मकर संक्रांति क्या है
‘संक्रांति’ यानी सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। ऐसा साल में बारह बार होता है, पर मकर संक्रांति सबसे बड़ी मानी जाती है, क्योंकि परंपरा इसे उत्तरायण का आरंभ कहती है: सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा, बढ़ते दिन और फसल का मौसम।
यह उन बहुत कम त्योहारों में है जो चाँद से नहीं, सूर्य से तय होते हैं; इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में इसकी तारीख लगभग स्थिर (14 या 15 जनवरी) रहती है।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु, मुहूर्त चिंतामणि): सूर्य का मकर-प्रवेश किस घड़ी होता है, उससे पुण्यकाल तय होता है।
- दिन में प्रवेश: प्रवेश के बाद की 40 घड़ी (लगभग 16 घंटे) पुण्यकाल। अगर दिन बहुत थोड़ा बचा हो, तो धर्मसिंधु उसी दिन, प्रवेश से पहले के समय में स्नान-दान करने को कहता है।
- सूर्यास्त के बाद या रात में प्रवेश: अगला दिन पुण्यकाल, उसमें भी दिन का पहला आधा, और सूर्योदय के बाद की पाँच घड़ी सबसे अच्छी। मुहूर्त चिंतामणि भी कहता है: सूर्यास्त के बाद मकर-संक्रांति हो तो अगला दिन।
14 या 15 जनवरी क्यों: भारतीय पंचांग राशियाँ नक्षत्रों से जोड़कर (निरयण) गिनते हैं। सूर्य का निरयण मकर-प्रवेश आजकल 14 जनवरी के आसपास होता है, कभी दिन में, कभी रात में; सूर्यास्त के बाद हो तो त्योहार 15 को। खगोलीय शीत-अयनांत (सबसे छोटा दिन) लगभग 21 दिसंबर को होता है; यह अंतर निरयण गणना के कारण है।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
परंपरा में कई कथाएँ हैं। एक के अनुसार सूर्य इस दिन अपने पुत्र शनि (मकर के स्वामी) के घर जाते हैं, पिता-पुत्र के मेल का दिन। महाभारत की परंपरा में भीष्म ने देह-त्याग के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी। एक और कथा राजा भगीरथ की है, जिनके पीछे-पीछे गंगा इसी दिन सागर तक पहुँचीं; इसीलिए गंगासागर में इस दिन बड़ा मेला लगता है।
धर्मसिंधु उत्तरायण पर तिल का दान, तिल से होम और तिल खाने की बात करता है, और शिव को तिल-चावल से पूजने की। तिल-गुड़ की रीति की यही जड़ है।
परिवार कैसे मनाते हैं
- पंजाब, हरियाणा: एक दिन पहले लोहड़ी, अलाव, रेवड़ी-मूंगफली।
- उत्तर प्रदेश, बिहार: ‘खिचड़ी’; गंगा-स्नान, दही-चूड़ा, तिलकुट।
- गुजरात, राजस्थान: उत्तरायण, पूरे दिन पतंगबाज़ी, उंधियू और चिक्की।
- महाराष्ट्र: ‘तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला’: तिल-गुड़ बाँटकर मीठा बोलने का वचन; हल्दी-कुमकुम।
- तमिलनाडु: चार दिन का पोंगल: नई फसल के चावल-गुड़ का पोंगल उफनाकर सूर्य को अर्पित।
- असम: माघ बिहू (भोगाली), सामूहिक भोज।
- कर्नाटक, आंध्र: ‘एळ्ळु-बेल्ला’ और ‘संक्रांति’, रंगोली, गायों का उत्सव।
सरल पूजा
- पुण्यकाल में स्नान; पानी में थोड़े तिल डाल सकते हैं।
- तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और अक्षत लेकर सूर्य को अर्घ्य।
- तिल-गुड़ भगवान को अर्पित करें, फिर परिवार और पड़ोसियों में बाँटें।
- अपनी सामर्थ्य से दान: तिल, गुड़, खिचड़ी का सामान, कंबल या गरम कपड़े किसी ज़रूरतमंद को।
- खिचड़ी बनाकर परिवार के साथ खाएँ।
सुरक्षा: पतंग, ठंड और पानी
मांझा: काँच या धातु वाला (चाइनीज़) मांझा पक्षियों और दोपहिया सवारों को गंभीर चोट पहुँचाता है, और कई राज्यों में प्रतिबंधित है; सादा सूती धागा लें। दोपहिया पर गले में दुपट्टा या गार्ड रखें।
छत: बच्चे मुंडेर वाली छत पर अकेले पतंग न उड़ाएँ; बिजली के तारों में फँसी पतंग न खींचें।
स्नान: ठंडी नदियों में किनारे पर ही स्नान करें, गहरे पानी और तेज़ बहाव से दूर; बुज़ुर्ग, बच्चे और दिल-ब्लड प्रेशर वाले गुनगुने पानी से घर पर स्नान करें। मेलों की भीड़ में बच्चों का हाथ थामें। अलाव से सुरक्षित दूरी रखें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।