यह क्या है
चतुर्थांश, जिसे तुर्यांश भी कहते हैं, हर राशि के चार बराबर हिस्से करता है। हर हिस्सा 7 अंश 30 कला का होता है। ये चारों हिस्से राशि के चारों केंद्रों में जाते हैं: वही राशि, चौथी, सातवीं और दसवीं।
कैसे निकाला जाता है
नियम: 0–7°30′ वही राशि, 7°30′–15° उससे चौथी, 15–22°30′ उससे सातवीं, और 22°30′–30° उससे दसवीं राशि।
उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17° तीसरे हिस्से (15–22°30′) में है, इसलिए मेष से सातवीं राशि, यानी तुला। D4 में यह ग्रह तुला में होगा।
परंपरा इसमें क्या देखती है
पराशर चतुर्थांश को भाग्य से जोड़ते हैं, और परंपरा इसमें घर, ज़मीन-मकान और रहने के सुख को भी देखती है। ज्योतिषी चौथे भाव के स्वामी, D4 के लग्न और उसके स्वामी को देखते हैं। मंगल को भूमि का और शुक्र को सुख-सुविधा का कारक माना जाता है, इसलिए इनकी स्थिति भी देखी जाती है।
जन्म-समय कितना मायने रखता है
लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D4 का एक भाग 7°30′ का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 30 मिनट का अंतर D4 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा एक भाग लगभग 14 घंटे में पार करता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। जन्म-समय पक्का हो, तभी D4 के लग्न पर टिककर बात करें।
इसे शांति से कैसे पढ़ें
D4 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में चौथे भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D4 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। घर या संपत्ति के फ़ैसले बजट, ज़रूरत और सही सलाह से लीजिए; वर्ग केवल परंपरा का एक संकेत है।