परिचय
सोलह संस्कारों में जन्म के बाद का पहला संस्कार जातकर्म है। "जात" यानी जन्मा हुआ। यह वह पल है जब परिवार नए सदस्य का स्वागत करता है, उसे आशीर्वाद देता है, और भगवान को धन्यवाद देता है।
आज ज़्यादातर बच्चे अस्पताल में जन्म लेते हैं, जहाँ पुरानी पूरी विधि करना संभव नहीं होता। इसलिए बहुत-से परिवार जातकर्म को बहुत छोटा और सांकेतिक रखते हैं, या घर आने पर नामकरण के साथ करते हैं।
सबसे पहले: आपके परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। कहीं दादा जी बच्चे के कान में भगवान का नाम कहते हैं, कहीं पिता सोने की सलाई से जीभ पर "ॐ" लिखने का भाव करते हैं, कहीं बस घर के मंदिर में दीया जलाकर प्रार्थना होती है। अपनी रीति मानें।
कब किया जाता है
धर्मसिंधु के अनुसार जातकर्म जन्म के समय ही किया जाता है। पिता कुल-देवता और बड़ों को प्रणाम करके बच्चे का मुख देखते हैं, स्नान करते हैं, और फिर संस्कार करते हैं।
अगर किसी कारण से उस समय न हो पाए, तो मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण 11) बताता है कि जातकर्म जन्म से 11वें या 12वें दिन, या बाद में किसी अच्छे दिन किया जा सकता है। इसके लिए रिक्ता और पर्व-तिथियाँ छोड़ी जाती हैं और मृदु, ध्रुव, क्षिप्र और चर नक्षत्र लिए जाते हैं। यही श्लोक नामकरण का भी समय बताता है, इसलिए बहुत-से परिवार दोनों संस्कार एक ही दिन कर लेते हैं। धर्मसिंधु भी दोनों को साथ करने की रीति देता है।
पुरानी रीति: धर्मसिंधु क्या बताता है
धर्मसिंधु जातकर्म की विधि विस्तार से देता है। उसके मुख्य हिस्से हैं:
- पिता का स्नान और संकल्प, स्वस्तिवाचन, पुण्याहवाचन और मातृका-पूजन।
- बच्चे की आयु और मेधा (अच्छी बुद्धि) के लिए प्रार्थना।
- होम के बाद मधु और घृत (शहद और घी) से "प्राशन", यानी बच्चे को चटाने की रीति।
- फिर माँ बच्चे को स्तनपान कराती है। धर्मसिंधु की विधि में यह साफ़ लिखा है।
यह पुराने समय की रीति है, और इसका भाव सुंदर है: बच्चे के जीवन की शुरुआत मिठास, पोषण और आशीर्वाद से हो। आज हम वही भाव रखते हुए तरीका बच्चे की सुरक्षा के हिसाब से बदलते हैं।
आज कैसे करें: भाव वही, तरीका सुरक्षित
मधु-घृत वाली रीति आज सिर्फ़ सांकेतिक रखें। डॉक्टर एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न देने की सलाह देते हैं। इसलिए:
- बच्चे के मुँह में कुछ भी न डालें: न शहद, न घी, न घुट्टी, न पानी, जब तक डॉक्टर न कहें।
- चाहें तो साफ़ सोने या चाँदी की सलाई या चम्मच को बिना कुछ लगाए बस हाथ में लेकर प्रार्थना करें, या उसे एक कटोरी मधु के पास रखकर भगवान को भोग लगाएँ। मधु बड़ों के प्रसाद के लिए है।
- बच्चे के कान के पास धीरे से भगवान का नाम या परिवार का प्रिय मंत्र कहें। यह भाव इस संस्कार का सबसे प्यारा हिस्सा है।
- पहला आहार माँ का दूध, जैसा डॉक्टर और नर्स बताएँ। यह बात पुरानी विधि और आज की चिकित्सा, दोनों में एक है।
अस्पताल में हों तो बस इतना काफ़ी है: पिता या दादा-दादी बच्चे को गोद में लेकर प्रार्थना करें, और घर लौटकर मंदिर में दीया जलाएँ।
बेटा और बेटी, दोनों के लिए
जातकर्म बेटी के लिए भी उतना ही है जितना बेटे के लिए। धर्मसिंधु में साफ़ लिखा है कि "पुत्र" शब्द में कन्या भी आती है, और कन्या के जातकर्म आदि संस्कार भी किए जाते हैं। आज बहुत-से परिवार बेटी के जन्म पर उतनी ही खुशी से यह संस्कार करते हैं, और यही सही है।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: नवजात और माँ की सेहत के लिए डॉक्टर और नर्स ही पहला सहारा हैं। कोई भी रीति अस्पताल के नियमों और डॉक्टर की सलाह के बाद।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल नहीं; घुट्टी, पानी, सिक्का या अँगूठी भी नहीं।
- आँख और नाल: आँखों में काजल या सुरमा न लगाएँ, और नाल पर कुछ न लगाएँ; जो डॉक्टर बताएँ वही करें।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- रत्न या नग नहीं: छोटे बच्चे पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।
- माँ का आराम: माँ को पूरा आराम मिले। संस्कार छोटा रखें, भीड़ कम रखें, और जो लोग बीमार हों वे बच्चे से दूर रहें।
- होम और दीया: आग बच्चे और माँ से दूर रखें, और धुआँ कमरे में न भरने दें।