परिचय
घर में नया बच्चा आता है तो सबसे पहला सवाल होता है: "नाम क्या रखेंगे?" नामकरण संस्कार इसी का उत्सव है। मुहूर्त-चिंतामणि इसे जातकर्म (जन्म के समय के संस्कार) के साथ बताता है।
एक बात सबसे पहले: हर परिवार की अपनी कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। कहीं नामकरण छठी पर होता है, कहीं बरही पर, कहीं महीने भर बाद। नीचे की बातें शास्त्र की आम राह हैं; आपके घर की रीति उससे अलग हो, तो वही मानें।
कौन-सा दिन
मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण, श्लोक 11) के अनुसार नामकरण जन्म से 11वें या 12वें दिन किया जाता है। उस दिन संभव न हो, तो बाद का कोई अच्छा दिन चुना जा सकता है। माँ और बच्चे का आराम पहले है।
दिन चुनते समय परंपरा ये बातें देखती है:
- तिथि: पर्व-तिथियाँ (कृष्ण अष्टमी, कृष्ण चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा) छोड़ी जाती हैं। रिक्ता तिथियाँ (4, 9, 14) भी नहीं ली जातीं।
- नक्षत्र: मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा (फाल्गुनी, आषाढ़ा, भाद्रपद), रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा।
धर्मसिंधु क्या जोड़ता है
धर्मसिंधु (नामकरण-काल) वार के लिए सोम, बुध, गुरु और शुक्र को अच्छा मानता है, और कुछ समय टालने को कहता है: वैधृति और व्यतीपात योग, संक्रांति, ग्रहण के दिन, अमावस्या और भद्रा।
समय के बारे में धर्मसिंधु साफ़ कहता है:
"अपराह्णे रात्रौ च नामकर्म वर्ज्यम्"
यानी दोपहर बाद और रात में नामकरण नहीं किया जाता। इसलिए सुबह का समय सबसे अच्छा है। बच्चे के लिए भी यह आसान है: सुबह वह ज़्यादातर शांत और आराम में रहता है।
एक बात और: पाया नामकरण की कोई शर्त नहीं है। पाया देखने के दो अलग तरीके हैं जो अलग उत्तर देते हैं, और कोई संस्कार उस पर निर्भर नहीं करता।
नाम का पहला अक्षर
उत्तर भारत की परंपरा में नाम का पहला अक्षर जन्म-नक्षत्र के चरण से लिया जाता है। हर नक्षत्र के 4 चरण हैं और हर चरण का एक अक्षर है। जैसे अश्विनी के चार चरणों के अक्षर चू, चे, चो, ला हैं।
ePandit के नामाक्षर कैलकुलेटर में जन्म की तारीख, समय और जगह डालें; वह जन्म-नक्षत्र, चरण और नामाक्षर बता देगा। हर नक्षत्र के पेज पर उसके चारों अक्षर भी लिखे हैं। कई परिवार राशि-नाम (पुकार का नाम अलग) रखते हैं; यह भी पूरी तरह ठीक है।
संस्कार कैसे होता है
आमतौर पर घर पर ही, सादगी से:
- गणेश जी का स्मरण: ॐ गं गणपतये नमः
- माता-पिता बच्चे को गोद में लेकर बैठते हैं।
- कई घरों में पिता या दादा-दादी बच्चे के दाहिने कान में धीरे से नाम बोलते हैं; कहीं थाली में चावल पर नाम लिखा जाता है।
- बड़े आशीर्वाद देते हैं, और घर में मिठाई बँटती है।
भीड़ कम रखें। नवजात के लिए शोर, धुआँ और बहुत सारे हाथ थका देने वाले होते हैं।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत, खान-पान या किसी भी तकलीफ़ के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। मुहूर्त डॉक्टर की सलाह के हिसाब से आगे-पीछे किया जा सकता है।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न दें; घुट्टी, सिक्का या अँगूठी भी मुँह के पास न रखें।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- कान छिदवाने में साफ़ औज़ार: कर्णवेध हो तो केवल कीटाणु-रहित (स्टेराइल) औज़ार और प्रशिक्षित हाथ।
- बच्चे को रत्न या नग न बाँधें: छोटे बच्चों पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।
- हवन का धुआँ: हवन हो तो बच्चे को धुएँ से दूर, हवादार कमरे में रखें।