परिचय
नक्षत्र-चक्र अश्विनी से शुरू होता है। यह मेष राशि के पहले 13°20′ में फैला है, इसलिए इसके चारों चरण मेष में ही आते हैं। जन्म के समय चंद्रमा इस हिस्से में हो, तो जन्म नक्षत्र अश्विनी कहलाता है।
विंशोत्तरी दशा में अश्विनी के स्वामी केतु हैं, जिनकी महादशा 7 वर्ष की होती है। अश्विनी में जन्मे व्यक्ति की पहली महादशा केतु की होती है; उसमें से कितने वर्ष बचे हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि जन्म के समय चंद्रमा नक्षत्र का कितना हिस्सा पार कर चुका था। इसका प्रतीक घोड़े का सिर माना जाता है और योनि भी अश्व (घोड़ा) है। दोनों गति और तैयारी की ओर इशारा करते हैं।
स्वभाव (परंपरा मानती है)
परंपरा मानती है कि अश्विनी का स्वभाव तेज़ और सीधा होता है। जो काम सामने है, उसे टालने के बजाय तुरंत शुरू कर देना इस नक्षत्र से जोड़ा जाता है। अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य माने गए हैं, इसलिए ज्योतिष की परंपरा इस नक्षत्र को दूसरों की मदद करने, किसी को फिर से खड़ा करने और राहत पहुँचाने के भाव से जोड़ती है।
देव गण होने से परंपरा यहाँ सरलता और भरोसे की प्रवृत्ति देखती है। ध्यान रहे, ये बातें प्रवृत्तियाँ हैं, किसी व्यक्ति पर लगी मुहर नहीं। असली तस्वीर पूरी कुंडली से बनती है: लग्न, चंद्र राशि, ग्रहों की स्थिति और चल रही दशा, सब मिलकर।
शक्तियाँ और ध्यान रखने की बातें
शक्तियाँ: परंपरा अश्विनी को पहल करने, जल्दी सीखने और ज़रूरत की घड़ी में बिना देर किए आगे आने से जोड़ती है। नई जगह, नया काम या नई ज़िम्मेदारी, इनसे घबराने के बजाय उत्साह आना इसकी पहचान मानी जाती है।
ध्यान रखने की बातें: जो तेज़ी शुरुआत में काम आती है, वही कभी-कभी धैर्य की परीक्षा भी ले सकती है। परंपरा सलाह देती है कि शुरू किया काम पूरा करने की आदत और बड़े फ़ैसले से पहले थोड़ा रुककर सोचना इस नक्षत्र के गुणों को और निखारता है।
काम और रुचियाँ
परंपरा अश्विनी को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें फुर्ती, पहल और लोगों की मदद शामिल हो: देखभाल और उपचार से जुड़े क्षेत्र, खेल और फिटनेस, यात्रा और परिवहन, ज़रूरत के समय काम आने वाली सेवाएँ, या कोई नया काम शुरू करना। ये विषय हैं, कोई तय पेशा नहीं; असली दिशा पूरी कुंडली और अपनी रुचि से तय होती है।
रिश्ते
रिश्तों में परंपरा अश्विनी को सीधी बात और मदद के लिए हाज़िर रहने वाले स्वभाव से जोड़ती है। ऐसे लोग अपनापन बातों से कम, काम से ज़्यादा जताते हैं। साथी की धीमी रफ़्तार को समझना और उसे अपनी गति से चलने देना रिश्ते को और सहज बनाता है।
कुंडली मिलान में गण, योनि और नाड़ी जैसे पहलू देखे जाते हैं, पर वे पूरे मिलान का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं।
आस्था
परंपरा में हर नक्षत्र के एक देवता माने गए हैं। मुहूर्त-चिंतामणि के अनुसार अश्विनी के देवता अश्विनी कुमार हैं। अश्विनी कुमार दो जुड़वाँ देवता हैं, जिन्हें वेदों में देवताओं के वैद्य और भोर के उजाले के साथ आने वाले सहायक के रूप में याद किया गया है।
जो चाहें, वे शांत मन से यह नाम-मंत्र ले सकते हैं:
ॐ अश्विनीकुमाराभ्यां नमः
(नक्षत्र-देवता: मुहूर्त-चिंतामणि, नक्षत्र-प्रकरण 1; नाम-मंत्र परंपरा में प्रचलित)
दान (लोक मान्यता, वैकल्पिक): गर्मियों में राहगीरों या पशु-पक्षियों के लिए पानी रखना। इसे किसी डर से नहीं, मन की खुशी से करें; न करें तो भी कोई बात नहीं।
नामाक्षर
अवकहड़ा चक्र की परंपरा में अश्विनी के चारों चरणों के अक्षर ये हैं:
- चरण 1 (मेष): चू
- चरण 2 (मेष): चे
- चरण 3 (मेष): चो
- चरण 4 (मेष): ला
नाम रखने की परंपरा में जन्म के चरण का अक्षर नाम का पहला अक्षर माना जाता है। यह एक परंपरा है; नाम चुनना परिवार का अपना फ़ैसला है। नामाक्षर कैलकुलेटर से अपना अक्षर देखिए।
गंडमूल: शांत जानकारी
परंपरा छह नक्षत्रों को गंडमूल कहती है: अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती। अश्विनी इनमें से एक है।
धर्मसिंधु कुछ नक्षत्र-संधियों पर हुए जन्म के लिए एक शांति का वर्णन करता है, और वह वैकल्पिक है। बहुत से परिवार बच्चे के जन्म के 27वें दिन, जब चंद्रमा फिर उसी नक्षत्र में लौटता है, घर पर एक सरल पूजा कर लेते हैं। करना या न करना परिवार की अपनी आस्था की बात है।
सबसे ज़रूरी बात: गंडमूल नक्षत्र में जन्म किसी बुरे भाग्य का संकेत नहीं है, और बच्चा परिवार में किसी के लिए भी भारी नहीं होता। 27वें दिन की पूजा भी वैकल्पिक है।
गंडांत इससे कहीं संकरी बात है। यह सिर्फ़ तीन ठीक संधि-बिंदुओं पर लागू होता है: रेवती–अश्विनी, आश्लेषा–मघा और ज्येष्ठा–मूल। अश्विनी का संबंध रेवती–अश्विनी संधि से है, यानी अश्विनी की बिल्कुल शुरुआत, जहाँ रेवती पूरा होता है। पूरा अश्विनी नक्षत्र गंडांत नहीं है।
अपनी पूरी तस्वीर के लिए मुफ़्त कुंडली में अपना नक्षत्र, चरण और दशा देखिए।