परिचय
चंद्र का रास्ता सूर्य के रास्ते (क्रांतिवृत्त) को दो बिंदुओं पर काटता है। जहाँ चंद्र दक्षिण की ओर जाता है, वह बिंदु केतु है; उत्तर वाला बिंदु राहु। केतु हर कुंडली में राहु से ठीक 180° दूर, यानी सातवीं राशि में होता है। ग्रहण इन्हीं बिंदुओं के पास होते हैं।
केतु भी उल्टी दिशा में चलता है और एक राशि में लगभग डेढ़ साल रहता है। ePandit का इंजन मध्यम केतु (mean node) लेता है; "सत्य" (true node) लेने वाले software में करीब डेढ़ अंश तक का अंतर दिख सकता है।
क्या दर्शाता है
परंपरा मानती है कि केतु इन विषयों से जुड़ा है:
- अध्यात्म, ध्यान और भीतर की खोज
- गहराई से किसी एक चीज़ में डूब जाना
- पुराना ज्ञान, शोध और बारीक समझ
- छोड़ देना, वैराग्य और सादगी
काम के संदर्भ में परंपरा केतु को ऐसे कामों से जोड़ती है जिनमें शोध, गहरी विशेषज्ञता, बारीक तकनीकी काम या आध्यात्मिक सेवा हो।
ये झुकाव हैं, तय बातें नहीं। केतु किस भाव में है, किस राशि में है और किसके साथ है, यह मिलकर ही अर्थ देता है।
राशि और उच्च-नीच: सीधी भाषा में
केतु कोई पिंड नहीं, एक बिंदु है, इसलिए इंजन में इसकी कोई अपनी राशि नहीं है। उच्च-नीच पर अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं; इसलिए ePandit केतु के लिए उच्च-नीच की तालिका नहीं देता।
परंपरा मानती है कि केतु जिस राशि में बैठता है, उसके स्वामी का और जिस ग्रह के साथ बैठता है, उसका रंग लेता है। इसलिए केतु को पढ़ने के लिए उस राशि का स्वामी और साथ के ग्रह देखे जाते हैं।
षड्बल और यह ग्रह: सीधी भाषा में
षड्बल सात ग्रहों के लिए है: सूर्य से शनि तक। बी. वी. रमन की Graha and Bhava Balas की विधि, जिस पर ePandit चलता है, राहु और केतु को बल नहीं देती, क्योंकि ये पिंड नहीं, बिंदु हैं। इसलिए केतु का कोई षड्बल अनुपात नहीं होता।
बाकी ग्रहों के लिए हम एक अनुपात दिखाते हैं: कुल षड्बल ÷ रमन का पारंपरिक न्यूनतम। 1 से ऊपर का मतलब है कि ग्रह के पास पारंपरिक न्यूनतम से ज़्यादा है; 1 से नीचे में कुछ बुरा नहीं, बस उस कुंडली में दूसरे कारक आगे रहते हैं।
षड्बल की तालिका में केतु न दिखे, तो यह कोई कमी या चूक नहीं; यही विधि है। केतु को उसकी राशि के स्वामी, भाव और दशा से पढ़ा जाता है।
महादशा
विंशोत्तरी दशा में केतु की महादशा 7 वर्ष की होती है। परंपरा मानती है कि इस समय भीतर की ओर देखना, अध्यात्म, सादगी और किसी विषय में गहराई जैसे विषय आगे आते हैं; परंपरा इसे अपनी प्राथमिकताएँ नए सिरे से तय करने के समय से जोड़ती है।
केतु अपनी राशि के स्वामी का रंग लेता है, इसलिए इस दशा का असल रंग उस स्वामी, केतु के भाव और भीतर चल रही अंतर्दशा से पढ़ा जाता है। हर महादशा में नौ अंतर्दशाएँ आती हैं।
आस्था
जो चाहें, सुबह शांत मन से केतु का नाम-मंत्र 11 या 108 बार जप सकते हैं:
ॐ केतवे नमः (ग्रह नाम-मंत्र: परंपरा)
गली के कुत्तों को रोटी खिला सकते हैं। (लोक मान्यता, वैकल्पिक)
यह श्रद्धा की बात है, कोई शर्त नहीं। कोई महँगा उपाय ज़रूरी नहीं है।