसी भाव का गणितीय बल, जो उसके स्वामी, दिशा और दृष्टियों से बनता है।
- भाव मध्य (Bhava madhya (house midpoint))
- किसी भाव का बीच का अंश; चलित में लग्न पहले भाव का और दशम (MC) दसवें भाव का मध्य है।
- भाव संधि (Bhava sandhi (house junction))
- दो पास के भाव-मध्यों के बीच का बिंदु, जहाँ एक भाव ख़त्म और अगला शुरू होता है।
- भावेश (Bhavesh (house lord))
- किसी भाव में पड़ी राशि का स्वामी ग्रह।
- भिन्नाष्टकवर्ग (BAV) (Bhinnashtakavarga (BAV))
- एक ग्रह की अपनी तालिका, जिसमें हर राशि को 0 से 8 बिंदु मिलते हैं।
- भोग्य दशा (दशा शेष) (Dasha balance at birth)
- जन्म के समय पहली महादशा का बचा हुआ हिस्सा, जो चंद्रमा के नक्षत्र में बचे भाग से निकलता है।
- मंगल (Mangal (Mars))
- साहस और ऊर्जा का कारक माना जाने वाला ग्रह; मेष और वृश्चिक का स्वामी, मकर में उच्च।
- मंगल दोष (कुज दोष) (Mangal dosha (kuja dosha))
- लग्न, चंद्र या शुक्र से 2, 4, 7, 8 या 12वें भाव में मंगल, जब कोई निवारण लागू न हो; केवल विवाह-मिलान में देखा जाता है और अकेले कुछ तय नहीं करता।
- मंगल दोष परिहार (Mangal dosha parihar)
- वे शास्त्रीय शर्तें (भाव-वार छूट, सिंह-कुंभ, गुरु या चंद्र के साथ) जिनमें मंगल दोष लागू नहीं माना जाता।
- मंत्र (Mantra)
- किसी देवता या ग्रह से जुड़ा पवित्र वाक्य जिसका पाठ किया जाता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- मकर (Makara (Capricorn))
- दसवीं राशि, पृथ्वी तत्त्व, चर; स्वामी शनि।
- महादशा (Mahadasha)
- दशा का सबसे बड़ा स्तर; जैसे शुक्र की महादशा 20 वर्ष और सूर्य की 6 वर्ष।
- मारक स्थान (Maraka sthana)
- आयु-गणना की पुरानी पद्धति में दूसरे और सातवें भाव का शास्त्रीय नाम; ePandit आयु की गणना नहीं करता।
- मार्गी (Margi (direct))
- ग्रह की सामान्य, आगे की चाल; वक्री का उल्टा।
- मालव्य योग (Malavya yoga)
- शुक्र से बनने वाला पंच महापुरुष योग।
- मिथुन (Mithuna (Gemini))
- तीसरी राशि, वायु तत्त्व, द्विस्वभाव; स्वामी बुध।
- मीन (Meena (Pisces))
- बारहवीं राशि, जल तत्त्व, द्विस्वभाव; स्वामी गुरु।
- मुंडन (चूड़ाकर्म) (Mundan (chudakarma))
- बच्चे के जन्म के बाल पहली बार उतारने का संस्कार।
- मुंथा (Muntha)
- वर्षफल का एक बिंदु जो जन्म-लग्न से हर साल एक राशि आगे बढ़ता है।
- मुहूर्त (Muhurta)
- किसी काम के लिए चुना गया समय; इकाई के रूप में 48 मिनट (दिन-रात का तीसवाँ हिस्सा)।
- मूलत्रिकोण (Moolatrikona)
- ग्रह की अपनी राशि का एक तय हिस्सा जहाँ उसकी गरिमा स्वराशि से ऊपर मानी जाती है, जैसे सूर्य सिंह 0–20°।
- मेष (Mesha (Aries))
- पहली राशि, अग्नि तत्त्व, चर; स्वामी मंगल।
- यंत्र (Yantra)
- किसी देवता या ग्रह से जुड़ी ज्यामितीय आकृति, जिसका पूजा में उपयोग होता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- यमगंड (Yamaganda)
