करण: आधी तिथि का माप

करण पंचांग का पाँचवाँ अंग है: एक करण आधी तिथि के बराबर होता है। कुल 11 करण हैं, 4 स्थिर और 7 चर। सातवाँ चर करण विष्टि ही "भद्रा" कहलाता है, जिसे परंपरा नई शुरुआत के लिए नहीं चुनती।

स्रोत: B. V. Raman, A Manual of Hindu Astrology, the 11 karanas and their calculation as halves of a tithi

आपकी कुंडली में

एक करण
आधी तिथि: चंद्र-सूर्य अंतर के 6°
करण
11 (4 स्थिर + 7 चर); एक महीने में 60 आधे हिस्से
स्थिर करण
शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न
चर करण
बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि
भद्रा
विष्टि करण का दूसरा नाम

परिचय

पंचांग के पाँच अंग हैं: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। करण सबसे छोटा माप है: एक तिथि में दो करण होते हैं। तिथि चंद्रमा और सूर्य के बीच 12° के अंतर से बनती है, तो करण 6° के अंतर से। एक चांद्र महीने में 30 तिथियाँ हैं, इसलिए 60 करण-हिस्से।

त्योहारों के समय "भद्रा" शब्द बहुत सुनाई देता है, जैसे रक्षाबंधन या होलिका-दहन पर। वह भद्रा असल में एक करण है। यह पेज उसी को सरल भाषा में समझाता है।

11 करण: 4 स्थिर और 7 चर

करण कुल 11 हैं।

4 स्थिर करण महीने में सिर्फ़ एक-एक बार, हमेशा अपनी तय जगह पर आते हैं:

करण कब आता है
किंस्तुघ्न शुक्ल प्रतिपदा का पहला आधा
शकुनि कृष्ण चतुर्दशी का दूसरा आधा
चतुष्पद अमावस्या का पहला आधा
नाग अमावस्या का दूसरा आधा

7 चर करण बाकी 56 हिस्सों में इसी क्रम में बार-बार घूमते हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि। शुक्ल प्रतिपदा के दूसरे आधे से बव शुरू होता है, और यह सात का चक्र महीने में आठ बार पूरा होता है।

बी. वी. रमन की A Manual of Hindu Astrology में करण की यही गणना दी गई है।

विष्टि यानी भद्रा

सातवाँ चर करण विष्टि है, और इसी का प्रचलित नाम भद्रा है। परंपरा भद्रा के समय नई शुरुआत, जैसे संस्कार, गृह-प्रवेश या कोई नया काम, नहीं रखती। धर्मसिंधु भी नामकरण के समय के प्रसंग में भद्रा को टालने की बात कहता है। इसी कारण कई परिवार रक्षाबंधन पर राखी और होलिका-दहन भद्रा बीतने के बाद करते हैं।

ऊपर के क्रम से भद्रा महीने में आठ बार आती है:

  • शुक्ल पक्ष: चतुर्थी का दूसरा आधा, अष्टमी का पहला आधा, एकादशी का दूसरा आधा, पूर्णिमा का पहला आधा
  • कृष्ण पक्ष: तृतीया का दूसरा आधा, सप्तमी का पहला आधा, दशमी का दूसरा आधा, चतुर्दशी का पहला आधा

भद्रा आमतौर पर कुछ घंटों की होती है, लगभग आधा दिन। कुछ परंपराएँ भद्रा के "वास" (वह कहाँ मानी जाती है) का भी विचार करती हैं; इसके लिए अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से पूछ लें।

शांत होकर समझें

भद्रा से डरने की ज़रूरत नहीं है। इसका अर्थ बस इतना है: किसी संस्कार या नई शुरुआत का समय थोड़ा आगे-पीछे कर लें। भद्रा के समय खाना-पीना, नौकरी, पढ़ाई, यात्रा और रोज़ की पूजा सामान्य रूप से चलती है।

भद्रा में जन्म लेने वाले बच्चे के लिए भी कोई चिंता की बात नहीं है। जन्म का करण पंचांग का एक विवरण है; कुंडली हमेशा पूरी देखी जाती है।

(तिथियों के समूह में "भद्रा" नाम की तिथियाँ भी हैं, 2, 7 और 12। वह एक अलग चीज़ है, और उन तिथियों को टालने की बात नहीं है।)

ePandit में करण

ePandit की कुंडली में जन्म के समय का करण दिखाया जाता है। यह पेज करण को समझने के लिए है; किसी दिन भद्रा का ठीक समय जानने के लिए अपने शहर का पंचांग भी देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

करण और तिथि में क्या संबंध है?

एक तिथि में दो करण होते हैं। तिथि 12° की, करण 6° का।

भद्रा क्या है?

विष्टि करण का प्रचलित नाम। परंपरा इसके समय संस्कार या नई शुरुआत नहीं रखती।

भद्रा के समय क्या कुछ भी नहीं करना चाहिए?

ऐसा नहीं है। रोज़ का काम, खाना, नौकरी, पढ़ाई और पूजा सामान्य चलते हैं। सिर्फ़ संस्कार या नए आरंभ का समय भद्रा के बाद रखा जाता है।

स्थिर करण कौन-से हैं?

शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न। ये महीने में एक-एक बार, अमावस्या के आसपास और शुक्ल प्रतिपदा पर आते हैं।

राखी भद्रा के बाद क्यों बाँधी जाती है?

परंपरा भद्रा के समय नई शुरुआत नहीं रखती, इसलिए कई परिवार भद्रा बीतने का इंतज़ार करते हैं। अपनी पारिवारिक रीति के अनुसार चलें।

आगे पढ़ें

आधार ग्रंथ

  • B. V. Raman, A Manual of Hindu Astrology · the 11 karanas and their calculation as halves of a tithi
  • Dharmasindhu · nāmakaraṇa-kāla: bhadrā among the times to avoid

शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान · अंतिम बार जाँचा: 2026-10-13