परिचय
"योग" का सीधा अर्थ है जुड़ना। कुंडली में योग उस स्थिति को कहते हैं जब ग्रह किसी तय नियम के हिसाब से एक-दूसरे से या किसी भाव से जुड़ते हैं। जैसे: गुरु (बृहस्पति) चंद्रमा से केंद्र में हो तो गजकेसरी योग; मंगल अपनी राशि में होकर केंद्र में हो तो रुचक योग।
पुराने ग्रंथों में सैकड़ों योग गिनाए गए हैं। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र (BPHS), फलदीपिका, सारावली और बृहज्जातक में इनके नियम मिलते हैं, और बी. वी. रमन ने अपनी पुस्तक Three Hundred Important Combinations में तीन सौ प्रमुख योग उनके नियम और उदाहरण-कुंडलियों के साथ समझाए हैं।
एक बात शुरू में साफ़ कर दें: पंचांग में जो "योग" होता है (विष्कुंभ, प्रीति आदि 27 योग), वह सूर्य और चंद्र के देशांश से बनता है और बिल्कुल अलग चीज़ है। इस पेज पर बात कुंडली के योगों की है।
योग कैसे बनते हैं
ज़्यादातर योग इन बातों से बनते हैं:
- भाव से स्थिति: कोई ग्रह लग्न, चंद्रमा या सूर्य से किस भाव में है। जैसे सुनफा, अनफा, दुरुधरा चंद्रमा के दोनों ओर के भावों से बनते हैं।
- राशि का गौरव: ग्रह अपनी राशि, उच्च राशि या मूलत्रिकोण में है या नहीं। पंचमहापुरुष योग इसी पर टिके हैं।
- भावों के स्वामी: किस भाव का स्वामी कहाँ है और किससे जुड़ा है। राज योग और धन योग इसी से बनते हैं।
- जुड़ाव के तरीके: एक ही राशि में युति, एक-दूसरे पर पूर्ण दृष्टि, या राशि-परिवर्तन (एक-दूसरे की राशि में बैठना)।
ePandit पूर्ण-राशि भाव से गिनता है, और दृष्टि में पाराशरी नियम मानता है: हर ग्रह की 7वीं दृष्टि, मंगल की 4 और 8, गुरु की 5 और 9, शनि की 3 और 10।
पूरी कुंडली क्यों ज़रूरी है
योग देखकर जल्दी नतीजा निकालना आसान है, पर ग्रंथ खुद ऐसा नहीं करते। रमन लिखते हैं कि किसी योग का फल इस पर निर्भर करता है कि योग बनाने वाले ग्रह किस स्थिति में हैं; एक ही योग अलग-अलग कुंडलियों में बहुत अलग रूप में दिखता है। BPHS भी धन योगों के बाद कहता है कि उन्हें ग्रहों की अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति देखकर ही समझना चाहिए।
इसलिए योग को ऐसे पढ़िए:
- योग पूरी कुंडली की कई बातों में से एक है।
- उसका असर उसी ग्रह की दशा में ज़्यादा महसूस होता है, यह परंपरा मानती है।
- कई योग (जैसे वेशि, वाशि, बुधादित्य) लगभग हर कुंडली में मिलते हैं, इसलिए अकेले उनका ख़ास अर्थ नहीं।
- कोई योग किसी पद, धन या विवाह का वादा नहीं है, और कोई योग डरने की बात भी नहीं।
ePandit योग कैसे जाँचता है
ePandit की मुफ़्त कुंडली के "योग" टैब में हर योग के साथ चार चीज़ें दिखती हैं:
- नियम: सादी भाषा में, कि योग किस स्थिति से बना।
- आपकी कुंडली में कैसे बना: कौन-से ग्रह, किस भाव और राशि में।
- स्रोत: किस ग्रंथ के किस अध्याय से। जिस योग का नाम हमें अपने पुस्तकालय के शास्त्रीय ग्रंथों में नहीं मिला (जैसे बुधादित्य), उस पर "परंपरा" लिखा होता है।
- परिहार और शर्तें: जो ग्रंथ योग बताते हैं, वही अक्सर उसकी शर्तें और परिहार भी बताते हैं। ePandit ये हमेशा साथ दिखाता है।
जन्म-समय पता न हो तो लग्न तय नहीं होता। तब केवल चंद्रमा और सूर्य से बनने वाले योग जाँचे जाते हैं, और यह साफ़ लिखा जाता है।
प्रमुख योग-समूह
- चंद्र योग: गजकेसरी, सुनफा, अनफा, दुरुधरा, केमद्रुम, अधि, चंद्र-मंगल।
- सूर्य योग: वेशि, वाशि, उभयचरी, बुधादित्य।
- पंचमहापुरुष योग: रुचक, भद्र, हंस, मालव्य, शश।
- राज योग: केंद्र और त्रिकोण के स्वामियों का मेल; विपरीत राज योग (हर्ष, सरल, विमल); नीचभंग राज योग।
- धन योग: 2 और 11 के स्वामियों का 5 और 9 के स्वामियों से मेल; लक्ष्मी योग।
- अन्य: अमल, सरस्वती, परिवर्तन योग।
हर समूह का अलग पेज है, जिसमें नियम, स्रोत और परिहार विस्तार से हैं।