- राहु काल जैसा दिन का एक आठवाँ हिस्सा, जिसे ख़ासकर दक्षिण भारतीय पंचांग छापते हैं।
- युति (Yuti (conjunction))
- दो या अधिक ग्रहों का एक ही राशि (भाव) में होना।
- योग (कुंडली) (Yoga (chart combination))
- शास्त्रों में नियम सहित लिखा ग्रहों का कोई ख़ास मेल; कोई योग अकेले जीवन तय नहीं करता।
- योग (पंचांग) (Yoga (panchang))
- सूर्य और चंद्रमा के अंशों का जोड़ 13°20′ के हिस्सों में बाँटकर बने 27 योग, विष्कुंभ से वैधृति तक।
- योगकारक (Yogakaraka)
- वह ग्रह जो एक ही लग्न के लिए एक केंद्र और एक त्रिकोण दोनों का स्वामी हो, जैसे वृषभ और तुला लग्न के लिए शनि।
- योगिनी दशा (Yogini dasha)
- आठ योगिनियों (मंगला से संकटा) की 1 से 8 वर्ष की दशाओं वाला 36 वर्ष का चक्र।
- योनि (Yoni)
- हर नक्षत्र को दिया गया एक पशु-प्रतीक (14 पशु); मिलान में 4 अंक।
- रंध्र भाव (Randhra bhava (8th house))
- आठवाँ भाव: छिपे विषय, अचानक बदलाव, शोध और विरासत।
- रत्न (Ratna (gem))
- किसी ग्रह से जोड़ा गया रत्न; ePandit केवल कुंडली के कार्यकारी शुभ ग्रहों के लिए, हमेशा उपरत्न के साथ सुझाता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- राज योग (Raja yoga)
- केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का संबंध; ज़िम्मेदारी और अवसर की ओर झुकाव, किसी पद का वादा नहीं।
- राशि (Rashi (sign))
- राशिचक्र के 30-30 अंश के बारह बराबर हिस्से, मेष से मीन तक।
- राशि कुंडली (D1) (Rashi chart (D1))
- मुख्य जन्म-कुंडली, जिसमें हर भाव एक पूरी राशि होता है; बाकी सभी वर्ग इसी से बनते हैं।
- राशि स्वामी (Rashi swami (sign lord))
- हर राशि का स्वामी ग्रह, जैसे मेष का मंगल और वृषभ का शुक्र।
- राहु (Rahu)
- चंद्रमा की कक्षा का उत्तरी पात (कटान-बिंदु); ePandit इसका मध्यम (mean) स्थान लेता है।
- राहु काल (Rahu kaal)
- दिन के समय का आठवाँ हिस्सा, हर वार में अलग; परंपरा इसमें नई शुरुआत नहीं चुनती।
- रुचक योग (Ruchaka yoga)
- मंगल से बनने वाला पंच महापुरुष योग।
- रुद्राक्ष (Rudraksha)
- रुद्राक्ष वृक्ष का सूखा बीज, जिसे मुख (धारियों) की संख्या से पहचाना और माला में पहना जाता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- रूप (Rupa)
- षड्बल की बड़ी इकाई; 1 रूप = 60 विरूप।
- लग्न (Lagna (ascendant))
- जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही राशि और उसका अंश; यही पहला भाव बनता है।
- लग्न शुद्धि (Lagna shuddhi)
- मुहूर्त में काम के समय उदय हो रहे लग्न और उससे ग्रहों की स्थिति को जाँचना।
- लग्नेश (Lagnesh (lagna lord))
- लग्न की राशि का स्वामी ग्रह।
- लाभ भाव (Labha bhava (11th house))
- ग्यारहवाँ भाव: आय, लाभ, बड़े भाई-बहन और मित्र-मंडली।
- लाल किताब (Lal Kitab)
- उपायों की एक अलग परंपरा, जिसे ePandit उसी नाम के लेबल से दिखाता है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- लाहिड़ी अयनांश (Lahiri ayanamsa)
