परिचय
भारतीय परंपरा में विवाह सिर्फ़ एक समारोह नहीं, एक संस्कार है: दो लोगों का, और साथ में दो परिवारों का, एक नई ज़िम्मेदारी में बँधना। सप्तपदी के सात कदम, अग्नि के फेरे, कन्यादान और आशीर्वाद, ये सब इसी संस्कार के हिस्से हैं।
धर्मसिंधु बताता है कि कन्या के बचपन के संस्कार बिना मंत्र के भी होते थे, पर विवाह-संस्कार मंत्रों के साथ किया जाता है। यानी विवाह को परंपरा ने पूरे विधि-विधान वाला संस्कार माना है।
सबसे पहले: आपके परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम, हर जगह विवाह की रीतियाँ अलग हैं, और सभी सुंदर हैं। यह पेज बताता है कि मुहूर्त-चिंतामणि विवाह का समय कैसे चुनता है, ताकि आप पंडित जी की बात आसानी से समझ सकें।
विवाह के महीने
मुहूर्त-चिंतामणि (विवाह-प्रकरण 13) विवाह के महीने सूर्य की राशि से बताता है। विवाह तब अच्छा माना गया है जब सूर्य इन राशियों में हो:
मेष, वृषभ, मिथुन, वृश्चिक, मकर और कुंभ।
मोटे तौर पर यह मध्य-अप्रैल से मध्य-जुलाई, मध्य-नवंबर से मध्य-दिसंबर, और मध्य-जनवरी से मध्य-मार्च का समय है। ग्रंथ कुछ छूट भी देता है: मिथुन के सूर्य में आषाढ़ शुक्ल दशमी तक, और कार्तिक, पौष और चैत्र में भी कुछ स्थितियों में विवाह हो सकता है।
बहुत-से परिवार देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक, यानी चातुर्मास में, विवाह नहीं रखते। यह परंपरा है, और इसी कारण देवउठनी एकादशी के बाद विवाहों का मौसम शुरू होता है। साथ ही, गुरु और शुक्र के अस्त होने के दिनों में भी पंडित जी विवाह नहीं रखते।
नक्षत्र, तिथि और वार
मुहूर्त-चिंतामणि (विवाह-प्रकरण 55) विवाह के लिए ये बताता है:
- नक्षत्र: मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा, मघा, रोहिणी, रेवती, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद और स्वाती, बशर्ते वे किसी ग्रह से "विद्ध" न हों।
- तिथि: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) और अमावस्या छोड़कर।
- वार: टीका के अनुसार सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार।
इसके साथ पंचांग के बाकी अंग भी देखे जाते हैं: व्यतीपात और वैधृति योग, और भद्रा का समय छोड़ा जाता है। फिर वर और कन्या दोनों के लिए तारा बल और चंद्र बल देखे जाते हैं।
लग्न और गोधूलि
दिन तय होने के बाद फेरों का समय लग्न से चुना जाता है। मुहूर्त-चिंतामणि विवाह-लग्न के लिए कई नियम देता है, और सब शुभ कार्यों का आम नियम भी: लग्न से आठवाँ और बारहवाँ स्थान खाली हो, और चंद्रमा लग्न से 3, 6, 10 या 11वें स्थान में हो। लग्न लगभग दो घंटे में बदलता है, इसलिए पंडित जी अक्सर रात का कोई खास समय बताते हैं।
ग्रंथ (विवाह-प्रकरण 99) गोधूलि वेला की बहुत प्रशंसा करता है: सांझ का वह समय जब गायें चरकर लौटती हैं और धूल उड़ती है। ग्रंथ कहता है कि मुनियों ने गोधूलि को सब कार्यों में शुभ कहा है, और इसमें कई छोटी बातें अलग से नहीं देखी जातीं। बहुत-से क्षेत्रों में गोधूलि के फेरे की परंपरा इसी से आई है।
कुंडली-मिलान की जगह
उत्तर भारत में विवाह से पहले अष्टकूट मिलान होता है: आठ कूट, कुल 36 गुण। ePandit का अष्टकूट-मिलान वाला पेज इसे विस्तार से बताता है। वहाँ की सबसे ज़रूरी बात यहाँ भी दोहराने लायक है: गुण अकेले किसी विवाह का फ़ैसला नहीं करते।
मंगल दोष भी इसी मिलान का हिस्सा है, और उसके कई परिहार हैं, जिन्हें हमारा मंगल दोष वाला पेज शांत तरीके से समझाता है। मिलान एक सहायक जानकारी है। दो लोगों का स्वभाव, समझ, आपसी सम्मान और परिवारों की सहमति उससे कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं।
सुरक्षा पहले
- क़ानूनी उम्र और सहमति: भारत में विवाह के लिए लड़की की उम्र कम से कम 18 और लड़के की 21 वर्ष होनी चाहिए, और दोनों की अपनी सहमति ज़रूरी है। कोई भी पुराना नियम इससे ऊपर नहीं।
- दहेज नहीं: दहेज लेना और देना क़ानून के ख़िलाफ़ है।
- अग्नि के पास सावधानी: फेरों के समय लहँगा, साड़ी, दुपट्टा और सेहरा आग से दूर रहें; पास में पानी या रेत रखें, और बच्चों को हवन-कुंड से दूर रखें।
- गर्मी और थकान: लंबे कार्यक्रम में दूल्हा-दुल्हन और बुज़ुर्गों के लिए पानी, खाना और आराम का ध्यान रखें। उपवास हो तो सेहत देखकर।
- डॉक्टर पहले: किसी की सेहत बिगड़े तो डॉक्टर ही पहला सहारा हैं; मुहूर्त आगे-पीछे हो सकता है।
- कोई दबाव नहीं: विवाह के नाम पर किसी महँगी पूजा या रत्न की ख़रीद का दबाव न मानें।