मुहूर्त का अर्थ
"शुभ मुहूर्त निकलवा लो" हर भारतीय घर में सुनी जाने वाली बात है। पर मुहूर्त असल में है क्या?
मुहूर्त-चिंतामणि की टीका इस शब्द के दो अर्थ बताती है। पहला, दिन और रात का पंद्रहवाँ हिस्सा: दिन में 15 मुहूर्त होते हैं और रात में 15। बराबर दिन-रात में एक मुहूर्त 48 मिनट का होता है। दूसरा, किसी काम के लिए सोच-विचार कर चुना गया समय।
यह ग्रंथ, मुहूर्त-चिंतामणि, अनंत दैवज्ञ के पुत्र राम ने लिखा, और आज भी मुहूर्त का सबसे ज़्यादा माना जाने वाला शास्त्रीय ग्रंथ है। ग्रंथ खुद कहता है कि यह जातकर्म आदि अनेक कर्मों के लिए समय जानने का साधन है। इस पेज पर हम मोटे तौर पर समझेंगे कि मुहूर्त चुनते समय क्या-क्या देखा जाता है।
पहला कदम: पंचांग-शुद्धि
बी. वी. रमन अपनी पुस्तक Muhurtha में "पंचांग-शुद्धि" को सीधे शब्दों में रखते हैं: अच्छी तिथि, अच्छा वार, अच्छा नक्षत्र, अच्छा योग और उचित करण। पाँचों अंग एक-एक करके देखे जाते हैं:
- तिथि: मुहूर्त-चिंतामणि तिथियों को नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा समूहों में बाँटता है। नई शुरुआत के लिए परंपरा आमतौर पर रिक्ता (4, 9, 14) और अमावस्या नहीं चुनती।
- वार: हर वार का एक स्वभाव है। मुहूर्त-चिंतामणि रविवार को ध्रुव, सोमवार को चर, गुरुवार को क्षिप्र, शुक्रवार को मृदु समूह में रखता है।
- नक्षत्र: काम के स्वभाव से नक्षत्र मिलाया जाता है: टिकाऊ कामों के लिए ध्रुव (जैसे रोहिणी), यात्रा के लिए चर (जैसे श्रवण), कला और नए कपड़ों के लिए मृदु (जैसे रेवती), पढ़ाई और व्यापार के लिए क्षिप्र (जैसे पुष्य)।
- योग: व्यतीपात और वैधृति में परंपरा संस्कार नहीं रखती, और कुछ योगों का शुरुआती हिस्सा छोड़ा जाता है।
- करण: विष्टि, यानी भद्रा, में संस्कार और नई शुरुआत नहीं रखी जाती।
हर अंग के बारे में विस्तार से उसके अपने पेज पर पढ़ सकते हैं।
दूसरा कदम: व्यक्ति के लिए तारा बल और चंद्र बल
पंचांग सबके लिए एक जैसा है, पर मुहूर्त जिसके लिए निकाला जा रहा है, उसके लिए दो बातें और देखी जाती हैं। रमन लिखते हैं कि ये लगभग हर मुहूर्त में आम हैं:
- तारा बल: आज का नक्षत्र आपके जन्म-नक्षत्र से कौन-सी तारा बनाता है। मुहूर्त-चिंतामणि नौ ताराएँ बताता है।
- चंद्र बल: आज का चंद्रमा आपकी जन्म-राशि से किस स्थान में है।
रमन तीसरी बात पंचक भी जोड़ते हैं, जो तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न की संख्याओं से निकलता है। विवाह जैसे बड़े संस्कारों में पंडित जी वर और कन्या दोनों के लिए ये बातें देखते हैं।
तीसरा कदम: लग्न
दिन तय होने के बाद घड़ी का समय चुना जाता है, और इसके लिए उस समय उदय हो रही राशि, यानी मुहूर्त का लग्न, देखा जाता है। मुहूर्त-चिंतामणि (नक्षत्र-प्रकरण 44) सब शुभ कामों के लिए एक आम नियम देता है:
- लग्न से आठवाँ और बारहवाँ स्थान खाली हो;
- चंद्रमा लग्न से 3, 6, 10 या 11वें स्थान में हो;
- लग्न पर शुभ ग्रहों का साथ या दृष्टि हो।
हर संस्कार के अपने खास नियम भी हैं, जो मुहूर्त-चिंतामणि के अलग-अलग प्रकरणों में दिए गए हैं: संस्कार-प्रकरण, विवाह-प्रकरण, यात्रा-प्रकरण, गृह-प्रवेश प्रकरण आदि। लग्न लगभग दो घंटे में बदल जाता है, इसलिए एक ही दिन में अच्छे और कम अच्छे दोनों समय मिल सकते हैं।
छोटे काम के लिए छोटा तरीका
हर काम के लिए पूरा मुहूर्त निकालना ज़रूरी नहीं। परंपरा में कुछ आसान सहारे भी हैं:
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर के आसपास का आठवाँ मुहूर्त, जिसे परंपरा आदर से देखती है (बुधवार को छोड़कर)।
- होरा: मुहूर्त-चिंतामणि कहता है कि किसी वार का काम उस वार के स्वामी की होरा में किया जा सकता है।
- गोधूलि: विवाह-प्रकरण में गोधूलि वेला की बहुत प्रशंसा है।
- चौघड़िया और राहु काल: ये बाद की क्षेत्रीय परंपराएँ हैं, शास्त्रीय ग्रंथ में नहीं, पर बहुत-से परिवार इन्हें प्रेम से मानते हैं।
कुल-परंपरा और व्यावहारिकता
मुहूर्त का मकसद काम को अच्छे मन और शांत समय में शुरू करना है, किसी को डराना नहीं। इसलिए कुछ बातें हमेशा याद रखें:
- परिवार की कुल-परंपरा सबसे पहले। कई परिवारों के अपने तय दिन, मंदिर और रीतियाँ होती हैं।
- सेहत में डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। प्रसव, ऑपरेशन या इलाज का समय डॉक्टर तय करते हैं; मुहूर्त उसके हिसाब से बदला जा सकता है।
- पूरा अच्छा मुहूर्त हर बार नहीं मिलता। ग्रंथ खुद कई जगह परिहार और विकल्प देते हैं। "थोड़ा कम अच्छा" समय कोई अनहोनी नहीं लाता।
ePandit का पंचांग आपके शहर के लिए ये सब अंग, अभिजित, होरा, चौघड़िया और राहु काल दिखाता है। बड़े संस्कारों के लिए अपने पंडित जी से पूरा मुहूर्त बनवाना अच्छा रहता है।