परिचय
राशि-कुंडली (D1) में हर भाव एक पूरी राशि होता है: लग्न की राशि पहला भाव, अगली राशि दूसरा। यह सरल और पुराना तरीका है, और ePandit की मुख्य कुंडली इसी से बनती है।
पर आकाश में भाव हमेशा 30 अंश के बराबर टुकड़े नहीं होते। उदय होता हुआ बिंदु (लग्न) और आकाश का सबसे ऊँचा बिंदु (दशम, MC) जन्म के स्थान और समय के अनुसार अलग-अलग दूरी पर होते हैं। भाव-चलित इन असली बिंदुओं से भाव बनाता है। इसे "चलित" इसलिए कहते हैं कि इसमें भाव राशि की सीमा से हटकर "चलते" हैं।
श्रीपति पद्धति: भाव-मध्य और भाव-संधि
ePandit भाव-चलित के लिए श्रीपति पद्धति लेता है, जिसे बी. वी. रमन ने भी अपनी पुस्तक में अपनाया है। तरीका यह है:
- चार कोने: लग्न का अंश पहले भाव का मध्य है, और दशम (MC) का अंश दसवें भाव का मध्य। इनके ठीक सामने सातवें और चौथे भाव के मध्य हैं।
- तीन-तीन बराबर हिस्से: लग्न से चौथे, चौथे से सातवें, सातवें से दसवें, और दसवें से लग्न तक के हर हिस्से को तीन बराबर भागों में बाँटा जाता है। इनसे बाकी आठ भाव-मध्य मिलते हैं।
- भाव-संधि: दो पास के भाव-मध्यों का ठीक बीच का बिंदु संधि है। एक भाव पिछली संधि से अगली संधि तक फैला होता है।
क्योंकि चारों हिस्से हर कुंडली में बराबर नहीं होते, कुछ भाव 30 अंश से बड़े और कुछ छोटे बनते हैं। उत्तर भारत में या ऊँचे अक्षांश पर यह अंतर ज़्यादा दिख सकता है।
जब ग्रह का चलित-भाव राशि-भाव से अलग हो
मान लीजिए गुरु (बृहस्पति) राशि-कुंडली में तीसरे भाव में है, पर अपनी राशि के आख़िरी अंशों में, और चौथे भाव की संधि उससे पहले ही आ गई है। तब चलित में गुरु चौथे भाव में दिखेगा। यही "भाव बदलना" है।
- यह अक्सर तब होता है जब ग्रह राशि के शुरू या आख़िर के अंशों में हो, या लग्न राशि के शुरू या आख़िर में हो।
- ग्रह की राशि नहीं बदलती। उसकी राशि, नक्षत्र, उच्च-नीच स्थिति, दृष्टि और दशा वही रहती है। बदलता केवल यह है कि वह किस भाव के फल से ज़्यादा जुड़ा माना जाए।
- परंपरा मानती है कि भाव-संधि के बहुत पास बैठा ग्रह दोनों भावों से जुड़ा रहता है, इसलिए उसे किसी एक भाव में बाँधकर कठोर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
ePandit दोनों क्यों छापता है
ePandit की कुंडली में राशि-कुंडली और भाव-चलित दोनों मिलते हैं: बारह भाव-मध्य और संधियों की तालिका, हर ग्रह का राशि-भाव और चलित-भाव आमने-सामने, और चलित का चार्ट।
- मुख्य पढ़ाई, जैसे भावों के स्वामी और योग, राशि-कुंडली से होती है, जैसा उत्तर भारत में प्रचलित है।
- चलित एक दूसरी नज़र है: अगर कोई ग्रह दोनों में अलग भाव में है, तो पढ़ते समय दोनों भावों को ध्यान में रखा जाता है।
- षड्बल के दिग् बल और भाव से जुड़ी गणनाओं में भी यही भाव-मध्य काम आते हैं।
यह सब जन्म-समय पर बहुत निर्भर है। कुछ मिनट के अंतर से भी संधि के पास बैठे ग्रह का चलित-भाव बदल सकता है, इसलिए समय पक्का हो तभी चलित पर ज़्यादा भरोसा कीजिए।