गणेश चतुर्थी: गणपति का आगमन

गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी है, जब घरों और पंडालों में गणपति की स्थापना होती है। धर्मसिंधु के अनुसार यह व्रत मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी में होता है; दोनों दिन मध्याह्न में हो या किसी दिन न हो, तो पहला दिन।

स्रोत: धर्मसिंधु, विनायक-चतुर्थी-व्रत, मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी

आपकी कुंडली में

तिथि
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
दिन का नियम
मध्याह्न में चतुर्थी; दोनों या किसी दिन नहीं तो पहला दिन
Dharmasindhu
उत्सव
डेढ़ से दस दिन, अनंत चतुर्दशी तक
प्रिय भोग
मोदक, दूर्वा, लाल फूल

गणेश चतुर्थी क्या है

हर महीने की शुक्ल चतुर्थी विनायक चतुर्थी है, पर भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी सबसे बड़ी है: गणेश चतुर्थी, जिसे धर्मसिंधु ‘सिद्धिविनायक व्रत’ कहता है। इस दिन घरों में मिट्टी की गणेश प्रतिमा लाई जाती है, उसकी स्थापना और पूजा होती है, और डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन बाद (अनंत चतुर्दशी तक) विसर्जन।

महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना में यह साल का सबसे बड़ा उत्सव है; 19वीं सदी के अंत से यह मोहल्लों के सार्वजनिक गणेशोत्सव के रूप में भी फैला।

तारीख कैसे तय होती है

शास्त्र (धर्मसिंधु): सिद्धिविनायक व्रत में चतुर्थी मध्याह्न-व्यापिनी ली जाती है। मध्याह्न दिन का बीच का हिस्सा है (दिन को तीन या पाँच हिस्सों में बाँटकर)।

  • केवल पहले दिन मध्याह्न में → पहला दिन।
  • केवल दूसरे दिन मध्याह्न में → दूसरा दिन।
  • दोनों दिन पूरे मध्याह्न में, या किसी दिन नहीं → पहला दिन, क्योंकि ग्रंथ तृतीया-युक्त चतुर्थी को इस व्रत में अच्छा मानता है।
  • पहले दिन मध्याह्न का कुछ हिस्सा और दूसरे दिन पूरा → दूसरा दिन।

धर्मसिंधु कहता है कि यह रविवार या मंगलवार के योग में और भी अच्छी मानी गई है, और यही नियम हर महीने की विनायक चतुर्थी पर भी लगता है।

कथा: परंपरा / पुराण कथा

परंपरा के अनुसार पार्वती ने स्नान से पहले उबटन से एक बालक बनाया, उसमें प्राण डाले और उसे द्वार पर पहरे के लिए बिठाया। शिव लौटे तो बालक ने उन्हें भीतर नहीं जाने दिया; विवाद में बालक का सिर कट गया। पार्वती के दुख को देखकर शिव ने हाथी का सिर लगाकर बालक को फिर जीवन दिया और उसे गणों का अधिपति, गणपति, बनाया, और वर दिया कि हर काम की शुरुआत में पहले उसकी पूजा होगी।

चंद्र-दर्शन: परंपरा इस चतुर्थी की रात चाँद नहीं देखती। कथा है कि चंद्रमा ने गणेश के रूप पर हँसी उड़ाई थी। अनजाने में चाँद दिख जाए तो चिंता की कोई बात नहीं; परंपरा स्यमंतक मणि की कथा सुन लेने को कहती है।

परिवार कैसे मनाते हैं

मुंबई और पुणे में विशाल पंडाल, ढोल-ताशे और लाखों लोगों के दर्शन। घरों में डेढ़ दिन के गणपति सबसे आम हैं: स्थापना, आरती, मोदक, और अगले दिन विसर्जन। गोवा में ‘चवथ’, कर्नाटक में गौरी-गणेश (एक दिन पहले गौरी पूजा), आंध्र-तेलंगाना में ‘विनायक चविति’ जिसमें 21 तरह के पत्तों से पूजा होती है। तमिलनाडु में ‘विनायगर चतुर्थी’ पर कोळुकट्टै बनते हैं।

सरल पूजा

धर्मसिंधु कहता है: मिट्टी आदि की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडश उपचारों से विनायक की पूजा, और मोदक का भोग। घर पर सरल रूप:

  1. पूजा-स्थान पर साफ़ चौकी, उस पर मिट्टी की छोटी प्रतिमा।
  2. जल छिड़ककर, दीया जलाकर, ‘ॐ गं गणपतये नमः’ से आवाहन।
  3. रोली, अक्षत, लाल फूल और 21 दूर्वा अर्पित करें।
  4. मोदक या लड्डू का भोग, आरती।
  5. जितने दिन रखें, रोज़ सुबह-शाम आरती; फिर घर पर ही विसर्जन।

सुरक्षा और पर्यावरण

मूर्ति: बिना रासायनिक रंग की मिट्टी (शाडू) की मूर्ति लें; प्लास्टर ऑफ़ पेरिस और तेल वाले रंग पानी में घुलते नहीं और नदियों-झीलों को नुकसान पहुँचाते हैं।

विसर्जन: घर पर बाल्टी या टब में, या नगर निगम के कृत्रिम कुंड में करें। नदी, झील या समुद्र में जाएँ तो गहरे पानी में न उतरें, बच्चों को पानी से दूर रखें, और प्रशासन के निर्देश मानें। घुली हुई मिट्टी पौधों में डाल दें।

भीड़ और आवाज़: पंडालों में बुज़ुर्गों और बच्चों का ध्यान; तेज़ आवाज़ के स्पीकर से बच्चों-पशुओं के कान बचाएँ।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चाँद देख लिया तो?

चिंता की बात नहीं। परंपरा इस रात चाँद न देखने की रीति रखती है; अनजाने में दिख जाए तो स्यमंतक मणि की कथा सुन लेने को कहती है।

गणपति कितने दिन रखें?

डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन: अपनी कुल-रीति और सुविधा से। सबमें पूजा का भाव एक ही है।

मध्याह्न ही क्यों?

धर्मसिंधु सिद्धिविनायक व्रत में मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी लेने को कहता है; पूजा का मुख्य समय भी परंपरा में यही है।

क्या पुरोहित से स्थापना ज़रूरी है?

नहीं। परिवार स्वयं सरल पूजा से स्थापना कर सकता है; पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं।

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आधार ग्रंथ

  • धर्मसिंधु, विनायक-चतुर्थी-व्रत · मध्याह्न-व्यापिनी चतुर्थी
  • धर्मसिंधु, विनायक-चतुर्थी (भाषा-टीका) · दोनों दिन या किसी दिन नहीं तो पहला
  • धर्मसिंधु, गणेश-पूजा · मिट्टी आदि की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा और षोडशोपचार
  • परंपरा · गणेश-जन्म की कथा; सार्वजनिक गणेशोत्सव; स्यमंतक कथा

शास्त्रीय ग्रंथों से मिलान · अंतिम बार जाँचा: 2026-10-14