यह क्या है
विंशांश में हर राशि के बीस बराबर हिस्से होते हैं, हर हिस्सा 1 अंश 30 कला का। षोडशांश की तरह यहाँ भी गिनती राशि के स्वभाव (चर, स्थिर, द्विस्वभाव) से शुरू होती है, पर शुरुआत की राशियाँ अलग हैं।
कैसे निकाला जाता है
नियम: चर राशि में पहला हिस्सा मेष का, स्थिर राशि में धनु का, द्विस्वभाव राशि में सिंह का; फिर आगे क्रम से।
उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17 ÷ 1.5 ≈ 11.33, यानी बारहवाँ हिस्सा। मेष चर है, इसलिए मेष से बारहवीं राशि: मीन। D20 में यह ग्रह मीन में होगा।
परंपरा इसमें क्या देखती है
पराशर विंशांश को उपासना से जोड़ते हैं। परंपरा इसमें देखती है कि व्यक्ति का मन किस तरह की भक्ति, ध्यान या सेवा में रमता है। गुरु (बृहस्पति) और केतु की स्थिति, और नौवें व बारहवें भाव के स्वामी यहाँ देखे जाते हैं। यह आस्था की कोई परीक्षा नहीं; हर व्यक्ति का अपना रास्ता होता है।
जन्म-समय कितना मायने रखता है
लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D20 का एक भाग 1°30′ का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 6 मिनट का अंतर D20 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा एक भाग लगभग पौने तीन घंटे में पार करता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। जन्म-समय में थोड़ी भी अनिश्चितता हो, तो D20 के लग्न पर बात टिकाना ठीक नहीं।
इसे शांति से कैसे पढ़ें
D20 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में नौवें और बारहवें भाव और उनके स्वामियों को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D20 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। आध्यात्मिक जीवन मन से जुड़ा विषय है; यह वर्ग किसी की आस्था को छोटा-बड़ा नहीं ठहराता।