तिथि: चंद्रमा की चाल से बना दिन

तिथि पंचांग का पहला अंग है। चंद्रमा जब सूर्य से 12° और आगे निकल जाता है, तो एक तिथि पूरी होती है। एक महीने में 30 तिथियाँ होती हैं, और ज़्यादातर व्रत उसी तिथि से माने जाते हैं जो सूर्योदय के समय चल रही हो।

स्रोत: Muhūrta-cintāmaṇi (MC), Śubhāśubha-prakaraṇa: Nandā, Bhadrā, Jayā, Riktā, Pūrṇā tithi groups

आपकी कुंडली में

कुल तिथियाँ
30 (15 शुक्ल पक्ष + 15 कृष्ण पक्ष)
एक तिथि
चंद्रमा और सूर्य के बीच 12° का अंतर
नंदा
प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी (1, 6, 11)
मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण (नंदा आदि तिथि-समूह)
भद्रा
द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी (2, 7, 12)
मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण (नंदा आदि तिथि-समूह)
जया
तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी (3, 8, 13)
मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण (नंदा आदि तिथि-समूह)
रिक्ता
चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी (4, 9, 14)
मुहूर्त-चिंतामणि, शुभाशुभ-प्रकरण (नंदा आदि तिथि-समूह)

परिचय

पंचांग के पाँच अंग हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इनमें तिथि सबसे ज़्यादा काम आती है। घर में जब कोई पूछता है "कल कौन-सी तिथि है?", तो असल में वह पूछ रहा होता है कि चंद्रमा सूर्य से कितनी दूर पहुँच गया है।

तिथि घड़ी का दिन नहीं है। यह चंद्रमा की चाल से बनती है, इसलिए कोई तिथि 20 घंटे की भी हो सकती है और कोई 26 घंटे की भी। इसी कारण पंचांग में हर तिथि के साथ उसके खत्म होने का समय लिखा रहता है।

तिथि कैसे बनती है

अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा लगभग एक ही जगह होते हैं। उसके बाद चंद्रमा तेज़ चलकर सूर्य से आगे निकलता है। चंद्रमा और सूर्य के बीच का अंतर जब 0° से 12° तक होता है, तो पहली तिथि (प्रतिपदा) चलती है; 12° से 24° तक दूसरी (द्वितीया); और इसी तरह आगे।

360° को 12° से बाँटें तो 30 तिथियाँ बनती हैं। बी. वी. रमन की A Manual of Hindu Astrology में यही गणना का तरीका दिया गया है। ePandit का इंजन भी आपके शहर के सूर्योदय पर सूर्य-चंद्र की स्थिति से तिथि निकालता है।

शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष

पहली 15 तिथियाँ शुक्ल पक्ष कहलाती हैं: चंद्रमा रोज़ बढ़ता दिखता है और 15वीं तिथि पूर्णिमा होती है। अगली 15 तिथियाँ कृष्ण पक्ष हैं: चंद्रमा घटता दिखता है और 30वीं तिथि अमावस्या होती है।

दोनों पक्षों में तिथियों के नाम वही रहते हैं: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी। इसीलिए "शुक्ल एकादशी" और "कृष्ण एकादशी" अलग-अलग दिन हैं। दोनों पक्ष अपनी जगह ठीक हैं; एक को अच्छा और दूसरे को खराब मानना सही नहीं।

तिथियों के पाँच समूह

मुहूर्त-चिंतामणि तिथियों को पाँच समूहों में बाँटता है। हर पक्ष में यह क्रम तीन बार आता है:

समूह तिथियाँ
नंदा 1, 6, 11
भद्रा 2, 7, 12
जया 3, 8, 13
रिक्ता 4, 9, 14
पूर्णा 5, 10, 15 / 30

नाम अपने आप में अर्थ बताते हैं: नंदा यानी आनंद देने वाली, भद्रा यानी कल्याण की, जया यानी जीत की, रिक्ता यानी "खाली", और पूर्णा यानी भरी हुई। परंपरा नए काम की शुरुआत के लिए आमतौर पर रिक्ता तिथियाँ नहीं चुनती। पर इसका यह अर्थ नहीं कि उस दिन कुछ गलत होगा; चतुर्थी पर गणेश जी का और नवमी पर देवी का व्रत बड़े प्रेम से रखा जाता है।

