यह क्या है
खवेदांश में हर राशि के चालीस बराबर हिस्से होते हैं, हर हिस्सा 45 कला, यानी पौन अंश का। यह ऊँचे वर्गों में से है, जिनका उपयोग पक्के जन्म-समय के साथ ही होता है।
कैसे निकाला जाता है
नियम: विषम राशि में पहला हिस्सा मेष का, सम राशि में तुला का; फिर आगे क्रम से, और 40 हिस्सों में राशिचक्र तीन से ज़्यादा बार घूमता है।
उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17 ÷ 0.75 ≈ 22.67, यानी तेईसवाँ हिस्सा। मेष विषम है, इसलिए मेष से तेईसवीं राशि: कुंभ (बारह पूरी कर, फिर ग्यारहवीं राशि)। D40 में यह ग्रह कुंभ में होगा। वृषभ के 17° पर होता, तो तुला से तेईसवीं राशि, यानी सिंह।
परंपरा इसमें क्या देखती है
पराशर खवेदांश को जीवन के सामान्य अच्छे-बुरे अनुभवों के विचार से जोड़ते हैं। बाद की परंपरा के कई ज्योतिषी इसमें माता की ओर से मिली विरासत, यानी ननिहाल से आए संस्कार और सहारे, की झलक देखते हैं। चंद्रमा और चौथे भाव का स्वामी यहाँ देखे जाते हैं। यह सामान्य भलाई का एक बारीक, सहायक विचार है।
जन्म-समय कितना मायने रखता है
लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D40 का एक भाग 45′ का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 3 मिनट का अंतर D40 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा भी एक भाग लगभग सवा घंटे में पार कर लेता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। ज़्यादातर लोगों का जन्म-समय इतना पक्का नहीं होता, इसलिए D40 को बहुत हल्के से लें।
इसे शांति से कैसे पढ़ें
D40 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में चौथे भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D40 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। परिवार की विरासत में बहुत कुछ ऐसा होता है जो कुंडली नहीं दिखाती: कहानियाँ, आदतें, प्यार। इस वर्ग को उसका एक छोटा-सा हिस्सा ही मानिए।