परिचय
पंचांग का तीसरा अंग नक्षत्र है। आकाश के 360° को 27 बराबर हिस्सों में बाँटा गया है, हर हिस्सा 13°20′ का। चंद्रमा लगभग एक दिन में एक नक्षत्र पार करता है, इसलिए हर दिन का अपना नक्षत्र होता है।
पंचांग में जब "आज रोहिणी नक्षत्र है" लिखा हो, तो इसका अर्थ है कि आज चंद्रमा रोहिणी के हिस्से में चल रहा है। सूर्य या किसी और ग्रह का नक्षत्र यहाँ नहीं देखा जाता।
आज का नक्षत्र कैसे पढ़ें
चंद्रमा की चाल रोज़ थोड़ी बदलती है, इसलिए नक्षत्र दिन में किसी भी समय बदल सकता है। पंचांग में नक्षत्र के साथ उसके खत्म होने का समय लिखा रहता है, जैसे "रोहिणी दोपहर 2:10 तक, फिर मृगशिरा"।
हर नक्षत्र के 4 चरण (पाद) होते हैं, हर चरण 3°20′ का। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र और चरण में था, वही आपका जन्म-नक्षत्र है, और उसी चरण से नाम का पहला अक्षर निकलता है। हर नक्षत्र के बारे में विस्तार से उसके अपने पेज पर पढ़ सकते हैं, जैसे रोहिणी, पुष्य या रेवती।
ePandit का दैनिक पंचांग आपके शहर के लिए आज का नक्षत्र और चरण दिखाता है।
मुहूर्त के नक्षत्र-समूह
मुहूर्त-चिंतामणि नक्षत्रों को उनके स्वभाव के हिसाब से समूहों में बाँटता है। परंपरा कोई काम शुरू करते समय देखती है कि उस काम के स्वभाव से कौन-सा समूह मेल खाता है।
- ध्रुव / स्थिर: उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद, रोहिणी। परंपरा इन्हें टिकाऊ कामों से जोड़ती है, जैसे नींव रखना या गृह-प्रवेश।
- चर / चल: स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा। चलने-फिरने वाले काम, जैसे यात्रा या वाहन।
- मृदु / मैत्र: मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा। कोमल काम, जैसे संगीत, कला, नए कपड़े, मित्रता।
- क्षिप्र / लघु: अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित। जल्दी पूरे होने वाले काम, जैसे पढ़ाई की शुरुआत या व्यापार।
- मिश्र / साधारण: कृत्तिका, विशाखा। मिले-जुले, रोज़मर्रा के काम।
- उग्र: पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद, भरणी, मघा।
- तीक्ष्ण / दारुण: मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा।
उग्र और तीक्ष्ण समूह परंपरा में दृढ़, निर्णायक कामों के लिए रखे गए हैं, और कोमल संस्कारों के लिए आमतौर पर ऊपर के समूह चुने जाते हैं। ये नाम काम के स्वभाव का वर्गीकरण हैं। ये किसी नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कहते। हर जन्म-नक्षत्र की अपनी सुंदरता है।
अभिजित: 28वाँ नक्षत्र
मुहूर्त में कभी-कभी अभिजित को 28वाँ नक्षत्र गिना जाता है। यह उत्तराषाढ़ा के अंतिम चरण और श्रवण के शुरुआती छोटे हिस्से को मिलाकर बनता है। जन्म-कुंडली और दशा में 27 नक्षत्र ही चलते हैं; अभिजित मुख्य रूप से मुहूर्त के काम आता है। (दोपहर का "अभिजित मुहूर्त" एक अलग चीज़ है: वह समय का एक हिस्सा है, नक्षत्र नहीं।)
संस्कारों में नक्षत्र
नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन जैसे संस्कारों के लिए परंपरा आमतौर पर ध्रुव, चर, मृदु और क्षिप्र समूहों के नक्षत्र चुनती है। फिर भी नक्षत्र अकेले दिन तय नहीं करता: तिथि, वार और परिवार की अपनी कुल-परंपरा भी साथ देखी जाती है। पूरा पंचांग मिलकर ही मुहूर्त बनाता है।