छठा भाव क्या दिखाता है
लग्न से छठी राशि छठा भाव है। ग्रंथों में इसका नाम रिपु भाव है, पर आज की भाषा में यह सेवा, मेहनत और प्रतिस्पर्धा का भाव है। ज्योतिष की परंपरा इसे इन विषयों से जोड़ती है:
- सेवा: दूसरों के लिए काम करना, नौकरी और रोज़ की ज़िम्मेदारियाँ
- दिनचर्या, अनुशासन और छोटी-छोटी आदतें
- ऋण और लेन-देन, और उन्हें सँभालने का ढंग
- प्रतिस्पर्धा, परीक्षा और मतभेद सुलझाने की क्षमता
- सहकर्मी, मददगार लोग और पालतू जानवर
- परंपरा में मामा भी इसी भाव से देखे जाते हैं
यह भाव किसी के 'विरोधी' गिनने के लिए नहीं, अपनी मेहनत और धैर्य को समझने के लिए है।
परंपरा में इसका स्थान: समूह, कारक, दिग्बल
छठा भाव तीन समूहों में आता है: आपोक्लिम (3, 6, 9, 12), उपचय (3, 6, 10, 11) और त्रिक। 6, 8, 12 को परंपरा कठिन भाव (दुःस्थान या त्रिक) कहती है; इनका अर्थ चुनौती से सीखना भी है। साथ ही छठा भाव उपचय है, यानी परंपरा मानती है कि इसके विषय कोशिश और समय के साथ सुधरते हैं। पुरुषार्थ में यह अर्थ का भाव है: रोज़ी-रोटी के लिए किया जाने वाला काम।
इसके नैसर्गिक कारक मंगल और शनि हैं: मंगल प्रतिस्पर्धा का जोश, शनि सेवा और धैर्य। काल-पुरुष की छठी राशि कन्या है, जिसका स्वामी बुध है, जो इस भाव में व्यवस्था और बारीकी का रंग जोड़ता है। यह केंद्र नहीं है, इसलिए यहाँ किसी ग्रह को पूरा दिग्बल नहीं मिलता।
राशि-भाव और भाव चलित
ePandit की कुंडली में छठा भाव दो तरह से दिखता है। राशि-भाव (whole sign) में लग्न से गिनी गई छठी राशि ही पूरा छठा भाव है। भाव चलित में भावों की सीमाएँ लग्न की ठीक डिग्री से तय होती हैं, इसलिए राशि के किनारे पर बैठा ग्रह चलित में पड़ोसी भाव में दिख सकता है।
मान लीजिए लग्न वृषभ 27° पर है और शनि वृश्चिक 2° पर: राशि-भाव में शनि सातवें भाव में है, पर चलित में वह छठे भाव की सीमा में आ सकता है। तब परंपरा सेवा और अनुशासन के विषयों में भी शनि को पढ़ती है।
दोनों एक ही आकाश की दो नज़रें हैं, गलती नहीं। ePandit का आधार राशि-भाव (D1) है; दोनों में भाव अलग दिखे, तो परंपरा दोनों भावों के विषय साथ देखती है।
षष्ठेश और यहाँ बैठे ग्रह: शांत नज़र से
छठे भाव के स्वामी को षष्ठेश कहते हैं। परंपरा मानती है कि षष्ठेश जिस भाव में है, वहाँ मेहनत और अनुशासन की ज़रूरत ज़्यादा दिखती है: षष्ठेश दसवें में हो तो ऐसे काम जिनमें दूसरों की ज़रूरतें पूरी करनी हों, ऐसा पढ़ा जाता है।
उपचय भाव होने के कारण परंपरा यहाँ मंगल, शनि, राहु जैसे ग्रहों को सहज मानती है: इन्हें प्रतिस्पर्धा में टिके रहने और मुश्किल काम को निपटाने की क्षमता से जोड़ा जाता है। चंद्र या शुक्र यहाँ सेवा में कोमलता जोड़ते हैं, ऐसा माना जाता है। खाली छठा भाव कोई कमी नहीं है। कोई ग्रह यहाँ अकेले कुछ तय नहीं करता; राशि, दृष्टि और दशा साथ देखे जाते हैं।
नवांश और दूसरे वर्ग में छठा भाव
षोडशवर्ग में छठे भाव के लिए अलग से कोई एक वर्ग तय नहीं है, इसलिए परंपरा इसे मुख्यतः जन्म कुंडली (D1) और नवांश (D9) में पढ़ती है। नवांश में षष्ठेश की स्थिति से उसकी गहराई देखी जाती है।
BPHS के षोडशवर्ग अध्याय में त्रिंशांश (D30) का विषय जीवन की कठिनाइयों से जुड़ा बताया गया है, इसलिए कुछ ज्योतिषी छठे भाव के साथ इसे भी देखते हैं। ePandit D30 को केवल एक चार्ट के रूप में दिखाता है, उससे कोई फ़ैसला नहीं निकालता।
अष्टकवर्ग: इस भाव के अंक
सात ग्रहों की अष्टकवर्ग-तालिकाएँ जोड़कर सर्वाष्टकवर्ग (SAV) बनता है; हर कुंडली में बारह राशियों के कुल अंक 337 ही होते हैं, यानी औसत लगभग 28। छठे भाव का अंक उस राशि का SAV अंक है जो आपकी कुंडली में छठे भाव में पड़ती है; जैसे लग्न मीन हो तो सिंह का अंक।
ePandit ये अंक बिना शोधन (unreduced) दिखाता है। यह गिनती है, फ़ैसला नहीं; हम इन्हें अच्छा या बुरा नहीं कहते। अपनी मुफ़्त कुंडली के अष्टकवर्ग टैब में यह अंक देखा जा सकता है।