(करण वाली "भद्रा" एक अलग चीज़ है; उसके लिए करण वाला पेज देखें।)

सूर्योदय की तिथि क्यों मानी जाती है

ज़्यादातर व्रत और त्योहारों के लिए वही तिथि मानी जाती है जो सूर्योदय के समय चल रही हो, भले वह दोपहर में खत्म हो जाए। धर्मसिंधु जैसे निर्णय-ग्रंथ इसी तरह के नियम विस्तार से देते हैं, और कुछ पर्वों के अपने अलग नियम भी हैं। जैसे जन्माष्टमी में आधी रात की तिथि देखी जाती है।

इसलिए पंचांग देखते समय दो बातें देखिए: आज सूर्योदय पर कौन-सी तिथि है, और वह कितने बजे तक है।

क्षय और वृद्धि तिथि

कभी कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले खत्म हो जाती है। तब वह किसी भी सूर्योदय को नहीं छूती, और कैलेंडर में "छूट गई" दिखती है। इसे क्षय तिथि कहते हैं।

कभी उल्टा होता है: कोई लंबी तिथि दो सूर्योदयों को छू लेती है, तो दो दिन एक ही तिथि लिखी जाती है। इसे वृद्धि तिथि कहते हैं।

यह चंद्रमा की बदलती चाल का सीधा नतीजा है, कोई गड़बड़ी नहीं। इसी वजह से दो पंचांगों में कभी एक दिन का फ़र्क दिखता है: शहर बदलने से सूर्योदय बदलता है।

एकादशी: स्मार्त और वैष्णव नियम

एकादशी का व्रत बहुत लोग रखते हैं, और कभी-कभी कैलेंडर में "स्मार्त एकादशी" और "वैष्णव एकादशी" अलग-अलग दिन लिखी दिखती है। घबराने की बात नहीं है।

  • स्मार्त परंपरा मोटे तौर पर सूर्योदय की तिथि देखती है।
  • वैष्णव परंपरा सूर्योदय से पहले के अरुणोदय काल (लगभग डेढ़ घंटा पहले) को भी देखती है। अगर उस समय दशमी चल रही हो, तो वे अगले दिन व्रत रखते हैं।

दोनों नियम पुराने हैं और दोनों का आदर है। जिस संप्रदाय या कुल-परंपरा से आपका परिवार जुड़ा है, उसी के अनुसार चलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तिथि और तारीख में क्या फ़र्क है?

तारीख आधी रात को बदलती है और हर दिन बराबर लंबा होता है। तिथि चंद्रमा और सूर्य के 12° अंतर से बनती है, इसलिए उसकी लंबाई बदलती रहती है और वह दिन में किसी भी समय बदल सकती है।

आज की तिथि किस समय की देखें?

ज़्यादातर व्रतों के लिए अपने शहर के सूर्योदय की तिथि देखें। कुछ पर्वों के अलग नियम हैं, जैसे जन्माष्टमी में आधी रात की तिथि।

रिक्ता तिथि पर क्या कुछ नहीं करना चाहिए?

परंपरा नई शुरुआत, जैसे गृह-प्रवेश या कोई संस्कार, के लिए इन्हें आमतौर पर नहीं चुनती। रोज़ के काम, पूजा और व्रत सामान्य रूप से चलते हैं। चतुर्थी और नवमी तो बड़े व्रतों के दिन हैं।

दो पंचांगों में तिथि अलग क्यों दिखती है?

सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है। कोई तिथि दिल्ली में सूर्योदय छू लेती है और कहीं और नहीं छूती। अपने शहर का पंचांग देखें।

मेरी जन्म-तिथि कैसे पता करूँ?

जन्म के समय चंद्रमा सूर्य से कितना आगे था, उससे जन्म-तिथि निकलती है। मुफ़्त कुंडली में जन्म-तिथि और पक्ष दोनों लिखे आते हैं।

आगे पढ़ें

आधार ग्रंथ

  • Muhūrta-cintāmaṇi (MC) · Śubhāśubha-prakaraṇa: Nandā, Bhadrā, Jayā, Riktā, Pūrṇā tithi groups
  • B. V. Raman, A Manual of Hindu Astrology · calculation of the tithi from Sun and Moon longitudes
  • Dharmasindhu · tithi-nirṇaya: deciding the tithi for vrats, including Ekadashi

शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान · अंतिम बार जाँचा: 2026-10-13