परिचय
मंगल लाल रंग का ग्रह है, और ज्योतिष में इसे ग्रहों का सेनापति कहा गया है। यह लगभग डेढ़ महीने में एक राशि पार करता है, और वक्री होने पर किसी राशि में कई महीने रुक सकता है।
मंगल की अपनी दो राशियाँ हैं: मेष और वृश्चिक। मंगल की एक ख़ास बात उसकी विशेष दृष्टि है: सामान्य 7वीं दृष्टि के साथ यह अपने से 4थे और 8वें भाव को भी देखता है।
विवाह-मिलान में मंगल की स्थिति को लेकर जो चर्चा होती है, उसके लिए हमारा अलग और शांत पेज "मंगल-विचार" देखिए। यहाँ हम केवल ग्रह की बात करते हैं।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि मंगल इन विषयों का कारक है:
- साहस, पहल और काम शुरू करने की ऊर्जा
- छोटे भाई-बहन
- भूमि, मकान और संपत्ति
- तकनीकी हुनर, खेल और शारीरिक मेहनत
काम के संदर्भ में परंपरा मंगल को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें तेज़ निर्णय, तकनीक, सुरक्षा, खेल या ज़मीन-मकान से जुड़ा काम हो।
ये झुकाव हैं, किसी के बारे में तय बात नहीं। मंगल का भाव, राशि, दृष्टि और चल रही दशा मिलकर ही अर्थ देते हैं।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
मंगल की अपनी राशियाँ मेष और वृश्चिक हैं। उच्च स्थिति मकर 28° पर मानी जाती है और नीच स्थिति कर्क 28° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। मेष के पहले 12 अंश मूलत्रिकोण हैं; मेष का बाकी हिस्सा और वृश्चिक स्वराशि।
नैसर्गिक संबंध में मंगल के मित्र गुरु, चंद्र और सूर्य हैं; सम शनि और शुक्र हैं; और पुराने वर्गीकरण में शत्रु बुध गिने जाते हैं। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। मंगल के लिए यह 300 विरूप (5 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = मंगल का कुल षड्बल ÷ 300
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि मंगल के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
मंगल का नैसर्गिक बल 17.14 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल मंगल को इस स्थान पर मिलता है: 10वाँ भाव (दक्षिण)। रमन की दृक् बल गणना मंगल की 4थी और 8वीं विशेष दृष्टि को अलग से जोड़कर गिनती है।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में मंगल की महादशा 7 वर्ष की होती है। परंपरा मानती है कि इस समय पहल, मेहनत, नए काम की शुरुआत, भाई-बहन और ज़मीन-मकान जैसे विषय आगे आते हैं।
पर असल रंग इस पर टिका है कि मंगल आपकी कुंडली में कहाँ है, किन भावों का स्वामी है और कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
परंपरा में मंगलवार मंगल का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से मंगल का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ भौमाय नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
मंगलवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़ी मसूर की दाल या गुड़ दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।