परिचय
वैदिक ज्योतिष में चंद्र का स्थान बहुत बड़ा है। उत्तर भारत में नाम का पहला अक्षर, राशिफल, कुंडली-मिलान और दशा की शुरुआत, सब चंद्र से देखे जाते हैं।
चंद्र सबसे तेज़ चलने वाला ग्रह है: लगभग सवा दो दिन में एक राशि और लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है। सूर्य से उसकी दूरी से तिथि बनती है, इसीलिए पंचांग का आधार भी चंद्र ही है। चंद्र कभी वक्री नहीं होता।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि चंद्र इन विषयों का कारक है:
- मन, भावनाएँ और मन का सुकून
- माँ और माँ जैसा स्नेह देने वाले लोग
- घर, अपनापन और देखभाल
- कल्पना, संवेदना और लोगों से जुड़ना
काम के संदर्भ में परंपरा चंद्र को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें लोगों की देखभाल, सेवा, जनता से मेल-जोल या रचनात्मकता हो।
ये झुकाव हैं, तय बातें नहीं। चंद्र का भाव, राशि, उसके साथ के ग्रह, पक्ष (शुक्ल या कृष्ण) और दशा, सब मिलकर तस्वीर बनाते हैं।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
चंद्र की अपनी राशि कर्क है। उच्च स्थिति वृषभ 3° पर मानी जाती है और नीच स्थिति वृश्चिक 3° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। वृषभ में 3° उच्च बिंदु है और 3° से 30° तक मूलत्रिकोण (ePandit का इंजन यही मान लेता है; कुछ ग्रंथ मूलत्रिकोण 4° से शुरू करते हैं); कर्क स्वराशि है।
नैसर्गिक संबंध में चंद्र के मित्र बुध और सूर्य हैं; सम गुरु, मंगल, शनि और शुक्र हैं; और पुराने वर्गीकरण में कोई शत्रु नहीं गिना जाता। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। चंद्र के लिए यह 360 विरूप (6 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = चंद्र का कुल षड्बल ÷ 360
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि चंद्र के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
चंद्र का नैसर्गिक बल 51.43 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल चंद्र को इस स्थान पर मिलता है: 4था भाव (उत्तर)। चंद्र के पक्ष बल में उसकी रोशनी दुगुनी गिनी जाती है, इसलिए पूर्णिमा के आस-पास यह हिस्सा बढ़ता है और अमावस के पास घटता है। सूर्य की तरह चंद्र के कुल में भी चेष्टा बल नहीं जुड़ता।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में चंद्र की महादशा 10 वर्ष की होती है। परंपरा मानती है कि इस समय घर, परिवार, माँ, भावनाएँ और लोगों से जुड़ाव जैसे विषय आगे आते हैं; परंपरा इसे घर या जगह से जुड़े बदलावों से भी जोड़ती है।
पर असल रंग इस पर टिका है कि चंद्र आपकी कुंडली में कहाँ है, किस भाव का स्वामी है और कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
परंपरा में सोमवार चंद्र का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से चंद्र का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ सोमाय नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
सोमवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़ा चावल या दूध दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।