परिचय
विद्यारंभ, जिसे अक्षरारंभ या अक्षर-अभ्यास भी कहते हैं, वह दिन है जब बच्चा पहली बार अक्षर लिखता है। स्कूल का पहला दिन अलग बात है; विद्यारंभ उससे पहले की, घर की एक छोटी-सी, प्यारी रस्म है, जिसमें परिवार बच्चे की पढ़ाई की राह पर आशीर्वाद देता है।
सबसे पहले: हर परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। कहीं यह मंदिर में होता है, कहीं घर पर; कहीं दादा जी हाथ पकड़कर लिखवाते हैं, कहीं गुरु जी।
कौन-सा समय
मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण, श्लोक 37) विद्यारंभ के लिए पाँचवाँ वर्ष और उत्तरायण बताता है। उत्तरायण वह समय है जब सूर्य मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति तक उत्तर की ओर चलता है, मोटे तौर पर मध्य जनवरी से मध्य जुलाई।
दो दिन परंपरा में खास तौर पर प्रिय हैं:
- वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी): माँ सरस्वती का दिन। उत्तर और पूर्व भारत में बहुत से परिवार इसी दिन बच्चे से पहला अक्षर लिखवाते हैं।
- विजयादशमी (आश्विन शुक्ल दशमी): दक्षिण भारत, खासकर केरल और आंध्र-तेलंगाना में, इस दिन विद्यारंभ की बड़ी परंपरा है।
वसंत पंचमी उत्तरायण में आती है। विजयादशमी उत्तरायण में नहीं आती, पर उसकी अपनी पुरानी परंपरा है, और दोनों दिन लाखों परिवार प्रेम से यह संस्कार करते हैं। अपने घर की रीति मानें।
अक्षर-अभ्यास की रीति
रीति बहुत सरल है:
- गणेश जी का स्मरण: ॐ गं गणपतये नमः, और माँ सरस्वती को प्रणाम।
- एक थाली में चावल या साफ़ रेत बिछाई जाती है।
- बड़े, या गुरु, बच्चे की उँगली पकड़कर उस पर पहला अक्षर लिखवाते हैं। कई घरों में "ॐ" या "श्री", कई में वर्णमाला का पहला अक्षर "अ"।
- फिर स्लेट या कॉपी पर एक-दो अक्षर, और किताब-कलम की पूजा।
- बच्चे को मिठाई, और सबका आशीर्वाद।
बच्चा जो भी टेढ़ा-मेढ़ा लिखे, वही सुंदर है।
खुशी से, बिना दबाव
विद्यारंभ का असली अर्थ है: पढ़ाई से पहला रिश्ता प्यार का बने।
- बच्चे से "सही" लिखवाने की ज़िद न करें। उँगली पकड़ना ही काफ़ी है।
- बच्चा थका, भूखा या नींद में हो तो समय बदल दें। मुहूर्त बच्चे के मूड के आगे छोटा है।
- पूरा कार्यक्रम छोटा रखें; पाँच-दस मिनट की रस्म बच्चे के लिए काफ़ी है।
- तुलना न करें: "उसका बच्चा तो पूरा नाम लिख लेता है।" हर बच्चा अपनी गति से सीखता है।
यह दिन बच्चे के लिए एक मीठी याद बने, बस इतना काफ़ी है।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत, खान-पान या किसी भी तकलीफ़ के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। मुहूर्त डॉक्टर की सलाह के हिसाब से आगे-पीछे किया जा सकता है।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न दें; घुट्टी, सिक्का या अँगूठी भी मुँह के पास न रखें।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- कान छिदवाने में साफ़ औज़ार: कर्णवेध हो तो केवल कीटाणु-रहित (स्टेराइल) औज़ार और प्रशिक्षित हाथ।
- बच्चे को रत्न या नग न बाँधें: छोटे बच्चों पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।
- छोटी चीज़ें: चावल, खड़िया या पेंसिल की नोक बच्चे के मुँह में न जाए; बड़ों की निगरानी में ही रस्म करें।