तुलसी विवाह: आँगन का छोटा सा उत्सव
तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे का भगवान विष्णु (दामोदर, श्रीकृष्ण या शालिग्राम) से प्रतीकात्मक विवाह किया जाता है। धर्मसिंधु कार्तिक शुक्ल नवमी से पूर्णिमा तक कई संभव दिन बताता है, पर कहता है कि प्रचलन में इसे एकादशी व्रत के पारण के दिन, प्रबोधोत्सव के साथ, रात के पहले हिस्से में किया जाता है। यह भक्ति और घर-परिवार के मेल का उत्सव है।
तुलसी के पौधे का शालिग्राम या श्रीकृष्ण से प्रतीकात्मक विवाह; घर-आँगन का एक छोटा उत्सव।
तुलसी विवाह क्या है
हिंदू घरों में तुलसी का पौधा आँगन या बालकनी की शोभा भी है और रोज़ की पूजा का केंद्र भी। देवउठनी एकादशी के आसपास इसी तुलसी को दुल्हन की तरह सजाकर भगवान विष्णु के रूप (दामोदर, श्रीकृष्ण या शालिग्राम) के साथ उसका प्रतीकात्मक विवाह किया जाता है।
गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में यह खास तौर पर प्रचलित है। कहीं यह घर के भीतर पाँच लोगों की छोटी पूजा है, कहीं मोहल्ले की बारात, मंडप और भोज वाला पूरा उत्सव। परंपरा में इसके बाद विवाह का मौसम खुलता माना जाता है।
दिन कैसे तय होता है
शास्त्र (धर्मसिंधु): तुलसी विवाह के कई संभव समय हैं: कार्तिक शुक्ल नवमी आदि तीन दिन, एकादशी से पूर्णिमा तक कोई भी दिन, या कार्तिक शुक्ल पक्ष के विवाह-नक्षत्र।
शास्त्र (धर्मसिंधु): फिर भी प्रचलन में इसे पारण के दिन, प्रबोधोत्सव (भगवान को जगाने के उत्सव) के साथ ही किया जाता है, और यह विवाह रात के पहले हिस्से में होता है। जो इसे प्रबोधोत्सव से अलग करना चाहें, वे दूसरे समय भी कर सकते हैं।
हमारा कैलेंडर इसे स्मार्त देवउठनी एकादशी के अगले दिन (पारण के दिन) शाम को दिखाता है। बहुत से परिवार इसे एकादशी की शाम को ही करते हैं, कुछ द्वादशी को, और कुछ कार्तिक पूर्णिमा तक किसी सुविधा वाले दिन। ये सब परंपरा में हैं।
कथा: परंपरा / पुराण कथा
परंपरा में तुलसी को वृंदा की कथा से जोड़ा जाता है: वृंदा एक पतिव्रता और विष्णु-भक्त थी, जिसका पति जालंधर था। कथा के अनुसार उसकी भक्ति के सम्मान में भगवान विष्णु ने उसे तुलसी के रूप में सदा अपने पास रहने का वर दिया, और शालिग्राम रूप में उससे विवाह का। इसीलिए विष्णु की पूजा में तुलसी दल का इतना मान है।
कथा के कई रूप हैं और ये हमारी लाइब्रेरी के ग्रंथों में नहीं मिले; हम इन्हें परंपरा के रूप में रखते हैं। इनका सार भक्ति, सम्मान और प्रकृति से प्रेम है।
परिवार कैसे मनाते हैं
तुलसी के गमले को रंगोली, गेरू और फूलों से सजाया जाता है, ऊपर गन्ने का मंडप बनता है, तुलसी को लाल चुनरी, चूड़ी और बिंदी से दुल्हन की तरह सजाते हैं। दूल्हे के रूप में शालिग्राम या श्रीकृष्ण की छोटी मूर्ति रखी जाती है। मंगल गीत गाए जाते हैं, और कहीं-कहीं बाकायदा बारात भी आती है।
शास्त्र (धर्मसिंधु): ग्रंथ की संक्षिप्त विधि में तुलसी को हल्दी, कुमकुम और कंठसूत्र जैसे आभूषण अर्पित होते हैं; और जहाँ कुल का आचार हो, वहाँ तुलसी के सामने श्रीकृष्ण की प्रतिमा रखकर, बीच में अंतःपट (परदा) करके, मंगलाष्टक पढ़कर, परदा हटाकर अक्षत डाले जाते हैं।
कई परिवार यह पूजा कन्यादान के भाव से करते हैं। यह भक्ति की रीति है; किसी के विवाह से जुड़ा कोई वादा या शर्त इसमें नहीं है।
सरल पूजा
- तुलसी के गमले को साफ़ करें, आसपास रंगोली या चौक बनाएँ।
- चार गन्नों से छोटा मंडप, तुलसी पर लाल चुनरी, हल्दी-कुमकुम।
- सामने शालिग्राम या श्रीकृष्ण/विष्णु की छोटी मूर्ति या चित्र रखें।
- दीया जलाकर विष्णु और तुलसी का स्मरण, चाहें तो दोनों के बीच एक कपड़ा पकड़कर मंगल गीत, फिर कपड़ा हटाकर अक्षत।
- आरती, तुलसी की परिक्रमा, और प्रसाद (गन्ना, बेर, सिंघाड़ा, मिठाई) बाँटें।
कोई पैसे वाली पूजा ज़रूरी नहीं। पुरोहित बुलाना परिवार की इच्छा है।
सेहत, पौधा और सुरक्षा
कुछ लोग विवाह तक व्रत रखते हैं। जो लोग बीमार हैं, गर्भवती हैं, जिन्हें डायबिटीज़ है या जो दवा लेते हैं, वे हल्का रूप (फल, दूध) लें या डॉक्टर से पूछ लें; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा।
पौधे का ध्यान: सजावट में तुलसी की डालियों को कसकर न बाँधें, बहुत पानी न डालें, और एक साथ बहुत से पत्ते न तोड़ें। पूजा के बाद चुनरी और भारी सजावट हटा दें ताकि पौधे को धूप और हवा मिले।
दीये: दीयों को सूखी पत्तियों, चुनरी और परदों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
ePandit में
ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।
दीयों को परदों और कपड़ों से दूर रखें, बच्चों के पास बड़ा व्यक्ति रहे, और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या ग्रंथ इसका एक ही दिन बताता है?
धर्मसिंधु कई संभव दिन बताता है (नवमी से पूर्णिमा तक), पर कहता है कि प्रचलन पारण के दिन, रात के पहले हिस्से का है।
शालिग्राम न हो तो?
श्रीकृष्ण या विष्णु की छोटी मूर्ति या चित्र से भी यह किया जाता है; धर्मसिंधु भी श्रीकृष्ण की प्रतिमा की रीति बताता है।
क्या इससे विवाह जल्दी होता है?
हम ऐसा कोई वादा नहीं करते। परंपरा इसे भक्ति और परिवार के मेल का उत्सव मानती है; मन को सहारा मिलता है, बस इतना।
क्या कोई भी यह कर सकता है?
हाँ। अविवाहित, विवाहित, बुज़ुर्ग, कोई भी परिवार अपनी सुविधा से कर सकता है।
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