योग उदाहरण कुंडली
आपकी कुंडली में ये शास्त्रीय योग बनते हैं। हर योग के साथ उसका नियम और स्रोत।
सुनफा योग
नियम: चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य को छोड़कर कोई ग्रह (मंगल, बुध, गुरु (बृहस्पति), शुक्र या शनि) हो।
परंपरा इसे अपनी मेहनत से कमाई, समझदारी और अच्छे नाम से जोड़ती है। फल इस पर निर्भर है कि दूसरे भाव में कौन-सा ग्रह है।
राहु-केतु और सूर्य नहीं गिने जाते।
अगर 12वें में भी ग्रह हो तो यह दुरुधरा कहलाता है (नीचे)।
शास्त्र · BPHS (Santhanam) 37.7-10
शश योग
नियम: शनि अपनी राशि (मकर, कुंभ) या उच्च राशि (तुला) में होकर लग्न से केंद्र में हो।
परंपरा इसे संगठन चलाने की क्षमता, धैर्य, मेहनत और लोगों को साथ लेकर काम करने से जोड़ती है। पुराने ग्रंथों के कुछ कठोर शब्द आज के जीवन में शब्दशः नहीं लिए जाते।
लग्न से (BPHS, सारावली); चंद्र से भी (फलदीपिका 6.4)।
शास्त्र · Raman, Three Hundred Important Combinations, no. 21
राज योग (केंद्र-त्रिकोण स्वामी संबंध)
नियम: किसी केंद्र (1, 4, 7, 10) का स्वामी और किसी त्रिकोण (1, 5, 9) का स्वामी आपस में जुड़ें: राशि-परिवर्तन, एक ही राशि में युति, एक-दूसरे पर पूर्ण दृष्टि, या दोनों मिलकर केंद्र/त्रिकोण में। एक ही ग्रह केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी हो तो वह योगकारक कहलाता है।
परंपरा केंद्र को 'विष्णु स्थान' और त्रिकोण को 'लक्ष्मी स्थान' कहती है; दोनों के स्वामियों का मेल ज़िम्मेदारी, पहचान और आगे बढ़ने के अवसरों से जोड़ा जाता है। यह किसी पद या सफलता का वादा नहीं है।
BPHS (34.15): अगर केंद्र या त्रिकोण का स्वामी साथ में 6, 8 या 12वें भाव का भी स्वामी हो, तो केवल संबंध से राज योग नहीं माना जाता (मूलत्रिकोण राशि से तय होता है कि कौन-सी स्वामिता प्रमुख है)।
फल ग्रहों की स्थिति, दशा और पूरी कुंडली पर निर्भर है; BPHS (अ. 41) संबंधित ग्रहों के वर्ग-गौरव से फल की मात्रा बताता है।
शास्त्र · BPHS (Santhanam) 34.11-12
विमल योग (विपरीत राज योग)
नियम: बारहवें भाव का स्वामी 6, 8 या 12वें भाव में हो।
परंपरा इसे सोच-समझकर ख़र्च करने, स्वतंत्र स्वभाव और अच्छे गुणों के लिए पहचान से जोड़ती है।
हर्ष योग वाली रमन की सावधानी यहाँ भी लागू है।
शास्त्र · Phaladeepika 6.57
नीचभंग राज योग
नियम: कोई ग्रह अपनी नीच राशि में हो, और नीच-भंग की कोई शर्त पूरी हो: उस राशि का स्वामी, या उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी, लग्न या चंद्र से केंद्र में हो; या ये दोनों स्वामी आपस में केंद्र में हों; या नीच ग्रह पर उस राशि के स्वामी की दृष्टि हो।
परंपरा मानती है कि जिस ग्रह का नीच-भंग हो, उससे जुड़े विषयों में शुरुआती कठिनाई के बाद सँभलने और आगे बढ़ने की संभावना रहती है।
फलदीपिका 7.28: अगर नीच ग्रह 6, 8, 12 के बाहर हो तो योग और अच्छा माना गया है।
होरा सार की टिप्पणी एक तेलुगु ग्रंथ (जातक मार्तंड) का मत बताती है कि केवल लग्नेश का नीच-भंग ही राज योग है। ePandit यह मत नोट के रूप में दिखाता है।
नीच-भंग का अर्थ है 'नीच का प्रभाव कम होना'; यह अपने आप कोई बड़ा फल नहीं बताता।
शास्त्र · Phaladeepika 7.26
उभयचरी योग
नियम: सूर्य से दूसरे और बारहवें, दोनों भावों में चंद्रमा को छोड़कर ग्रह हों।
परंपरा शुभ उभयचरी को अच्छी वाणी, संतुलित व्यक्तित्व और लोगों में प्रिय होने से जोड़ती है।
वेशि वाली सभी शर्तें यहाँ भी लागू हैं।
शास्त्र · BPHS (Santhanam) 38.1
हम ये योग जाँचते हैं: गजकेसरी योग, बुधादित्य योग, सुनफा योग, अनफा योग, दुरुधरा योग, केमद्रुम योग, चंद्र-मंगल योग, अधि योग, रुचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य योग, शश योग, राज योग (केंद्र-त्रिकोण स्वामी संबंध), धन योग (2/11 के स्वामी और 5/9 के स्वामी), हर्ष योग (विपरीत राज योग), सरल योग (विपरीत राज योग), विमल योग (विपरीत राज योग), नीचभंग राज योग, वेशि योग, वाशि योग, उभयचरी योग, अमल योग, परिवर्तन योग (महा / दैन्य / खल), सरस्वती योग, लक्ष्मी योग
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