परिचय
हर कोई जानना चाहता है कि कुंडली में पैसे को लेकर क्या लिखा है। ग्रंथ इसके लिए "धन योग" बताते हैं: ऐसे संयोग जिन्हें परंपरा कमाई, बचत और संसाधनों की समझ से जोड़ती है।
BPHS में धन के कई नियम अलग-अलग अध्यायों में हैं, जैसे दूसरे भाव का अध्याय (13) और धन-संयोगों का अध्याय (41)। ePandit इनमें से कुछ स्पष्ट नियम चुनकर एक सरल रूप में दिखाता है, और साफ़ लिखता है कि यह जोड़ हमारा सार है।
कौन-से भाव
- दूसरा भाव: संचित धन, परिवार, वाणी।
- ग्यारहवाँ भाव: लाभ, आमदनी, इच्छाओं की पूर्ति।
- पाँचवाँ और नौवाँ भाव: BPHS इन्हें "लक्ष्मी स्थान" कहता है। BPHS (41.16) के अनुसार पाँचवें और नौवें भाव के स्वामी धन देने में समर्थ हैं, और जो ग्रह इनके साथ बैठें वे भी।
ePandit का नियम
ePandit दो बातें देखता है:
1. 2/11 के स्वामी और 5/9 के स्वामी का संबंध। दूसरे या ग्यारहवें भाव का स्वामी, पाँचवें या नौवें भाव के स्वामी से जुड़ा हो: एक ही राशि में, एक-दूसरे की राशि में (परिवर्तन), या परस्पर पूर्ण दृष्टि से। यह जोड़ BPHS 41.16 (5वें-9वें स्वामी धन देने वाले, और उनके साथ बैठे ग्रह भी) से बनता है। रमन भी लिखते हैं कि दूसरे भाव का स्वामी नवमेश के साथ नवम में हो तो बहुत धन की बात कही जाती है।
2. 2 और 11 के स्वामियों का संबंध। BPHS (13.4): दूसरे का स्वामी ग्यारहवें में और ग्यारहवें का स्वामी दूसरे में हो, या दोनों मिलकर केंद्र या त्रिकोण में बैठें।
अगर एक ही ग्रह दोनों तरह के भावों का स्वामी हो (जैसे किसी लग्न में 2 और 9 का स्वामी एक ही ग्रह), तो इसे अलग से लिखा जाता है।
लक्ष्मी योग
BPHS (36.27-28) के अनुसार नवम भाव का स्वामी अपनी मूलत्रिकोण, अपनी या उच्च राशि में होकर केंद्र में हो, और लग्नेश अच्छी स्थिति में हो, तो लक्ष्मी योग बनता है। फलदीपिका (6.21) में इसका दूसरा रूप है: नवमेश और शुक्र अपनी या उच्च राशि में होकर केंद्र या त्रिकोण में हों।
"लग्नेश अच्छी स्थिति में" को ePandit ऐसे पढ़ता है: लग्नेश नीच न हो और 6, 8, 12 में न हो। यह हमारी व्याख्या है, और योग के साथ यही लिखा होता है।
कैसे पढ़ें
BPHS (41.17) खुद कहता है कि ये योग ग्रहों की अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति और बल देखकर ही समझने चाहिए। इसलिए:
- धन योग पूरी कुंडली की कई बातों में से एक है।
- परंपरा मानती है कि इसका असर संबंधित ग्रहों की दशा में ज़्यादा दिखता है।
- मेहनत, समझदारी और सही फैसले हमेशा साथ चलते हैं।
- कोई योग किसी रकम, लॉटरी या अमीरी का वादा नहीं करता।
एक उदाहरण
मान लीजिए लग्न मेष है। तब दूसरे भाव (वृषभ) का स्वामी शुक्र, ग्यारहवें (कुंभ) का शनि, पाँचवें (सिंह) का सूर्य और नौवें (धनु) का गुरु (बृहस्पति) है।
अगर शुक्र और गुरु एक ही राशि में हों, तो दूसरे और नौवें भाव के स्वामियों का संबंध बनता है, और ePandit इसे धन योग के रूप में दिखाएगा: "2वें भाव का स्वामी (शुक्र) और 9वें भाव का स्वामी (गुरु) एक ही राशि में"। साथ में यह भी लिखा होगा कि शुक्र सातवें का और गुरु बारहवें का भी स्वामी है, क्योंकि पूरी तस्वीर इसी से बनती है।