प्रदोष व्रत क्या है
‘प्रदोष’ का अर्थ है रात की शुरुआत, यानी सूर्यास्त के ठीक बाद की संध्या। हर चांद्र महीने में दो त्रयोदशी आती हैं, एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। इन दोनों की शाम को शिव की पूजा का व्रत प्रदोष व्रत कहलाता है।
परंपरा मानती है कि प्रदोष की संध्या शिव की प्रिय बेला है। इसलिए इस दिन लोग दिन में हल्का खाते हैं या फलाहार करते हैं, सूर्यास्त के बाद शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, और उसके बाद रात का भोजन लेते हैं।
कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के अगले दिन चतुर्दशी, यानी मासिक शिवरात्रि आती है; इसलिए बहुत से लोग प्रदोष और शिवरात्रि को एक साथ शिव के दो दिन मानते हैं। आश्विन (पूर्णिमांत कार्तिक) की कृष्ण त्रयोदशी पर धनतेरस भी आती है, जिसका नियम भी प्रदोष वाली शाम से तय होता है।
तारीख कैसे तय होती है
शास्त्र (धर्मसिंधु): प्रदोष व्रत में वह त्रयोदशी ली जाती है जो प्रदोष में हो, और धर्मसिंधु प्रदोष को सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त बताता है। एक मुहूर्त लगभग 48 मिनट का होता है, इसलिए प्रदोष लगभग ढाई घंटे का है; ठीक लंबाई दिन-रात की लंबाई से बदलती है।
- त्रयोदशी केवल एक दिन की शाम में प्रदोष को छुए → वही दिन।
- दोनों दिन की शाम में बराबर हो, या दोनों दिन थोड़ा-थोड़ा बराबर छुए → दूसरा दिन।
- दोनों दिन अलग-अलग मात्रा में छुए → जिस दिन प्रदोष में ज़्यादा हिस्सा हो, वह दिन (धर्मसिंधु कहता है, अगर उतने में पूजा और भोजन का समय मिल जाए)।
- किसी दिन प्रदोष में न हो → दूसरा दिन।
ध्यान दें: यह नियम त्रयोदशी के लिए है। मासिक शिवरात्रि (चतुर्दशी) का नियम अलग है, वहाँ आधी रात (निशीथ) देखी जाती है, केवल प्रदोष नहीं।
धर्मसिंधु की विधि और वार के नाम
धर्मसिंधु इस व्रत को प्रदोष समय में शिव-पूजा और नक्त-भोजन वाला व्रत कहता है। ‘नक्त’ का अर्थ है रात का एक भोजन: दिन में उपवास या हल्का आहार, और शाम की पूजा के बाद भोजन। यही इसका मूल रूप है; पूरा उपवास ज़रूरी नहीं।
धर्मसिंधु यह भी बताता है कि कुछ लोग इस व्रत की शुरुआत शनिवार वाली शुक्ल त्रयोदशी से करके साल भर हर पक्ष में रखते हैं, या केवल शनिवार से युक्त चौबीस त्रयोदशियों में रखते हैं।
वार के हिसाब से नाम लोक में प्रचलित हैं (परंपरा): सोमवार को सोम प्रदोष, मंगलवार को भौम प्रदोष, शनिवार को शनि प्रदोष। उत्तर भारत में सोम और शनि प्रदोष की ख़ास भीड़ रहती है; दक्षिण भारत के शिव-मंदिरों में हर प्रदोष पर नंदी का अभिषेक और शाम की परिक्रमा होती है।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
प्रदोष से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र-मंथन की है: जब मंथन से विष निकला, तो शिव ने उसे अपने कंठ में रोक लिया और ‘नीलकंठ’ कहलाए। परंपरा कहती है कि यह संध्या का समय था, और देवताओं ने तब शिव की स्तुति की; इसलिए प्रदोष की संध्या शिव की पूजा की बेला मानी जाती है। एक और मान्यता है कि प्रदोष में शिव कैलाश पर आनंद-नृत्य करते हैं।
इन कथाओं को हम परंपरा के रूप में रखते हैं, किसी पुराण के अध्याय का दावा नहीं करते।
सरल पूजा
- सुबह स्नान और संकल्प: ‘आज शिव का स्मरण और प्रदोष व्रत करूँगा/करूँगी।’
- दिन में फलाहार या हल्का भोजन, अपनी सेहत के हिसाब से।
- सूर्यास्त से थोड़ा पहले फिर हाथ-मुँह धोकर तैयार हों।
- प्रदोष काल में शिवलिंग या शिव के चित्र पर जल, फिर दूध, फिर जल; बेलपत्र, सफ़ेद फूल, चंदन और अक्षत।
- एक दीया जलाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप, या शिव-स्तुति।
- पूजा के बाद रात का सादा भोजन (नक्त)।
मंदिर न जा सकें तो घर पर पाँच मिनट का जप और दीया भी परंपरा में पूरा माना जाता है।
सेहत
उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, डायबिटीज़ वाले, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। निर्जला (बिना पानी) व्रत की कोई ज़रूरत नहीं; दिन में पानी पीते रहें।
सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। शाम को मंदिरों में भीड़ हो तो बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ थामें; दीयों को कपड़ों से दूर रखें।
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ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।