परिचय
सूर्य हमारे आकाश का सबसे चमकीला पिंड है, और ज्योतिष में इसे ग्रहों का राजा कहा गया है। कुंडली में सूर्य जिस राशि में होता है, वही आपकी "सूर्य राशि" है; लेकिन उत्तर भारत में नाम और राशिफल के लिए चंद्र राशि ली जाती है, सूर्य राशि नहीं।
सूर्य लगभग एक महीने में एक राशि पार करता है और साल भर में बारह राशियाँ। इसी से सौर मास और संक्रांतियाँ बनती हैं, जैसे मकर संक्रांति। सूर्य कभी वक्री नहीं होता।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि सूर्य इन विषयों का कारक है:
- आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और "मैं कौन हूँ" की समझ
- पिता और पिता जैसे बड़े लोग
- अधिकार, नेतृत्व और ज़िम्मेदारी
- सरकार, व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन से जुड़े विषय
काम के संदर्भ में परंपरा सूर्य को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें नेतृत्व, निर्णय और सबके सामने खड़े होना हो। यह कोई एक पेशा नहीं, एक रुझान है।
ये झुकाव हैं, किसी व्यक्ति के बारे में तय बात नहीं। सूर्य किस भाव में है, किस राशि में है, किसके साथ है, और कौन-सी दशा चल रही है, यह सब मिलकर तस्वीर बनाता है।
उच्च, नीच, स्वगृही: सीधी भाषा में
सूर्य की अपनी राशि सिंह है। उच्च स्थिति मेष 10° पर मानी जाती है और नीच स्थिति तुला 10° पर, यानी ठीक सामने की राशि में उसी अंश पर। सिंह के पहले 20 अंश मूलत्रिकोण हैं और बाकी हिस्सा स्वराशि।
नैसर्गिक संबंध में सूर्य के मित्र गुरु, मंगल और चंद्र हैं; सम बुध हैं; और पुराने वर्गीकरण में शत्रु शनि और शुक्र गिने जाते हैं। ये शब्द पुराने हैं; षड्बल में इनका काम बस इतना है कि किस राशि में ग्रह को स्थान बल के कितने अंक मिलें। रमन की विधि जन्म-कुंडली का तात्कालिक संबंध भी जोड़ती है।
उच्च, नीच, स्वगृही और मूलत्रिकोण स्थिति के नाम हैं, किसी के भविष्य का फ़ैसला नहीं। नीच स्थिति भी अकेले कुछ तय नहीं करती; भाव, दृष्टि, दशा, नवांश और पूरी कुंडली मिलकर ही बात कहते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल यानी छह तरह के बल का जोड़: स्थान, दिक्, काल, चेष्टा, नैसर्गिक और दृक् बल। ePandit इसे बी. वी. रमन की पुस्तक Graha and Bhava Balas की विधि से गिनता है। इकाई विरूप है; 60 विरूप मिलकर 1 रूप बनता है।
रमन ने हर ग्रह के लिए एक पारंपरिक न्यूनतम योग दिया है। सूर्य के लिए यह 300 विरूप (5 रूप) है। हम आपको सीधा एक अनुपात दिखाते हैं:
अनुपात = सूर्य का कुल षड्बल ÷ 300
- अनुपात 1 से ऊपर हो, तो मतलब बस इतना है कि सूर्य के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा बल है, यानी अपने विषयों में काम करने की खुली जगह।
- अनुपात 1 से नीचे हो, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है। इसका अर्थ है कि उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं: कोई और ग्रह, चल रही दशा, या भाव।
सूर्य का नैसर्गिक बल 60 विरूप है; यह हर कुंडली में एक-सा रहता है। पूरा दिग्बल सूर्य को इस स्थान पर मिलता है: 10वाँ भाव (दक्षिण)। रमन की विधि में सूर्य और चंद्र के कुल में चेष्टा बल नहीं जुड़ता। सूर्य का नैसर्गिक बल सात ग्रहों में सबसे ऊँचा है, पर यह एक स्थिर अंश भर है, अच्छाई-बुराई का माप नहीं।
अलग-अलग software कुछ अंतर दिखा सकते हैं; हम रमन की विधि पर चलते हैं। षड्बल गणित पर टिका एक माप है; यह अकेले कोई फल तय नहीं करता।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में सूर्य की महादशा 6 वर्ष की होती है, जो नौ दशाओं में सबसे छोटी है। परंपरा मानती है कि इस समय ज़िम्मेदारी, पहचान, आत्मविश्वास और बड़ों से रिश्ते जैसे विषय सामने आते हैं।
यह दशा कैसी रहेगी, यह इस पर टिका है कि सूर्य आपकी कुंडली में कहाँ है, किन भावों का स्वामी है, और भीतर कौन-सी अंतर्दशा चल रही है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं, और हर एक का रंग अलग होता है।
आस्था
परंपरा में रविवार सूर्य का दिन माना जाता है। जो चाहें, सुबह शांत मन से सूर्य का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ सूर्याय नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
रविवार को किसी ज़रूरतमंद को थोड़ा गेहूँ या गुड़ दे सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।