- चित्रा तारे को 180° पर रखने वाला (चित्रपक्ष) अयनांश, जो भारत के राष्ट्रीय पंचांग-सुधार में अपनाया गया; ePandit यही लेता है।
- लोक मान्यता (स्रोत-लेबल) (Lok manyata (source label))
- लोक-विश्वास से आई बात का लेबल।
- वक्री (Vakri (retrograde))
- पृथ्वी से देखने पर ग्रह का उल्टी दिशा में चलता दिखना; सूर्य-चंद्र कभी वक्री नहीं होते।
- वर्ग (विभागीय कुंडली) (Varga (divisional chart))
- हर राशि को बराबर हिस्सों में बाँटकर बनी सहायक कुंडली, जैसे नवांश (D9)।
- वर्गोत्तम (Vargottama)
- ग्रह (या लग्न) का राशि-कुंडली और नवांश दोनों में एक ही राशि में होना।
- वर्ज्य (Varjyam)
- हर नक्षत्र का एक तय हिस्सा, जिसे ख़ासकर दक्षिण भारतीय पंचांग नए काम के लिए अलग रखते हैं।
- वर्ण (कूट) (Varna (koota))
- चंद्र राशि के तत्त्व से बनी एक पुरानी ज्योतिषीय श्रेणी, जाति नहीं; मिलान में 1 अंक।
- वर्षेश (Varshesh (year lord))
- वर्षफल में पाँच अधिकारियों में से चुना गया उस साल का स्वामी ग्रह।
- वश्य (Vashya)
- चंद्र राशि से पाँच समूह (चतुष्पद, मानव, जलचर, वनचर, कीट); मिलान में 2 अंक।
- वार (Vaar (weekday))
- सप्ताह का दिन, जिसका एक ग्रह-स्वामी है; पंचांग में दिन सूर्योदय से बदलता है।
- विंशांश (D20) (Vimshamsa (D20))
- राशि के बीस हिस्से; उपासना और आध्यात्मिक जीवन से जोड़ा जाता है।
- विंशोत्तरी दशा (Vimshottari dasha)
- 120 वर्ष का चक्र, जिसमें नौ ग्रहों की महादशा जन्म-नक्षत्र के स्वामी से शुरू होती है।
- विंशोपक बल (Vimshopaka bala)
- वर्गों में ग्रह की गरिमा से बना 20 में से अंक।
- विक्रम संवत (Vikram Samvat)
- उत्तर भारत में प्रचलित संवत, जो ईसवी सन से लगभग 57 वर्ष आगे है।
- विद्यारंभ (Vidyarambh)
- बच्चे की पढ़ाई की शुरुआत का संस्कार, पहले अक्षर लिखवाकर।
- विपरीत राज योग (Vipareeta raja yoga)
- छठे, आठवें या बारहवें के स्वामी का इन्हीं तीन में से किसी भाव में होना (हर्ष, सरल, विमल)।
- विपरीत वेध (Vipareeta vedha)
- वेध का उल्टा: किसी कठिन गोचर का फल दूसरे ग्रह की स्थिति से रुक जाना।
- विमल योग (Vimala yoga)
- बारहवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12 में।
- विरूप (षष्ट्यंश) (Virupa (shashtiamsa))
- षड्बल की छोटी इकाई, एक रूप का साठवाँ हिस्सा।
- विवाह (Vivah)
- विवाह संस्कार, जिसके मुहूर्त और मिलान के नियम मुहूर्त-ग्रंथों में हैं।
- विशेष दृष्टि (Vishesh drishti (special aspect))
- सातवीं के अलावा मंगल (4, 8), गुरु (5, 9) और शनि (3, 10) की अतिरिक्त पूरी दृष्टि।
- विषम और सम राशि (Odd and even signs)
- मेष से गिनने पर विषम (1, 3, 5…) राशियाँ पुरुष और सम (2, 4, 6…) राशियाँ स्त्री मानी जाती हैं।
- वृद्धि तिथि (Vriddhi tithi)
- वह तिथि जो दो सूर्योदयों तक चले, इसलिए दो दिन लिखी जाती है।
- वृश्चिक (Vrishchika (Scorpio))
- आठवीं राशि, जल तत्त्व, स्थिर; स्वामी मंगल।
