परिचय
कुंडली में 6, 8 और 12वें भाव को दुःस्थान कहते हैं: ये संघर्ष, अचानक बदलाव और ख़र्च जैसे विषयों से जुड़े माने जाते हैं। आम तौर पर इन भावों के स्वामी कहीं और बैठें तो उस भाव के लिए कठिनाई की बात कही जाती है।
पर एक दिलचस्प नियम उलटी बात कहता है: अगर दुःस्थान का स्वामी खुद किसी दुःस्थान में चला जाए, तो कठिनाई का असर बदल जाता है। इसलिए इसे "विपरीत" (उलटा) राज योग कहा जाता है।
तीन योग
फलदीपिका (6.57) बारह भावों के लिए बारह योगों के नाम देता है; इनमें छठे, आठवें और बारहवें भाव के लिए हर्ष, सरल और विमल योग हैं। रमन (Three Hundred Important Combinations, योग 109-111) इन्हें ऐसे बताते हैं:
| योग | नियम |
|---|---|
| हर्ष | छठे भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में |
| सरल | आठवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में |
| विमल | बारहवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में |
"विपरीत राज योग" छत्र-नाम हमें रमन की How to Judge a Horoscope में मिला, जहाँ वे उदाहरण-कुंडलियों में इसका प्रयोग करते हैं। फलदीपिका में तीनों योग अलग-अलग नामों से हैं।
परंपरा क्या मानती है
फलदीपिका और रमन इन योगों के फल इस तरह बताते हैं:
- हर्ष: सुख, अच्छा स्वास्थ्य-भाव, कठिनाइयों पर जीत, पाप कर्म से दूर रहने की वृत्ति, प्रतिष्ठित लोगों से मित्रता।
- सरल: निडरता, दृढ़ता, विद्या, कामों में सफलता, पवित्रता और प्रसिद्धि।
- विमल: कम ख़र्च और ज़्यादा बचत, सबके प्रति अच्छा व्यवहार, स्वतंत्र स्वभाव, अच्छे गुणों के लिए पहचान।
इन्हें झुकाव की तरह पढ़िए, तय नतीजों की तरह नहीं।
रमन की सावधानी
रमन यहीं एक ज़रूरी बात जोड़ते हैं। वे लिखते हैं कि इन योगों के लेखक ने बहुत अच्छे फल बताए हैं, पर पराशर और लोमश यह नहीं मानते कि दुःस्थान की स्वामिता का असर दूसरे दुःस्थान में जाने से पूरी तरह मिट जाता है; उनके अनुसार असर कुछ बदलता है, मिटता नहीं।
इसलिए ePandit इन योगों के साथ हमेशा यह नोट दिखाता है: पूरी कुंडली साथ देखें। अगर वही ग्रह लग्न का भी स्वामी हो (जैसे मेष या तुला लग्न में आठवें का स्वामी), तो यह भी अलग से लिखा जाता है, क्योंकि तब तस्वीर और बदल जाती है।
BPHS में मिलते-जुलते नियम
BPHS (39.20) में एक राज योग ऐसा भी है: 6, 8 और 12 के स्वामी नीच, शत्रु राशि में या अस्त हों और लग्नेश अपनी या उच्च राशि में होकर लग्न को देखे। यह हर्ष-सरल-विमल से अलग नियम है, पर उसी विचार से जुड़ा है कि कठिन भावों के स्वामियों का दबना कुंडली के लिए सहारा माना गया है। ePandit फ़िलहाल हर्ष, सरल और विमल ही गिनता है।
एक उदाहरण और ePandit में कैसे दिखता है
मान लीजिए लग्न वृषभ है। तब छठे भाव (तुला) का स्वामी शुक्र है, जो लग्न का भी स्वामी है; आठवें (धनु) का स्वामी गुरु (बृहस्पति); और बारहवें (मेष) का स्वामी मंगल।
अगर गुरु बारहवें भाव (मेष) में हो, तो आठवें भाव का स्वामी बारहवें में है, यानी सरल योग। ePandit इसे ऐसे दिखाएगा: "आठवें भाव का स्वामी (गुरु) बारहवें भाव में: सरल योग (फलदीपिका 6.57; रमन 109-111)", और साथ में रमन की सावधानी वाला नोट। गुरु यहाँ ग्यारहवें (मीन) का भी स्वामी है, यह भी लिखा जाएगा, ताकि पूरी तस्वीर सामने रहे।