परिचय
कर्णवेध यानी कान छेदना। यह सोलह संस्कारों में गिना जाता है, और बहुत से घरों में आज भी बड़े प्यार से होता है। कहीं यह मुंडन के साथ होता है, कहीं अलग से, कहीं मंदिर में, कहीं घर पर, और कहीं सुनार या डॉक्टर के पास।
ऋग्वेद (1.89.8) की एक प्रसिद्ध प्रार्थना है: "भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः": हे देवो, हम कानों से भला ही सुनें। कर्णवेध के दिन कई परिवार इसी भावना को याद करते हैं।
सबसे पहले: आपके परिवार की कुल-परंपरा सबसे ऊपर है। किस उम्र में, किस कान से पहले, किसके हाथ से: यह घर की रीति से तय होता है।
कौन-सा समय
मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण, श्लोक 24) कर्णवेध के लिए दो तरह का समय बताता है:
- जन्म से छठा, सातवाँ या आठवाँ महीना, या
- कोई विषम वर्ष, जैसे तीसरा या पाँचवाँ।
दिन चुनते समय पंडित जी पंचांग से तिथि, वार और नक्षत्र मिलाते हैं; रिक्ता तिथियाँ और भद्रा आमतौर पर छोड़ी जाती हैं। समय दिन का रखें, अच्छी रोशनी में, जब बच्चा खाया-पिया और शांत हो।
बेटे और बेटी दोनों का
कई समुदायों में कर्णवेध बेटे और बेटी दोनों का होता है। कुछ परिवारों में यह केवल बेटियों का होता है, कुछ में दोनों का। दोनों रीतियाँ पुरानी हैं; अपने घर की परंपरा मानें।
साफ़ और सुरक्षित तरीका
कर्णवेध में सबसे ज़रूरी चीज़ मुहूर्त नहीं, सफ़ाई है।
- केवल कीटाणु-रहित (स्टेराइल) औज़ार। एक बार इस्तेमाल होने वाली सुई या साफ़ किया हुआ पियर्सिंग औज़ार। किसी के घर की पुरानी सुई या धागा नहीं।
- प्रशिक्षित हाथ: डॉक्टर, या कोई अनुभवी व्यक्ति जो दस्ताने पहनकर और हाथ धोकर काम करे।
- स्वस्थ बच्चा: उस दिन बच्चे को बुखार, सर्दी या कोई तकलीफ़ हो, तो दिन आगे बढ़ा दें। टीके वाले दिन से अलग रखें; डॉक्टर से पूछ लें।
- छोटा, सादा स्टड: हल्का, बिना लटकन वाला, ऐसी धातु का जो त्वचा को न चुभे। भारी बाली या नग वाले गहने नहीं।
- बाद की देखभाल: जगह को साफ़ और सूखा रखें, और डॉक्टर या पियर्सर ने जो बताया हो, वही करें। लाली, सूजन या दर्द बढ़े तो डॉक्टर को दिखाएँ।
संस्कार की रीति
आमतौर पर गणेश जी के स्मरण (ॐ गं गणपतये नमः) से शुरुआत होती है। माँ या दादी बच्चे को गोद में लेती हैं, और कोई प्यार से बच्चे का ध्यान खिलौने या गाने से बँटाता है। फिर बड़ों का आशीर्वाद और मिठाई। रोना स्वाभाविक है; थोड़ी देर में बच्चा फिर खेलने लगता है।
सुरक्षा पहले
- डॉक्टर पहले: बच्चे की सेहत, खान-पान या किसी भी तकलीफ़ के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। मुहूर्त डॉक्टर की सलाह के हिसाब से आगे-पीछे किया जा सकता है।
- मुँह में कुछ नहीं: डॉक्टर ने जो न बताया हो, वह बच्चे के मुँह में न डालें। एक साल से छोटे बच्चे को शहद बिल्कुल न दें; घुट्टी, सिक्का या अँगूठी भी मुँह के पास न रखें।
- गले में कसा धागा नहीं: काला धागा या कोई डोरी गले में कसकर न बाँधें। चाहें तो ढीला धागा कलाई पर, बड़ों की निगरानी में।
- कान छिदवाने में साफ़ औज़ार: कर्णवेध हो तो केवल कीटाणु-रहित (स्टेराइल) औज़ार और प्रशिक्षित हाथ।
- बच्चे को रत्न या नग न बाँधें: छोटे बच्चों पर कोई रत्न, नग या भारी गहना न डालें।