होली क्या है
होली वसंत के आरंभ का पर्व है, दो हिस्सों में। पहली शाम, फाल्गुन पूर्णिमा को, होलिका दहन: लकड़ी और उपलों का ढेर जलाकर प्रह्लाद की भक्ति का स्मरण। अगली सुबह धुलेंडी या रंगों की होली: गुलाल, पानी, गीत, मिठाई और पुराने गिले-शिकवे भूलकर गले मिलना।
पूर्णिमांत पंचांग में रंगों वाला दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा है, अमांत में फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा। दिन एक ही है।
तारीख कैसे तय होती है
होलिका दहन (शास्त्र, धर्मसिंधु): पूर्णिमा वह ली जाती है जो प्रदोष (सूर्यास्त के बाद का पहला हिस्सा) में हो और भद्रा से रहित हो। दोनों दिन प्रदोष में हो तो दूसरा दिन। अगर प्रदोष में भद्रा हो, तो धर्मसिंधु कई उप-नियम देता है: भद्रा आधी रात से पहले खत्म हो तो उसके खत्म होने के बाद दहन; बाद में खत्म हो तो भद्रा के ‘मुख’ को छोड़कर, या भद्रा के ‘पुच्छ’ (अंतिम हिस्से) में। और साफ़ कहता है: दिन में दहन किसी ग्रंथ में नहीं।
भद्रा विष्टि करण का नाम है, आधी तिथि जितना समय। इसे बस टाला जाता है; डरने की बात नहीं। (देखें: करण का पेज।)
रंगों की होली (धर्मसिंधु): पूर्णिमा के बाद की कृष्ण प्रतिपदा, जो सूर्योदय पर हो; दोनों दिन सूर्योदय पर हो तो पहला दिन।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
प्रह्लाद और होलिका: परंपरा के अनुसार असुर-राजा हिरण्यकशिपु चाहता था कि सब उसी की पूजा करें, पर उसका बेटा प्रह्लाद विष्णु का भक्त था। राजा की बहन होलिका को वरदान था कि आग उसे नहीं जलाएगी; वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी। आग में होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। होलिका दहन इसी की याद है: भक्ति और सच्चाई की रक्षा।
राधा-कृष्ण: ब्रज की परंपरा में होली कृष्ण और राधा के रंग खेलने से जुड़ी है; बरसाना की लट्ठमार होली और वृंदावन की फूलों की होली इसी की झलक हैं।
धर्मसिंधु कृष्ण द्वितीया को सिंदूर आदि के चूर्ण और चंदन से बड़े उत्सव का वर्णन करता है; आज के गुलाल की जड़ यही रीति है।
परिवार कैसे मनाते हैं
उत्तर भारत में मोहल्ले की होलिका पर परिवार नई फसल की गेहूँ-जौ की बालियाँ भूनते हैं, नारियल और गुड़ अर्पित करते हैं। अगली सुबह रंग, गुझिया, ठंडाई और मिलना-जुलना। मथुरा-वृंदावन में होली एक हफ़्ते से ज़्यादा चलती है। बंगाल और ओडिशा में दोल यात्रा: राधा-कृष्ण को झूले पर बिठाकर अबीर। महाराष्ट्र में ‘शिमगा’ और रंगपंचमी (पाँच दिन बाद) पर रंग। पंजाब में होला मोहल्ला। दक्षिण में कई जगह यह कामदहन के रूप में मनाया जाता है।
सरल पूजा
होलिका दहन की शाम:
- होलिका के पास जल, रोली, अक्षत, फूल, कच्चा सूत, गुड़ और नई फसल की बालियाँ लेकर जाएँ।
- कच्चा सूत लपेटते हुए तीन या सात परिक्रमा करें।
- जल अर्पित करें, प्रह्लाद और नरसिंह का स्मरण करें।
- बालियाँ आग में भूनकर प्रसाद के रूप में बाँटें।
होली की सुबह: भगवान को गुलाल अर्पित करें, फिर बड़ों के पैरों पर गुलाल लगाकर आशीर्वाद लें।
सुरक्षा: आग, रंग और पानी
आग: होलिका बिजली के तारों, पेड़ों, वाहनों और घरों से दूर जलाएँ; हरे पेड़ न काटें, पुरानी लकड़ी और उपले लें। बच्चों और ढीले कपड़ों का ध्यान रखें, पास में पानी और रेत रखें।
रंग: सूखे, प्राकृतिक या त्वचा-सुरक्षित रंग लें; पहले चेहरे-बालों पर तेल लगा लें। आँखों में रंग जाए तो साफ़ पानी से धोएँ और जलन रहे तो डॉक्टर को दिखाएँ। दमा वाले लोग सूखे गुलाल के बादल से बचें।
पानी और सहमति: पानी कम बहाएँ। जो न खेलना चाहे, उस पर रंग न डालें; जानवरों पर रंग न लगाएँ। भाँग पीकर गाड़ी न चलाएँ।
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ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।