- वृषभ (Vrishabha (Taurus))
- दूसरी राशि, पृथ्वी तत्त्व, स्थिर; स्वामी शुक्र।
- वेध (Vedha (obstruction))
- गोचर का वह नियम जिसमें किसी दूसरे ग्रह की स्थिति किसी अनुकूल गोचर का फल रोक देती है।
- व्यय भाव (Vyaya bhava (12th house))
- बारहवाँ भाव: ख़र्च, दूर देश, एकांत और मोक्ष।
- व्रत (Vrat (fast))
- किसी तिथि या वार पर संयम या उपवास का संकल्प; सेहत के लिए डॉक्टर की सलाह पहले; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- शक संवत (Shaka Samvat)
- भारत के राष्ट्रीय कैलेंडर का संवत, जो ईसवी सन से 78 वर्ष पीछे है।
- शनि (Shani (Saturn))
- अनुशासन, मेहनत और समय का कारक माना जाने वाला ग्रह; मकर और कुंभ का स्वामी, तुला में उच्च।
- शश योग (Shasha yoga)
- शनि से बनने वाला पंच महापुरुष योग।
- शास्त्र (स्रोत-लेबल) (Shastra (source label))
- ePandit पर वह लेबल जो किसी नामित ग्रंथ से जाँची गई बात पर लगता है।
- शुक्र (Shukra (Venus))
- प्रेम, कला और सुख-सुविधा का कारक माना जाने वाला ग्रह; वृषभ और तुला का स्वामी, मीन में उच्च।
- शुक्ल पक्ष (Shukla paksha)
- अमावस्या से पूर्णिमा तक का बढ़ते चंद्रमा का पखवाड़ा।
- शोधन (Shodhana (reduction))
- अष्टकवर्ग के अंकों को त्रिकोण और एकाधिपत्य नियमों से घटाने की प्रक्रिया; ePandit बिना घटाए अंक दिखाता है।
- षड्बल (Shadbala)
- ग्रह के बल का छह हिस्सों को जोड़कर बना गणितीय माप; अंक अकेले कोई फल तय नहीं करता।
- षड्वर्ग (Shadvarga)
- छह वर्गों का समूह: D1, D2, D3, D9, D12 और D30।
- षष्ट्यंश (D60) (Shashtiamsa (D60))
- राशि के साठ हिस्से, हर एक आधा अंश; जन्म-समय के प्रति सबसे संवेदनशील वर्ग।
- षष्ठ (रिपु) भाव (Ripu bhava (6th house))
- छठा भाव: रोज़ का काम, सेवा, क़र्ज़ और प्रतिस्पर्धा।
- षोडश संस्कार (Shodash sanskar)
- परंपरा के सोलह मुख्य संस्कार, गर्भाधान से लेकर विवाह और उसके बाद तक।
- षोडशवर्ग (Shodashvarga)
- पराशर के सोलह वर्ग, D1 से D60 तक।
- षोडशांश (D16) (Shodashamsa (D16))
- राशि के सोलह हिस्से; वाहन और सुख-साधन से जोड़ा जाता है।
- संक्रांति (Sankranti)
- सूर्य का एक निरयन राशि से अगली में जाना; जैसे मकर संक्रांति।
- संस्कार (Sanskar)
- जीवन के मोड़ों पर किए जाने वाले वैदिक अनुष्ठान, जैसे नामकरण और अन्नप्राशन।
- संहिता (Samhita)
- ज्योतिष का वह अंग जो मौसम, शकुन, वास्तु और समाज से जुड़े विषय देखता है।
- सप्तवर्ग (Saptavarga)
- षड्वर्ग में सप्तांश (D7) जोड़कर सात वर्गों का समूह; षड्बल के एक हिस्से में काम आता है।
- सप्तांश (D7) (Saptamsa (D7))
- राशि के सात हिस्से; संतान से जोड़ा जाता है।
- सरल योग (Sarala yoga)
- आठवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12 में।
- सर्वाष्टकवर्ग (SAV) (Sarvashtakavarga (SAV))
- सातों BAV तालिकाओं का राशि-वार जोड़; हर कुंडली में कुल 337।
