सप्तांश (D7): संतान का वर्ग

सप्तांश (D7) हर राशि को लगभग 4°17′ के सात भागों में बाँटता है। परंपरा इसे संतान और वंश से जोड़ती है, और इसे हमेशा पाँचवें भाव के साथ पढ़ती है।

स्रोत: Bṛhat Parāśara Horā Śāstra (BPHS, Santhanam tr.), अध्याय 6 (सोलह वर्ग: गणना और विषय); अध्याय 7 (वर्ग-समूह और विंशोपक)

आपकी कुंडली में

विभाजन
D7 · हर राशि के 7 भाग
एक भाग
लगभग 4°17′ (30° ÷ 7)
गणना का नियम (पराशर)
विषम राशि में गिनती उसी राशि से, सम राशि में उससे सातवीं राशि से।
BPHS ch. 6
परंपरा किस विषय से जोड़ती है
संतान, वंश
BPHS ch. 6–7
जन्म-समय की संवेदनशीलता (औसत)
लगभग 17 मिनट (लग्न के लिए)

यह क्या है

सप्तांश में हर राशि के सात बराबर हिस्से होते हैं। 30 अंश को 7 से भाग देने पर एक हिस्सा लगभग 4 अंश 17 कला का बनता है। विषम और सम राशियों के लिए गिनती की शुरुआत अलग होती है।

कैसे निकाला जाता है

नियम: विषम राशि (मेष, मिथुन…) में पहला हिस्सा उसी राशि का, फिर आगे क्रम से। सम राशि (वृषभ, कर्क…) में पहला हिस्सा उससे सातवीं राशि का, फिर आगे क्रम से।

उदाहरण: कोई ग्रह मेष के 17° पर है। 17 ÷ 4°17′ ≈ 3.97, यानी यह चौथे हिस्से में है। मेष विषम है, इसलिए मेष से गिनती: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क। D7 में यह ग्रह कर्क में होगा। वृषभ के 17° पर होता, तो गिनती वृश्चिक से शुरू होती और चौथा हिस्सा कुंभ होता।

परंपरा इसमें क्या देखती है

पराशर सप्तांश को पुत्र-पौत्र, यानी संतान और आगे की पीढ़ी से जोड़ते हैं। परंपरा इसमें D7 का लग्न, पाँचवें भाव का स्वामी और गुरु (बृहस्पति) की स्थिति देखती है, क्योंकि गुरु को संतान का कारक माना जाता है। यह परिवार बढ़ने और बच्चों से जुड़ाव के विषय को समझने का एक तरीका है।

जन्म-समय कितना मायने रखता है

लग्न औसतन हर 4 मिनट में लगभग 1 अंश आगे बढ़ता है; कुछ राशियाँ जल्दी उदय होती हैं, कुछ धीरे। D7 का एक भाग लगभग 4°17′ का है, इसलिए जन्म-समय में लगभग 17 मिनट का अंतर D7 का लग्न बदल सकता है। चंद्रमा एक भाग लगभग 8 घंटे में पार करता है। ePandit आपकी कुंडली में हर वर्ग के साथ यह भी दिखाता है कि जन्म-समय कितने मिनट बदलने पर उस वर्ग का लग्न बदलेगा। अस्पताल का लिखा समय भी कभी-कभी कुछ मिनट आगे-पीछे होता है; इसलिए D7 का लग्न सावधानी से पढ़ें।

इसे शांति से कैसे पढ़ें

D7 को एक दूसरी नज़र की तरह पढ़िए, फ़ैसले की तरह नहीं। पहले मुख्य कुंडली (D1) में पाँचवें भाव और उसके स्वामी को देखा जाता है, फिर चल रही दशा को। D7 बस यह देखने में मदद करता है कि वही बात यहाँ भी दिखती है या नहीं। किसी ग्रह का इस वर्ग में किसी ख़ास राशि में होना अकेले कुछ तय नहीं करता। संतान से जुड़ी सेहत की कोई भी बात हो, तो सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा हैं। कुंडली इस विषय में डॉक्टर की जगह नहीं लेती।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सम राशि में गिनती सातवीं राशि से क्यों?

यह पराशर का दिया हुआ नियम है। विषम राशि अपने से गिनती शुरू करती है, सम राशि अपने से सातवीं से।

क्या D7 से बच्चों की संख्या या समय बताया जा सकता है?

ePandit ऐसा दावा नहीं करता। परंपरा D7 को संतान के विषय की एक झलक मानती है; समय दशा और गोचर से देखा जाता है, और जीवन के फ़ैसले परिवार और डॉक्टर की सलाह से होते हैं।

क्या केवल D7 देखकर कोई बात तय की जा सकती है?

नहीं। D7 मुख्य कुंडली के पाँचवें भाव और दशा के साथ ही अर्थ रखता है।

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आधार ग्रंथ

  • Bṛhat Parāśara Horā Śāstra (BPHS, Santhanam tr.) · अध्याय 6 (सोलह वर्ग: गणना और विषय); अध्याय 7 (वर्ग-समूह और विंशोपक)

शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान · अंतिम बार जाँचा: 2026-10-13