परिचय
इंटरनेट पर केमद्रुम योग को अक्सर डराने वाले शब्दों में लिखा जाता है। पर जो ग्रंथ यह योग बताते हैं, वही इसके कई परिहार भी बताते हैं, और इतने परिहार कि ज़्यादातर कुंडलियों में यह योग पूरी तरह लागू ही नहीं होता।
इस पेज पर हम शांति से देखेंगे: नियम क्या है, परिहार क्या हैं, और ePandit इसे कैसे दिखाता है।
नियम
चंद्रमा से दूसरे भाव में ग्रह हो तो सुनफा, बारहवें में हो तो अनफा, और दोनों में हों तो दुरुधरा योग बनता है। इन तीनों में सूर्य नहीं गिना जाता, और राहु-केतु भी नहीं; केवल मंगल, बुध, गुरु (बृहस्पति), शुक्र और शनि।
जब इन तीनों में से कोई भी योग न बने, यानी चंद्रमा के दोनों ओर कोई ग्रह न हो, तो उसे केमद्रुम कहते हैं (फलदीपिका 6.5, सारावली 13.2, बृहज्जातक अध्याय 13)।
BPHS (37.11-13) का नियम इससे कड़ा है: वह केमद्रुम तभी मानता है जब चंद्रमा के साथ भी कोई ग्रह न हो, और लग्न से केंद्र में भी कोई ग्रह न हो।
परिहार: जब यह लागू नहीं होता
ग्रंथ ये परिहार बताते हैं। ePandit हर एक को अलग से जाँचता है:
- लग्न से केंद्र में ग्रह: लग्न से 1, 4, 7 या 10वें भाव में मंगल, बुध, गुरु, शुक्र या शनि हो। BPHS के अनुसार तब केमद्रुम बनता ही नहीं। बृहज्जातक और फलदीपिका भी यह मत बताते हैं।
- चंद्रमा के साथ ग्रह: चंद्रमा की ही राशि में कोई ग्रह हो (BPHS, फलदीपिका 6.5)।
- चंद्रमा से केंद्र में ग्रह: चंद्रमा से 1, 4, 7 या 10वें भाव में ग्रह हो (फलदीपिका 6.5, रमन)।
- चंद्रमा पर दृष्टि: सारावली (13.2) केमद्रुम तभी मानता है जब चंद्रमा पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो।
जातक पारिजात की टिप्पणी भी गर्ग का मत बताती है कि केंद्र में इन पाँच ग्रहों में से किसी के होने से केमद्रुम का असर कम या ख़त्म हो जाता है।
रमन अपनी पुस्तक में एक उदाहरण-कुंडली देते हैं जिसमें चंद्रमा के दोनों ओर कोई ग्रह नहीं, फिर भी वे लिखते हैं कि केंद्रों में ग्रह होने से केमद्रुम का स्पष्ट परिहार है।
इतने परिहार क्यों मायने रखते हैं
सोचिए: पाँच ग्रह (मंगल से शनि) बारह राशियों में फैले होते हैं। उनमें से कम से कम एक का लग्न से या चंद्र से किसी केंद्र में होना, या चंद्र के साथ होना, या चंद्र को देखना, बहुत आम बात है। इसलिए पूरी तरह, बिना किसी परिहार के, केमद्रुम कम ही कुंडलियों में मिलता है।
जहाँ यह बिना परिहार के भी बने, वहाँ भी यह पूरी कुंडली की कई बातों में से एक है। पुराने ग्रंथ इसे मन के अकेलेपन या साधनों की तंगी वाले समय से जोड़ते हैं। परंपरा यह भी मानती है कि चंद्रमा मन का कारक है, इसलिए ऐसे समय में अपनों से जुड़े रहना, नियमित दिनचर्या और ध्यान-प्रार्थना से मन को सहारा मिलता है। यह किसी डर की बात नहीं।
ePandit में कैसे दिखता है
आपकी कुंडली में केमद्रुम की तीन में से एक स्थिति दिखती है:
| स्थिति | अर्थ |
|---|---|
| नहीं बना | चंद्रमा के दोनों ओर कम से कम एक ग्रह है (सुनफा, अनफा या दुरुधरा)। |
| बना, पर परिहार से लागू नहीं | दोनों ओर ख़ाली हैं, पर कोई परिहार लागू है; कौन-सा, यह लिखा होता है। |
| बना | दोनों ओर ख़ाली हैं और कोई परिहार नहीं मिला। |
परिहार हमेशा योग के साथ दिखते हैं, और कोई डराने वाला रंग या शब्द नहीं। जन्म-समय पता न हो तो लग्न वाला परिहार जाँचा नहीं जा सकता; यह साफ़ लिखा होता है।