यह क्या है
नाम से लगता है कि त्रिंशांश में तीस भाग होंगे, पर पराशर की विधि में हर राशि के केवल पाँच भाग बनते हैं, और वे बराबर नहीं होते। ये भाग पाँच ग्रहों को मिलते हैं: मंगल, शनि, गुरु, बुध और शुक्र। सूर्य, चंद्र, राहु और केतु को इसमें कोई भाग नहीं मिलता।
कैसे निकाला जाता है
नियम: विषम राशि में 0–5° मेष (मंगल), 5–10° कुंभ (शनि), 10–18° धनु (गुरु), 18–25° मिथुन (बुध), 25–30° तुला (शुक्र)। सम राशि में क्रम उल्टा: 0–5° वृषभ (शुक्र), 5–12° कन्या (बुध), 12–20° मीन (गुरु), 20–25° मकर (शनि), 25–30° वृश्चिक (मंगल)।
उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। मेष विषम है, और 17° दस से अठारह के बीच है, इसलिए D30 में यह ग्रह धनु में, गुरु के भाग में होगा। वृषभ के 17° पर होता, तो सम राशि में 12–20° का भाग मीन (गुरु) होता।
परंपरा इसमें क्या देखती है
पराशर त्रिंशांश को जीवन की कठिनाइयों के विचार से जोड़ते हैं। ePandit इसे शांत भाषा में ऐसे कहता है: जीवन हर किसी की परीक्षा लेता है, और यह वर्ग परंपरा के अनुसार यह झलक देता है कि व्यक्ति उन परीक्षाओं से किस ढंग से निपटता है, धैर्य से, समझ से, साहस से या बातचीत से। परंपरा इसमें चरित्र और मन की दृढ़ता भी देखती है। छठे भाव का स्वामी और D30 का लग्न यहाँ देखे जाते हैं।
जन्म-समय कितना मायने रखता है
लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D30 का एक भाग 5° से 8° का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 20–30 मिनट का अंतर D30 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा एक भाग लगभग 9 से 15 घंटे में पार करता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। भाग असमान होने से संवेदनशीलता इस पर निर्भर करती है कि लग्न किस भाग की सीमा के कितना पास है; ePandit यह मिनटों में दिखाता है।
इसे शांति से कैसे पढ़ें
D30 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में छठे भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D30 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। इस वर्ग से डर की कोई सूची नहीं बनती। परीक्षाएँ सबके जीवन में आती हैं, और परंपरा इसे उनसे सीखने और आगे बढ़ने के ढंग की तरह पढ़ती है।