पिता और बुज़ुर्गों की सेवा
पिता या घर के बुज़ुर्ग पुरुषों के छोटे-छोटे काम कर दें: दवा का समय, बैंक-काम, साथ बैठकर बात।
कब: रोज़, ख़ास कर रविवार
करें / न करें
करें
- उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें।
गाय को रोटी, पक्षियों को दाना, बड़ों और श्रमिकों की सेवा: परंपरा हर ग्रह के लिए सेवा का एक रूप बताती है।
गाय, कुत्ते, पक्षी या चींटियों को भोजन, बड़ों और ज़रूरतमंदों की सेवा; किसी जीव को कष्ट नहीं।
पिता या घर के बुज़ुर्ग पुरुषों के छोटे-छोटे काम कर दें: दवा का समय, बैंक-काम, साथ बैठकर बात।
कब: रोज़, ख़ास कर रविवार
करें
रविवार को गाय को एक रोटी और गुड़ का छोटा टुकड़ा खिलाएँ, या गौशाला में चारे की मदद करें।
कब: रविवार
न करें
माँ, दादी-नानी या पड़ोस की किसी अकेली बुज़ुर्ग महिला के साथ समय बिताएँ, उनके छोटे काम कर दें।
कब: रोज़, ख़ास कर सोमवार
गर्मी में घर के बाहर पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखें, या प्याऊ में मदद करें।
कब: रोज़
करें
भाई-बहनों के किसी काम में हाथ बँटाएँ; मन-मुटाव हो तो पहला क़दम आप उठाएँ।
कब: ख़ास कर मंगलवार
स्वस्थ हों तो किसी मान्य ब्लड बैंक में रक्तदान करें; आधुनिक परंपरा इसे मंगल (रक्त) से जोड़ती है।
कब: ब्लड बैंक के नियमों के अनुसार
न करें
बुधवार को पास की गौशाला या किसी गाय को हरी घास या हरा चारा खिलाएँ।
कब: बुधवार
न करें
छत या बालकनी में भीगी मूंग या दाना और साफ़ पानी का बर्तन रखें।
कब: बुधवार या रोज़
करें
न करें
गुरुवार को घर के बुज़ुर्गों, किसी शिक्षक या साधु-संत के लिए कोई छोटा काम करें, उनके पास बैठें, उनकी बात सुनें।
कब: गुरुवार
गुरुवार को किसी गाय या गौशाला में थोड़ी भीगी चने की दाल, गुड़ के एक टुकड़े के साथ, खिलाएँ।
कब: गुरुवार
न करें
शुक्रवार को किसी गाय या गौशाला में रोटी या हरा चारा खिलाएँ।
कब: शुक्रवार
न करें
घर से दूर किसी पेड़ के नीचे थोड़ा आटा और शक्कर मिलाकर रखें।
कब: शुक्रवार
किसी वृद्धाश्रम में समय दें, पड़ोस के अकेले बुज़ुर्ग का हाल पूछें, या किसी मज़दूर को पानी-भोजन दें। हाथ से की गई सेवा परंपरा में शनि से जुड़ी मानी जाती है।
कब: शनिवार, या जब भी हो सके
करें
एक रोटी (चाहें तो थोड़ा सरसों का तेल लगाकर) कौवों के लिए छत पर रखें या किसी कुत्ते को दें।
कब: शनिवार
न करें
किसी यात्री को रास्ता बताना, प्रवासी मज़दूर को पानी-भोजन देना, या किसी नए व्यक्ति को काम समझाना। परंपरा राहु को अनजान लोगों से जोड़ती है।
कब: जब भी अवसर मिले
छत या बालकनी में थोड़ा बाजरा या जौ और पानी का बर्तन रखें।
कब: रोज़ सुबह, या शनिवार
न करें
मंदिर की सफ़ाई, भंडारे में परोसना, या किसी आश्रम में हाथ बँटाना। चुपचाप की गई सेवा परंपरा में केतु से जुड़ी मानी जाती है।
कब: जब भी हो सके
करें
गली के किसी कुत्ते को रोटी या साफ़ पानी दें।
कब: रोज़, या मंगलवार / शनिवार
न करें
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