परिचय
रेवती 27 नक्षत्रों में 27वाँ नक्षत्र है। यह मीन 16°40′ से मीन 30°00′ तक फैला है। विंशोत्तरी दशा में इसका स्वामी बुध है, जिसकी महादशा 17 वर्ष की होती है। मुहूर्त-चिंतामणि (नक्षत्र-प्रकरण 1) इसके देवता पूषा बताता है, और परंपरा में इसका प्रतीक मछली या ढोल माना जाता है।
"रेवती" का अर्थ पारंपरिक रूप से "धनवान" या "समृद्ध" समझा जाता है। यह राशिचक्र का आख़िरी नक्षत्र है: इसके बाद अश्विनी से नया चक्र शुरू होता है। इसका प्रतीक मछली या ढोल है, और इसके चारों पद मीन राशि में हैं।
स्वभाव (परंपरा मानती है)
परंपरा मानती है कि रेवती में चंद्रमा वाले लोग कोमल, दयालु और दूसरों का ध्यान रखने वाले होते हैं। बुध का स्वामित्व बुद्धि, बातचीत और हल्का-फुल्का हास्य जोड़ता है, और मीन राशि करुणा, कल्पना और अध्यात्म। पूषा, जो यात्रियों के रक्षक माने जाते हैं, इसमें दूसरों को सही राह दिखाने का भाव जोड़ते हैं।
इस नक्षत्र का गण देव है। परंपरा इसे कोमल, सात्त्विक और सहयोगी स्वभाव से जोड़ती है। यह भी एक पुराना वर्गीकरण भर है।
ध्यान रहे, ये परंपरा की बातें हैं, किसी व्यक्ति पर फ़ैसला नहीं। लग्न, ग्रहों की स्थिति और दशा मिलकर ही पूरी तस्वीर बनाते हैं; अकेला नक्षत्र कुछ तय नहीं करता।
शक्तियाँ और ध्यान रखने की बातें
शक्तियाँ: करुणा, कल्पनाशीलता, अच्छी बातचीत, लोगों को साथ लेकर चलना, कला और संगीत में रुचि।
ध्यान रखने की बातें: परंपरा कहती है कि बहुत कोमल मन कभी-कभी "ना" कहने में हिचक सकता है। अपनी सीमाएँ साफ़ रखना, और अपने लिए भी उतना ही समय निकालना जितना दूसरों के लिए, इस स्वभाव को सुरक्षित और खुश रखता है।
काम और रुचियाँ
परंपरा इस नक्षत्र को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें देखभाल, रचनात्मकता और राह दिखाना हो: शिक्षण और मार्गदर्शन, कला, संगीत और लेखन, यात्रा और आतिथ्य, समाज-सेवा, या ऐसे काम जहाँ लोगों को एक जगह से दूसरी जगह तक सुरक्षित पहुँचाना हो। ये रुचियों की दिशाएँ हैं, कोई तय पेशा नहीं।
रिश्ते
रिश्तों में परंपरा इन लोगों को स्नेही, समझदार और साथ निभाने वाला मानती है। वे छोटी-छोटी बातों से अपनों को खुश करना जानते हैं। अपनी ज़रूरतें भी खुलकर कहना, और हर बार ख़ुद ही न झुकना, रिश्ते को बराबरी का और गहरा बनाता है।
आस्था
मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार रेवती के देवता पूषा हैं। वैदिक परंपरा में पूषा पोषण करने वाले, रास्तों और यात्रियों के रक्षक, और खोई चीज़ों को ढूँढ लाने वाले देवता माने जाते हैं। इसलिए यह नक्षत्र पोषण, सुरक्षित यात्रा और एक चक्र के शांत समापन के विचार से जुड़ा है।
नाम-मंत्र: ॐ पूष्णे नमः (नक्षत्र-देवता: मुहूर्त-चिंतामणि, नक्षत्र-प्रकरण 1; नाम-मंत्र परंपरा में प्रचलित)
चाहें तो किसी यात्री या राहगीर को पानी या भोजन दीजिए, या पक्षियों के लिए दाना रखिए। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
नामाक्षर
नामकरण में चंद्रमा के नक्षत्र के पद से पहला अक्षर चुनने की परंपरा है। रेवती के चार पदों के अक्षर:
- पद 1 (मीन): दे
- पद 2 (मीन): दो
- पद 3 (मीन): चा
- पद 4 (मीन): ची
बच्चे का पद जन्म-समय से तय होता है। नामाक्षर कैलकुलेटर से अपना अक्षर देखिए।
गंडमूल: शांत जानकारी
रेवती उन छह नक्षत्रों में है जिन्हें परंपरा गंडमूल कहती है (अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती)। धर्मसिंधु कुछ संधियों पर हुए जन्म के लिए एक शांति का वर्णन करता है, और यह वैकल्पिक है। बहुत-से परिवार बच्चे के जन्म के 27वें दिन, जब चंद्रमा फिर उसी नक्षत्र में आता है, घर पर एक सादी पूजा कर लेते हैं। कई परिवार यह नहीं करते, और यह भी ठीक है।
गंडमूल में जन्म कोई बुरा संकेत नहीं है; यह बस एक पुराने वर्गीकरण का नाम है। बच्चा किसी के लिए भी "भारी" या बुरा नहीं होता। गंडांत इससे कहीं संकरा है: केवल ठीक संधि-बिंदु, यहाँ रेवती–अश्विनी की सीमा। रेवती में यह बिंदु नक्षत्र के आख़िरी छोर पर पड़ता है, पूरे नक्षत्र पर नहीं।
अपनी कुंडली में चंद्रमा का नक्षत्र और पद जानने के लिए मुफ़्त कुंडली बनाइए।