परिचय
छह-सात महीने का बच्चा जब बड़ों को खाते देखकर हाथ बढ़ाने लगता है, तो घर में अन्नप्राशन की बात शुरू होती है। बंगाल में इसे "मुखे भात", केरल में "चोरूणु" और उत्तर भारत में "पासनी" या "अन्नप्राशन" कहते हैं। नाम अलग हैं, भावना एक: बच्चा अब परिवार की थाली में शामिल हो रहा है।
सबसे पहले: आपके परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। कहीं यह मंदिर में होता है, कहीं घर पर; कहीं मामा पहला निवाला खिलाते हैं, कहीं दादा-दादी। अपनी रीति मानें।
कौन-सा महीना
मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण, श्लोक 17) के अनुसार:
- बेटे के लिए छठा या आठवाँ महीना (सम महीने)
- बेटी के लिए पाँचवाँ या सातवाँ महीना (विषम महीने)
समय यही ग्रंथ दोपहर से पहले का बताता है, और प्रचलित परंपरा दिन शुक्ल पक्ष में रखना पसंद करती है। पंडित जी पंचांग देखकर तिथि, वार और नक्षत्र मिलाते हैं; रिक्ता तिथियाँ और भद्रा आमतौर पर छोड़ी जाती हैं।
डॉक्टर पहले, फिर मुहूर्त
यह बात साफ़ रहे: बच्चे का ठोस आहार कब शुरू हो, यह डॉक्टर तय करते हैं, मुहूर्त नहीं। आमतौर पर डॉक्टर लगभग 6 महीने पर ठोस आहार शुरू करने की सलाह देते हैं, पर हर बच्चा अलग है।
अगर परंपरा का महीना डॉक्टर की सलाह से पहले आ रहा है, जैसे बेटी का पाँचवाँ महीना, तो दो रास्ते हैं:
- संस्कार सातवें महीने में करें।
- या पाँचवें महीने में संस्कार करें, पर पहला निवाला केवल सांकेतिक रखें: साफ़ चम्मच होंठों से छुआ दें। असली ठोस आहार डॉक्टर के कहने पर शुरू करें।
दोनों रास्ते पूरी तरह ठीक हैं।
पहला निवाला: सांकेतिक, छोटा और सुरक्षित
अन्नप्राशन का पहला निवाला सांकेतिक है। बच्चे का पेट भरना मकसद नहीं, आशीर्वाद देना है।
- अक्सर चावल की पतली खीर बनती है। उसे बिल्कुल नरम, गुनगुना और बिना मेवे के टुकड़ों के रखें।
- खीर में शहद न डालें, और चीनी बहुत कम।
- चम्मच की नोक भर काफ़ी है। बच्चा मुँह फेरे तो ज़बरदस्ती न करें।
- पूरी थाली के पकवान बड़ों के लिए हैं; बच्चे को सिर्फ़ वही दें जो डॉक्टर ने बताया हो।
परंपरा में भगवान को भोग लगाकर, गणेश जी का स्मरण करके (ॐ गं गणपतये नमः) यह निवाला दिया जाता है।
वस्तु चुनने का खेल
कई घरों में बच्चे के सामने किताब, कलम, मिट्टी, सिक्का जैसी चीज़ें रखी जाती हैं, और देखते हैं कि वह पहले क्या उठाता है। यह लोक मान्यता है और एक प्यारा खेल है, भविष्यवाणी नहीं। बच्चा जो भी उठाए, सब हँसें और ताली बजाएँ। छोटी चीज़ें, जैसे सिक्का या अँगूठी, बच्चे की पहुँच में अकेले न छोड़ें।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत, खान-पान या किसी भी तकलीफ़ के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। मुहूर्त डॉक्टर की सलाह के हिसाब से आगे-पीछे किया जा सकता है।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न दें; घुट्टी, सिक्का या अँगूठी भी मुँह के पास न रखें।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- कान छिदवाने में साफ़ औज़ार: कर्णवेध हो तो केवल कीटाणु-रहित (स्टेराइल) औज़ार और प्रशिक्षित हाथ।
- बच्चे को रत्न या नग न बाँधें: छोटे बच्चों पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।
- खाने की नई चीज़: कोई भी नया खाना डॉक्टर की सलाह से, एक बार में एक।