परिचय
"उपनयन" का अर्थ है "पास ले जाना": बच्चे को गुरु के पास, ज्ञान के पास ले जाना। पुराने समय में इसी संस्कार के बाद बच्चा गुरुकुल जाकर वेद और शास्त्र पढ़ना शुरू करता था। इसे यज्ञोपवीत, जनेऊ, व्रतबंध या मुंज भी कहते हैं।
इस संस्कार में बच्चा तीन धागों वाला पवित्र सूत्र, जनेऊ, धारण करता है, और गुरु या पिता उसे गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं। यह एक तरह से कहना है: "अब तुम सीखने वाले हो, और सीखना एक व्रत है।"
आज यह संस्कार अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग रूपों में होता है। कहीं बचपन में, कहीं विवाह से कुछ दिन पहले, कहीं बड़े उत्सव के साथ और कहीं घर में सादगी से। कौन, कब और कैसे, यह आपके परिवार की परंपरा तय करती है।
मुहूर्त-चिंतामणि क्या कहता है
मुहूर्त-चिंतामणि के संस्कार-प्रकरण में उपनयन का विस्तार से वर्णन है।
उम्र (श्लोक 39): ग्रंथ पुरानी वर्ण-श्रेणियों के अनुसार अलग-अलग उम्र बताता है: गर्भ या जन्म से गिनकर पाँचवें से बारहवें वर्ष के बीच। इससे दोगुनी उम्र तक का समय "मध्यम" कहा गया है।
(वर्ण यहाँ एक पुरानी ज्योतिषीय और सामाजिक श्रेणी का नाम है, आज की जाति नहीं। इस पेज पर इसका ज़िक्र सिर्फ़ इसलिए है कि ग्रंथ में उम्र इसी तरह लिखी है।)
वार, तिथि और समय (श्लोक 40):
- वार: रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरुवार या शुक्रवार।
- तिथि: द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी, एकादशी या द्वादशी।
- पक्ष: शुक्ल पक्ष; कृष्ण पक्ष में भी पंचमी तक।
- समय: दोपहर से पहले। दोपहर बाद यह संस्कार नहीं रखा जाता।
- नक्षत्र: हस्त, अश्विनी, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और कुछ और।
ग्रंथ लग्न के बारे में भी नियम देता है, और गुरु (बृहस्पति) के बल का विचार करता है। ये बातें पंडित जी मुहूर्त बनाते समय देखते हैं।
कौन और कब: परिवार की परंपरा
उपनयन के बारे में हर समुदाय की अपनी रीति है, और यह पेज किसी एक रीति को सही या गलत नहीं कहता।
- कई परिवारों में यह बचपन में, आठ से बारह साल के बीच होता है।
- कई परिवार इसे विवाह से कुछ दिन पहले करते हैं।
- कई परिवार और संस्थाएँ आज यह संस्कार बेटियों के लिए भी करते हैं, या उनके लिए विद्यारंभ जैसा कोई संस्कार करते हैं।
- कुछ परिवारों में यह संस्कार नहीं होता, और यह भी उनकी परंपरा है।
इसलिए सबसे अच्छा रास्ता यह है: अपने घर के बड़ों, कुल-पुरोहित और अपनी परंपरा से पूछें, और वही करें जो आपके परिवार में चलता आया है या जो आपका परिवार प्रेम से चुनता है।
संस्कार में क्या होता है
रीतियाँ अलग-अलग हैं, पर मोटे तौर पर उपनयन में ये हिस्से होते हैं (ये परंपरा के हिस्से हैं):
- मुंडन या केश-संस्कार: कई परिवारों में पहले बाल उतारे जाते हैं।
- स्नान और नए वस्त्र: बच्चा स्नान करके नए, सादे वस्त्र पहनता है।
- जनेऊ धारण: मंत्रों के साथ यज्ञोपवीत पहनाया जाता है।
- गायत्री-उपदेश: गुरु या पिता बच्चे के कान में गायत्री मंत्र की दीक्षा देते हैं।
- भिक्षा: बच्चा प्रतीक रूप से माँ और परिवार की स्त्रियों से "भिक्षा" लेता है। यह विनम्रता का पाठ है।
- हवन और आशीर्वाद: अंत में हवन और बड़ों का आशीर्वाद।
बच्चे की सहजता सबसे पहले
यह संस्कार बच्चे के लिए है, इसलिए उसका मन और आराम सबसे ज़रूरी है।
- बच्चे को पहले से सरल शब्दों में बताएँ कि क्या होगा और क्यों। जनेऊ का अर्थ समझाएँ: सीखना, सच बोलना, बड़ों का आदर।
- लंबे समय तक भूखा न रखें। अगर परंपरा में उपवास हो, तो बच्चे की उम्र और सेहत देखकर उसे हल्का रखें।
- पूरा दिन लंबा हो सकता है। बीच-बीच में आराम और पानी दें।
- जनेऊ के नियम धीरे-धीरे, प्यार से सिखाएँ। डर या दबाव से नहीं।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। बच्चा बीमार हो तो संस्कार आगे बढ़ा दें।
- उपवास हल्का: बच्चे को लंबे समय तक भूखा-प्यासा न रखें, खासकर गर्मी में।
- हवन की आग: बच्चे के कपड़े, धोती और दुपट्टे आग से दूर रहें; पास में पानी और बड़ों की नज़र रहे। धुआँ ज़्यादा हो तो बच्चे को थोड़ी देर बाहर ले जाएँ।
- मुंडन में साफ़ औज़ार: बाल उतारने हों तो नया या कीटाणु-रहित उस्तरा और अनुभवी हाथ। सिर पर कट लगे तो साफ़ करके डॉक्टर की सलाह लें।
- गले में कसा धागा नहीं: जनेऊ ढीला और आरामदायक हो। गले में कोई डोरी कसकर न बाँधें।
- रत्न या नग नहीं: बच्चों पर कोई रत्न या नग न डालें।
- धूप और गर्मी: बाहर के कार्यक्रम में छाँव और पानी का इंतज़ाम रखें।