तीसरा भाव क्या दिखाता है
लग्न से तीसरी राशि तीसरा भाव है। 'सहज' का अर्थ है साथ जन्मे, इसलिए परंपरा इसे भाई-बहनों का भाव कहती है; 'पराक्रम' का अर्थ है अपने बल पर किया गया प्रयास। ज्योतिष की परंपरा इस भाव को इन विषयों से जोड़ती है:
- साहस, पहल और अपनी मेहनत से आगे बढ़ने का स्वभाव
- छोटे भाई-बहन और उनसे जुड़ाव
- बातचीत, लेखन, संदेश और मीडिया जैसे काम जिनमें बात पहुँचानी हो
- छोटी यात्राएँ, पड़ोस और आस-पास का दायरा
- शौक और हुनर, जैसे संगीत, खेल या हाथ का काम
परंपरा मानती है कि यह भाव बताता है कि इंसान अपनी इच्छा को कोशिश में कैसे बदलता है। यह झुकाव है, तय बात नहीं; पूरी कुंडली साथ पढ़ी जाती है।
परंपरा में इसका स्थान: समूह, कारक, दिग्बल
तीसरा भाव आपोक्लिम है (3, 6, 9, 12), यानी पणफर के बाद आने वाला भाव, और साथ ही उपचय भी। उपचय (3, 6, 10, 11) का अर्थ है बढ़ने वाला: परंपरा मानती है कि इन भावों के विषय उम्र और अनुभव के साथ खिलते हैं। पुरुषार्थ में यह काम, यानी इच्छाओं का भाव है।
इसका नैसर्गिक कारक मंगल है, जिसे परंपरा साहस और ऊर्जा से जोड़ती है। काल-पुरुष की कुंडली में तीसरी राशि मिथुन है, जिसका स्वामी बुध है; इसीलिए बातचीत और लेखन भी इसी भाव में पढ़े जाते हैं। यह केंद्र नहीं है, इसलिए यहाँ किसी ग्रह को पूरा दिग्बल नहीं मिलता।
राशि-भाव और भाव चलित
ePandit की कुंडली में तीसरा भाव दो तरह से दिखता है। राशि-भाव (whole sign) में लग्न से गिनी गई तीसरी राशि ही पूरा तीसरा भाव है। भाव चलित में भावों की सीमाएँ लग्न की ठीक डिग्री से तय होती हैं, इसलिए राशि के किनारे पर बैठा ग्रह चलित में पड़ोसी भाव में दिख सकता है।
मान लीजिए लग्न मेष 22° पर है और मंगल कर्क 2° पर: राशि-भाव में मंगल चौथे भाव में है, पर चलित में वह तीसरे भाव की सीमा में आ सकता है। तब साहस और पहल के विषयों में भी मंगल पढ़ा जाता है।
दोनों एक ही आकाश की दो नज़रें हैं, गलती नहीं। ePandit का आधार राशि-भाव (D1) है; दोनों में भाव अलग दिखे, तो परंपरा दोनों भावों के विषय साथ देखती है।
तृतीयेश और यहाँ बैठे ग्रह: शांत नज़र से
तीसरे भाव के स्वामी को तृतीयेश कहते हैं। परंपरा मानती है कि तृतीयेश जिस भाव में है, मेहनत का रुख उधर होता है: तृतीयेश दसवें में हो तो काम में पहल, पाँचवें में हो तो रचनात्मक शौक, ऐसा पढ़ा जाता है।
उपचय भाव होने के कारण परंपरा यहाँ मंगल या शनि जैसे ग्रहों को भी सहज मानती है: मंगल से जोश और हिम्मत, शनि से लगातार और धीमी, पर टिकाऊ मेहनत। बुध यहाँ लिखने-बोलने का रुझान जोड़ता है, ऐसा माना जाता है। खाली तीसरा भाव कोई कमी नहीं है; तब तृतीयेश और दृष्टियाँ पढ़ी जाती हैं।
नवांश और द्रेष्काण (D3) में तीसरा भाव
BPHS के षोडशवर्ग अध्याय में द्रेष्काण (D3) को भाई-बहनों और सहोदरों के लिए बताया गया है। D3 में हर राशि 10-10 अंश के तीन भागों में बँटती है। परंपरा D1 में तीसरा भाव और तृतीयेश देखकर, D3 में उसकी पुष्टि करती है।
नवांश (D9) में तृतीयेश और मंगल की स्थिति भी साथ देखी जाती है। कोई वर्ग अकेले फ़ैसला नहीं देता; ये सब एक-दूसरे को सहारा देने वाली परतें हैं।
अष्टकवर्ग: इस भाव के अंक
सात ग्रहों की अष्टकवर्ग-तालिकाएँ जोड़कर सर्वाष्टकवर्ग (SAV) बनता है; हर कुंडली में बारह राशियों के कुल अंक 337 ही होते हैं, यानी औसत लगभग 28। तीसरे भाव का अंक उस राशि का SAV अंक है जो आपकी कुंडली में तीसरे भाव में पड़ती है; जैसे लग्न तुला हो तो धनु का अंक।
ePandit ये अंक बिना शोधन (unreduced) दिखाता है। यह गिनती है, फ़ैसला नहीं; हम इन्हें अच्छा या बुरा नहीं कहते। अपनी मुफ़्त कुंडली के अष्टकवर्ग टैब में यह अंक देखा जा सकता है।