- सहज भाव (Sahaja bhava (3rd house))
- तीसरा भाव: छोटे भाई-बहन, साहस, लेखन और छोटी यात्राएँ।
- साढ़े साती (Sade sati)
- जन्म-राशि से 12वीं, 1ली और 2री राशि में शनि का गोचर, लगभग साढ़े सात वर्ष; इसे अकेले नहीं, वेध, अष्टकवर्ग और दशा के साथ पढ़ा जाता है।
- सायन (Sayana (tropical))
- वसंत विषुव से नापा गया राशिचक्र, जो पश्चिमी ज्योतिष में चलता है।
- सिंह (Simha (Leo))
- पाँचवीं राशि, अग्नि तत्त्व, स्थिर; स्वामी सूर्य।
- सिद्धांत (Siddhanta)
- ज्योतिष का गणित-खगोल वाला अंग, जो ग्रहों की स्थिति निकालता है।
- सुख भाव (Sukha bhava (4th house))
- चौथा भाव: माता, घर, वाहन और मन का सुख।
- सुनफा योग (Sunapha yoga)
- चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य के सिवा कोई ग्रह।
- सूक्ष्म दशा (Sookshma dasha)
- प्रत्यंतर के भीतर का चौथा स्तर, जो कुछ दिनों का होता है।
- सूर्य (Surya (Sun))
- आत्मा और पिता का कारक माना जाने वाला ग्रह; सिंह का स्वामी, मेष में उच्च।
- सूर्योदय (Suryoday (sunrise))
- पंचांग के दिन की शुरुआत; स्थान बदलने से इसका समय और दिन के अंग बदलते हैं।
- सेवा (Seva (service))
- माता-पिता, बड़ों, गाय या ज़रूरतमंद की सेवा, जिसे परंपरा हर ग्रह से जोड़ती है; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- सौम्य और क्रूर ग्रह (Saumya and krura grahas)
- स्वभाव से ग्रहों का पुराना वर्गीकरण: गुरु, शुक्र, बुध, बढ़ता चंद्र सौम्य; सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु क्रूर; यह कोई फ़ैसला नहीं।
- सौर मास (Saura masa (solar month))
- सूर्य के एक राशि में रहने का समय, एक संक्रांति से अगली तक।
- स्थान बल (Sthana bala (positional strength))
- राशि, उच्च-नीच, वर्ग और केंद्र आदि में स्थिति से मिलने वाला बल।
- स्थिर राशि (Sthira rashi (fixed sign))
- वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ; परंपरा इन्हें ठहराव से जोड़ती है।
- स्रोत-लेबल (Source label)
- हर उपाय के साथ लिखा उसका स्रोत: शास्त्र, परंपरा, लोक मान्यता या लाल किताब।
- स्वक्षेत्र (स्वराशि) (Svakshetra (own sign))
- ग्रह का अपनी ही राशि में होना, जैसे शुक्र तुला में।
- हंस योग (Hamsa yoga)
- गुरु से बनने वाला पंच महापुरुष योग।
- हर्ष योग (Harsha yoga)
- छठे भाव का स्वामी 6, 8 या 12 में।
- हवन (होम) (Havan (homa))
- अग्नि में आहुति देने का वैदिक अनुष्ठान; केवल मार्गदर्शन, हर बात के साथ उसका स्रोत लिखा।
- होरा (Hora (planetary hour))
- सूर्योदय से गिने गए दिन-रात के 24 हिस्से, हर एक का एक ग्रह-स्वामी; पहली होरा उस वार के स्वामी की।
- होरा (D2) (Hora (D2))
- राशि के दो हिस्से (सूर्य और चंद्र की होरा); परंपरा इसे धन-संपत्ति से जोड़ती है।
- होरा शास्त्र (Hora shastra)
- ज्योतिष का वह अंग जो जन्म-कुंडली के फल से जुड़ा है (सिद्धांत और संहिता के साथ तीन स्कंधों में से एक)।