ऋषि पंचमी क्या है
भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी कहते हैं। यह दिन उन ऋषियों के आदर का है जिनसे वेद, विद्या और गोत्र की परंपरा चली। परंपरा में सात ऋषि (सप्तर्षि) गिने जाते हैं: कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ, और उनके साथ वसिष्ठ की पत्नी अरुंधती। रात के आकाश में उत्तर दिशा के सात तारों के समूह को भी सप्तर्षि कहा जाता है, और उसमें वसिष्ठ तारे के पास एक छोटा तारा अरुंधती माना जाता है।
यह व्रत मुख्य रूप से स्त्रियाँ रखती हैं, पर ऋषियों का स्मरण कोई भी कर सकता है। महाराष्ट्र, नेपाल, गुजरात और उत्तर भारत के कई परिवारों में यह प्रचलित है।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): भाद्रपद शुक्ल पंचमी ऋषि पंचमी है, और वह मध्याह्न-व्यापिनी ली जाती है, यानी वह दिन जिसकी दोपहर में पंचमी चल रही हो। अगर दोनों दिन दोपहर में पंचमी हो, या किसी भी दिन न हो, तो पहला दिन लिया जाता है।
| मध्याह्न में पंचमी | दिन |
|---|---|
| केवल पहले दिन | पहला |
| केवल दूसरे दिन | दूसरा |
| दोनों दिन | पहला |
| किसी दिन नहीं | पहला |
निर्णय सिंधु भी इसे मध्याह्न-व्यापिनी पंचमी कहता है, और साथ में कुछ दूसरे आचार्यों के मत भी दर्ज करता है, जैसे दिवोदास का यह मत कि षष्ठी से जुड़ी पंचमी ली जाए। ऐसे मत-भेद पुराने ग्रंथों में सहज हैं। हमारा कैलेंडर धर्मसिंधु का नियम मानता है, और दिन उज्जैन के हिसाब से एक बार तय करता है।
ग्रंथ में व्रत: ऋषि-पूजा और बिना हल का भोजन
शास्त्र (धर्मसिंधु): इस पंचमी के दिन ऋषियों की पूजा करके ऐसी भूमि में उगे शाक का आहार करें जिसमें हल आदि न चला हो।
यही इस व्रत की सबसे सुंदर बात है: खेती से पहले के समय की तरह, जो धरती ने अपने-आप दिया, उसी से एक दिन का भोजन। आज कई घरों में इसे ऐसे निभाया जाता है (परंपरा): कंद-मूल, जंगली साग, या घर-आँगन में बिना जुताई उगी सब्ज़ियाँ; महाराष्ट्र में इस दिन की ‘ऋषि की भाजी’ बनती है, और गुजरात में कई परिवार सामा (एक जंगली अनाज) खाते हैं। नियम हर क्षेत्र और परिवार में थोड़े अलग हैं; अपने घर की रीति ही सबसे सहज रास्ता है।
कथा: परंपरा / लोक कथा
ऋषि पंचमी की प्रचलित व्रत-कथाएँ लोक-परंपरा की हैं। आमतौर पर इनमें एक ब्राह्मण परिवार की कथा आती है, और कुछ कथाओं में मासिक धर्म के पुराने नियमों का ज़िक्र होता है। हम इन कथाओं को परंपरा के रूप में रखते हैं।
एक बात साफ़ कहना ज़रूरी है: मासिक धर्म शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया है; उसमें डरने या शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं। आज बहुत-से परिवार इस व्रत को सप्तर्षियों के ज्ञान के प्रति आदर, सादगी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के दिन के रूप में देखते हैं।
परिवार कैसे मनाते हैं
नेपाल: तीज के उत्सव का यह आखिरी दिन माना जाता है; स्त्रियाँ नदी या घर पर स्नान करती हैं, कई जगह अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनियों से दातुन और स्नान की रीति है, फिर सप्तर्षियों की पूजा। महाराष्ट्र: ऋषि की भाजी, और कई स्त्रियाँ इस दिन बैल या हल से उगा अनाज नहीं खातीं। गुजरात: ‘सामा पांचम’, सामा का भोजन। उत्तर भारत: कई परिवारों में स्त्रियाँ व्रत रखकर सप्तर्षि की पूजा और कथा करती हैं।
कुछ परिवार इसे कुछ सालों तक रखकर उद्यापन करते हैं; यह भी कुल-रीति की बात है, ज़रूरी नहीं।
सरल पूजा
- सुबह स्नान; पूजा-स्थान पर एक चौकी।
- सात छोटी सुपारियाँ, फूल या चावल की सात ढेरियाँ सप्तर्षियों के रूप में, और एक अरुंधती के लिए।
- दीया, जल, रोली, अक्षत, फूल; सातों ऋषियों के नाम लेकर प्रणाम।
- कथा सुनें या पढ़ें; अपने गोत्र के ऋषि का नाम याद करें।
- दिन में बिना हल वाली उपज का सादा भोजन, या फल।
कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं। सातों ऋषियों के नाम श्रद्धा से लेना ही इस दिन का मूल है।
सेहत और सुरक्षा
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग उम्र, तबीयत ठीक न हो या नियमित दवा चलती हो, तो फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या पहले डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। निर्जला (बिना पानी) व्रत की ज़रूरत नहीं; चक्कर या कमज़ोरी लगे तो व्रत खोल दें।
जंगली साग या कंद तभी लें जब आप उन्हें अच्छी तरह पहचानते हों; अनजानी पत्तियाँ न खाएँ, और सब्ज़ी अच्छे से धोकर पकाएँ। भाद्रपद बरसात का समय है: नदी में स्नान करें तो किनारे पर, तेज़ बहाव से दूर, और बच्चों पर नज़र रखें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।