यह क्या है
अक्षवेदांश में हर राशि के पैंतालीस बराबर हिस्से होते हैं, हर हिस्सा 40 कला का। इसकी गिनती का नियम षोडशांश (D16) जैसा ही है: शुरुआत राशि के स्वभाव, यानी चर, स्थिर या द्विस्वभाव, से तय होती है।
कैसे निकाला जाता है
नियम: चर राशि में पहला हिस्सा मेष का, स्थिर राशि में सिंह का, द्विस्वभाव राशि में धनु का; फिर आगे क्रम से।
उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17 ÷ 0.667 ≈ 25.5, यानी छब्बीसवाँ हिस्सा। मेष चर है, इसलिए मेष से छब्बीसवीं राशि: वृषभ (दो बार बारह पूरी कर, फिर मेष, वृषभ)। D45 में यह ग्रह वृषभ में होगा।
परंपरा इसमें क्या देखती है
पराशर अक्षवेदांश को सब तरह के विचार, यानी जीवन के सामान्य स्वरूप से जोड़ते हैं। बाद की परंपरा के कई ज्योतिषी इसमें पिता की ओर से मिली विरासत और व्यक्ति के सामान्य चरित्र, जैसे सच्चाई, अनुशासन और व्यवहार की झलक देखते हैं। सूर्य और नौवें भाव का स्वामी यहाँ देखे जाते हैं।
जन्म-समय कितना मायने रखता है
लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D45 का एक भाग 40′ का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 2–3 मिनट का अंतर D45 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा भी एक भाग सवा घंटे के आसपास में पार कर लेता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। इतनी सटीकता बहुत कम जन्म-समयों में होती है; इसलिए D45 को केवल एक हल्की, सहायक नज़र मानें।
इसे शांति से कैसे पढ़ें
D45 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में नौवें भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D45 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। चरित्र रोज़ के चुनावों से बनता है; परंपरा इस वर्ग को उसकी झलक भर मानती है, उस पर मोहर नहीं।