परिचय
उत्तर भारत की कई जन्मपत्रियों में शिशु का पाया लिखा जाता है: स्वर्ण (सोना), रजत (चाँदी), ताम्र (ताँबा) या लौह (लोहा)। "पाया" का शाब्दिक अर्थ है पैर या आधार। परिवार अक्सर पूछते हैं कि बच्चे का पाया कौन-सा है और क्या उसके लिए कुछ करना होगा।
सीधा उत्तर: पाया एक पुरानी लोक-परंपरा है। इसे निकालने की दो विधियाँ हैं, और किसी संस्कार या पूजा की ज़रूरत इससे तय नहीं होती।
पहली विधि: जन्म-नक्षत्र से
इस विधि में जन्म-नक्षत्र (चंद्रमा का नक्षत्र) देखकर पाया बताया जाता है। सत्ताईस नक्षत्रों को चार समूहों में बाँटने वाली तालिकाएँ पंचांगों और पुस्तकों में छपी मिलती हैं।
पर ये तालिकाएँ आपस में मेल नहीं खातीं। कई नक्षत्रों पर, जैसे रेवती, कृत्तिका से मृगशिरा, और धनिष्ठा से पूर्वा भाद्रपद, अलग-अलग तालिकाएँ अलग पाया देती हैं। इसलिए हम यहाँ कोई एक तालिका "सही" बताकर नहीं छापते। ePandit नक्षत्र-विधि का उत्तर केवल उन्हीं नक्षत्रों के लिए दिखाता है जिन पर प्रचलित तालिकाएँ एकमत हैं; बाकी नक्षत्रों पर यह साफ़ लिख देता है कि तालिकाएँ अलग हैं। अगर आपके पंचांग में किसी नक्षत्र का पाया दूसरे पंचांग से अलग है, तो यही कारण है।
दूसरी विधि: लग्न से चंद्रमा के भाव से
यह विधि उत्तर भारतीय जन्मपत्रियों में ज़्यादा छपती है। लग्न से गिनकर देखा जाता है कि चंद्रमा किस भाव में है:
| चंद्रमा का भाव (लग्न से) | पाया |
|---|---|
| 1, 6, 11 | स्वर्ण (सोना) |
| 2, 5, 9 | रजत (चाँदी) |
| 3, 7, 10 | ताम्र (ताँबा) |
| 4, 8, 12 | लौह (लोहा) |
इस विधि के लिए जन्म-समय चाहिए, क्योंकि लग्न समय से तय होता है।
दो विधियाँ, दो उत्तर: दोनों ठीक
एक ही शिशु के लिए दोनों विधियाँ अक्सर अलग उत्तर देती हैं। जैसे नक्षत्र-विधि से "स्वर्ण" और भाव-विधि से "लौह"। अंतर विधि का है, शिशु का नहीं। इसलिए दो पंडित जी अलग पाया बताएँ, तो दोनों अपनी-अपनी विधि से ठीक हो सकते हैं। ePandit भाव-विधि का उत्तर हमेशा, और नक्षत्र-विधि का उत्तर केवल जहाँ तालिकाएँ एकमत हों, विधि के नाम के साथ दिखाता है, ताकि कोई भ्रम न रहे।
ग्रंथ क्या कहते हैं, और क्या नहीं
- दोनों विधियाँ लोक-परंपरा हैं। मुहूर्त-चिंतामणि, धर्मसिंधु, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र और फलदीपिका में पाया का उल्लेख नहीं मिलता।
- कोई संस्कार पाया पर निर्भर नहीं है। नामकरण के लिए मुहूर्त-चिंतामणि (संस्कार-प्रकरण) और धर्मसिंधु तिथि, वार, नक्षत्र, लग्न और समय देखते हैं; पाया कहीं नहीं। नामकरण या आगे का कोई संस्कार पाया की वजह से रोकने की आवश्यकता नहीं।
- पाया की कोई शांति नहीं है। किसी ग्रंथ में पाया के लिए शांति-पूजा नहीं बताई गई।
- दान (लोक मान्यता, वैकल्पिक): कई परिवार अपनी श्रद्धा से अन्न या वस्त्र का छोटा-सा दान करते हैं। यह पूरी तरह आपकी इच्छा पर है, किसी "दोष" को हटाने के लिए नहीं।
- पाया को शिशु या परिवार के लिए शुभ-अशुभ का संकेत न मानें। "लोहे का पाया" कोई चेतावनी नहीं, और "सोने का पाया" कोई वादा नहीं।