परिचय
जन्म के बाद कुछ हफ़्तों तक बच्चा ज़्यादातर घर के अंदर रहता है। फिर एक दिन ऐसा आता है जब परिवार उसे पहली बार बाहर ले जाता है: आँगन में, छत पर, या पास के मंदिर तक। इस छोटी-सी पहली सैर को संस्कार का रूप दिया गया है, जिसे निष्क्रमण कहते हैं। "निष्क्रमण" का अर्थ है "बाहर निकलना"।
परंपरा में इस दिन बच्चे को सुबह सूर्य के और शाम को चंद्रमा के दर्शन कराने की रीति है। भाव यह है कि बच्चा अब बड़ी दुनिया से, प्रकृति से और भगवान के बनाए आकाश से परिचित हो रहा है।
सबसे पहले: आपके परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। कुछ परिवार इसे मंदिर जाकर करते हैं, कुछ घर के आँगन में तुलसी के पास, और कुछ परिवारों में यह संस्कार नामकरण या अन्नप्राशन के साथ ही हो जाता है।
कब करें
मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण 15) निष्क्रमण का समय बताता है: जन्म से चौथे महीने में, उन तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में जो यात्रा के लिए बताए गए हैं। टीका एक और विकल्प भी देती है: जन्म से बारहवें दिन, यात्रा के अच्छे समय में।
आज के समय में चौथे महीने वाला विकल्प ज़्यादा व्यावहारिक है। तीन-चार महीने तक बच्चे के कई ज़रूरी टीके लग चुके होते हैं, और माँ भी प्रसव के बाद काफ़ी हद तक संभल चुकी होती है।
दिन चुनते समय पंडित जी पंचांग देखते हैं। आमतौर पर रिक्ता तिथियाँ (4, 9, 14), अमावस्या और भद्रा छोड़ी जाती हैं। पर अगर बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाना हो, तो वह किसी मुहूर्त का इंतज़ार नहीं करता।
संस्कार की रीति
निष्क्रमण की रीति सरल और प्यारी है। अलग-अलग परिवारों में इसके रूप अलग हैं, पर आमतौर पर:
- सुबह माँ-पिता बच्चे को नहला-धुलाकर साफ़, आरामदायक कपड़े पहनाते हैं।
- घर के मंदिर में गणेश जी और कुल-देवता की पूजा होती है।
- पिता या माँ बच्चे को गोद में लेकर घर से बाहर, आँगन या छत पर आते हैं, और कुछ पल उगते सूर्य की ओर मुख करके प्रार्थना करते हैं।
- कई परिवार उसी दिन पास के मंदिर जाते हैं, या तुलसी के पौधे के पास दीया जलाते हैं।
- शाम को कुछ परिवार बच्चे को चाँद दिखाते हैं।
यह रीति परंपरा है। इसका सार बस इतना है: बच्चे का पहली बार बाहर जाना प्रेम, प्रार्थना और सावधानी के साथ हो।
सूर्य-दर्शन, पर सावधानी से
"सूर्य-दर्शन" का अर्थ बच्चे को सूरज की ओर देखने देना नहीं है। छोटे बच्चे की आँखें और त्वचा बहुत नाज़ुक होती हैं।
- सिर्फ़ सुबह की हल्की धूप, सूर्योदय के कुछ देर बाद, और बस कुछ मिनट।
- बच्चे का चेहरा सूरज की ओर सीधा न करें; आँखों पर सीधी धूप न पड़े। माता-पिता सूर्य की ओर मुख करके प्रार्थना करें, बच्चा गोद में आराम से रहे।
- दोपहर की तेज़ धूप और गर्मी से बचें। गर्मियों में यह संस्कार और भी जल्दी सुबह रखें।
- सर्दी हो तो बच्चे को ठीक से ढकें, पर इतना नहीं कि गर्मी लगे।
चंद्र-दर्शन के लिए भी बच्चे को रात की ठंडी हवा में ज़्यादा देर न रखें।
भीड़, मंदिर और सेहत
चार महीने का बच्चा भी भीड़ में जल्दी थक जाता है, और भीड़ में संक्रमण का डर भी रहता है। इसलिए:
- मंदिर जाना हो तो कम भीड़ वाले समय पर जाएँ, और जल्दी लौट आएँ।
- बहुत लोग बच्चे को गोद में न लें; जो लें वे हाथ धोकर लें।
- जिसे सर्दी-खाँसी या बुखार हो, वह बच्चे से दूर रहे।
- बच्चे के टीके डॉक्टर के बताए समय पर लगें; संस्कार उसी के हिसाब से आगे-पीछे किया जा सकता है।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत, टीकों या किसी भी तकलीफ़ के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। मुहूर्त डॉक्टर की सलाह के हिसाब से बदला जा सकता है।
- धूप सिर्फ़ हल्की: सुबह की हल्की धूप, कुछ मिनट; आँखों पर सीधी धूप कभी नहीं, और दोपहर की तेज़ धूप नहीं।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न दें; प्रसाद बड़ों के लिए है।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- रत्न या नग नहीं: छोटे बच्चे पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।
- दीया और धुआँ: दीया, अगरबत्ती और हवन का धुआँ बच्चे के चेहरे से दूर रखें।
- गाड़ी में: मंदिर तक गाड़ी से जाएँ तो बच्चे को सुरक्षित तरीके से गोद या बेबी-सीट में रखें।