महाशिवरात्रि क्या है
हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी शिव की रात मानी जाती है: यह मासिक शिवरात्रि है। इनमें से माघ की कृष्ण चतुर्दशी (पूर्णिमांत पंचांग में फाल्गुन) सबसे बड़ी है: महाशिवरात्रि। यह आमतौर पर फ़रवरी या मार्च में आती है, सर्दी के जाने और वसंत के आने के बीच।
इस रात लोग उपवास रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, और जितना हो सके जागकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते हैं।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): शिवरात्रि निशीथ-व्यापिनी ली जाती है। निशीथ रात का आठवाँ मुहूर्त है, यानी लगभग आधी रात।
- चतुर्दशी केवल दूसरे दिन निशीथ में हो → दूसरा दिन।
- केवल पहले दिन निशीथ में हो → पहला दिन।
- दोनों दिन निशीथ में हो, या किसी दिन न हो → धर्मसिंधु के अनुसार माधव, निर्णयसिंधु आदि बहुत से ग्रंथ दूसरा दिन लेते हैं (कौस्तुभ कुछ स्थितियों में पहला)।
धर्मसिंधु कहता है कि यह व्रत रविवार या मंगलवार के योग में और भी अच्छा माना गया है। मासिक शिवरात्रि के लिए भी वह यही निशीथ-नियम देता है, और साफ़ कहता है कि केवल प्रदोष देखने का कोई प्रमाण नहीं।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
शिवरात्रि की कई कथाएँ परंपरा में हैं। एक के अनुसार इसी रात शिव और पार्वती का विवाह हुआ। दूसरी कथा में ब्रह्मा और विष्णु के बीच ‘कौन बड़ा’ का विवाद हुआ, तब उनके बीच एक अनंत ज्योति-स्तंभ प्रकट हुआ जिसका न आदि मिला न अंत; यही शिव का लिंग-रूप माना जाता है। एक लोक-कथा एक शिकारी की है जो रात भर पेड़ पर जागता रहा और अनजाने में बेल-पत्र नीचे शिवलिंग पर गिराता रहा; परंपरा कहती है कि शिव भाव देखते हैं, विधि नहीं।
इन कथाओं को हम परंपरा के रूप में रखते हैं, किसी पुराण के अध्याय का दावा नहीं करते।
परिवार कैसे मनाते हैं
सुबह से ही शिव मंदिरों में लंबी कतारें: जल, दूध और बेल-पत्र चढ़ाने के लिए। उज्जैन के महाकाल, काशी विश्वनाथ, सोमनाथ और बाकी ज्योतिर्लिंगों में रात भर पूजा। कश्मीर में यह ‘हेरथ’ है, परिवार का बड़ा उत्सव। नेपाल के पशुपतिनाथ में बड़ा मेला। दक्षिण भारत के मंदिरों में रात के चारों पहर अभिषेक। बहुत से घरों में लोग फलाहार करते हैं और रात को भजन-कीर्तन।
सरल पूजा
धर्मसिंधु रात के चार पहरों में पूजा की विधि देता है। घर पर सरल रूप:
- सुबह स्नान और संकल्प: ‘आज शिव का स्मरण और व्रत करूँगा/करूँगी।’
- शाम को शिवलिंग या शिव के चित्र पर जल, फिर दूध, फिर जल चढ़ाएँ।
- बेल-पत्र (तीन पत्तियों वाला), सफ़ेद फूल, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
- ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप, या शिव-स्तुति।
- रात के जितने पहर संभव हों, उतने में एक छोटी पूजा और जप।
- अगली सुबह चतुर्दशी रहते हुए पारण।
पूरी रात न जाग सकें तो एक-दो पहर भी परंपरा में पूरे माने जाते हैं।
सुरक्षा और सेहत
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र या नियमित दवा हो तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप भी परंपरा में है। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।
मंदिरों की भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ थामें, धक्का-मुक्की से बचें, और पानी साथ रखें। धतूरा और आक शिव को अर्पित किए जाते हैं, पर ये खाने की चीज़ें नहीं हैं; बच्चों की पहुँच से दूर रखें। भाँग का सेवन करें तो वाहन न चलाएँ, और दवा ले रहे हों तो बिल्कुल न लें।
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