द्रेष्काण (D3): भाई-बहन और साहस का वर्ग

द्रेष्काण (D3) हर राशि को 10-10 अंश के तीन भागों में बाँटता है। पराशर की विधि में ये भाग उसी राशि, उससे पाँचवीं और नौवीं राशि में जाते हैं, और परंपरा इसे भाई-बहन और साहस से जोड़ती है।

स्रोत: Bṛhat Parāśara Horā Śāstra (BPHS, Santhanam tr.), अध्याय 6 (सोलह वर्ग: गणना और विषय); अध्याय 7 (वर्ग-समूह और विंशोपक)

आपकी कुंडली में

विभाजन
D3 · हर राशि के 3 भाग
एक भाग
10°
गणना का नियम (पराशर)
0–10° वही राशि, 10–20° उससे पाँचवीं, 20–30° उससे नौवीं।
BPHS ch. 6
परंपरा किस विषय से जोड़ती है
भाई-बहन, साहस, पहल
BPHS ch. 6–7
जन्म-समय की संवेदनशीलता (औसत)
लगभग 40 मिनट (लग्न के लिए)

यह क्या है

द्रेष्काण में हर राशि के तीन बराबर हिस्से होते हैं, हर हिस्सा 10 अंश का। तीनों हिस्से एक ही तत्व की तीन राशियों में जाते हैं, जैसे अग्नि राशि मेष के हिस्से मेष, सिंह और धनु में। यह पुराने ग्रंथों में बहुत पहले से गिना जाने वाला वर्ग है।

कैसे निकाला जाता है

नियम: राशि के 0–10° उसी राशि के, 10–20° उससे पाँचवीं राशि के, और 20–30° उससे नौवीं राशि के द्रेष्काण होते हैं।

उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17° दूसरे हिस्से (10–20°) में है, इसलिए गिनती मेष से पाँचवीं राशि तक जाती है: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह। D3 में यह ग्रह सिंह में होगा।

परंपरा इसमें क्या देखती है

पराशर द्रेष्काण को सहोदर, यानी भाई-बहनों से मिलने वाले सुख से जोड़ते हैं। परंपरा मानती है कि इसमें तीसरे भाव का स्वामी और मंगल, जो साहस और भाई-बहन का कारक माना जाता है, किस तरह बैठे हैं, यह देखना उपयोगी है। साथ ही यह वर्ग पहल करने, हिम्मत दिखाने और अपने प्रयास से आगे बढ़ने के स्वभाव की झलक भी देता है।

जन्म-समय कितना मायने रखता है

लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D3 का एक भाग 10° का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 40 मिनट का अंतर D3 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा एक द्रेष्काण लगभग 18 घंटे में पार करता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। अगर जन्म-समय अंदाज़े से लिखा है, तो D3 के लग्न को पक्का न मानें।

इसे शांति से कैसे पढ़ें

D3 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में तीसरे भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D3 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। भाई-बहनों से रिश्ता दोनों तरफ़ के स्वभाव, परिवार और समय से बनता है; कुंडली उसकी पूरी कहानी नहीं कहती।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या द्रेष्काण की दूसरी विधियाँ भी हैं?

हाँ, कुछ परंपराओं में द्रेष्काण गिनने के और तरीके भी हैं। ePandit पराशर की विधि अपनाता है: वही राशि, पाँचवीं और नौवीं।

D3 में भाई-बहन के बारे में क्या देखा जाता है?

परंपरा तीसरे भाव के स्वामी और मंगल की स्थिति देखती है। यह आपसी जुड़ाव के स्वभाव का संकेत है, किसी घटना की भविष्यवाणी नहीं।

क्या केवल D3 देखकर कोई बात तय की जा सकती है?

नहीं। D3 हमेशा मुख्य कुंडली (D1) के तीसरे भाव और दशा के साथ पढ़ा जाता है।

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आधार ग्रंथ

  • Bṛhat Parāśara Horā Śāstra (BPHS, Santhanam tr.) · अध्याय 6 (सोलह वर्ग: गणना और विषय); अध्याय 7 (वर्ग-समूह और विंशोपक)

शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान · अंतिम बार जाँचा: 2026-10-13