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संक्रांति: सूर्य का नई राशि में प्रवेश

हर महीने जब सूर्य (निरयण गणना में) एक राशि से अगली राशि में प्रवेश करता है, उसे संक्रांति कहते हैं; साल में ऐसी बारह संक्रांतियाँ होती हैं। धर्मसिंधु हर राशि के लिए प्रवेश से पहले या बाद का पुण्यकाल बताता है, और रात के प्रवेश के लिए आधी रात का नियम देता है। स्नान, सूर्य को जल और अपनी सामर्थ्य से दान इसकी पहचान हैं।

हर महीने सूर्य का नई राशि में प्रवेश: स्नान और दान का समय।

संक्रांति क्या है

‘संक्रांति’ का अर्थ है एक जगह से दूसरी जगह जाना। आकाश में सूर्य बारह राशियों से होकर गुज़रता है, और हर राशि में लगभग एक महीना रहता है। जिस घड़ी वह अगली राशि में प्रवेश करता है, वह उस राशि की संक्रांति है: मेष-संक्रांति, वृष-संक्रांति, और इसी तरह मीन-संक्रांति तक।

धर्मसिंधु बताता है कि सूर्य की एक संक्रांति से अगली संक्रांति तक सौर मास होता है। तमिलनाडु, केरल, बंगाल, ओडिशा, असम और पंजाब जैसे इलाक़ों के सौर कैलेंडरों में महीना इसी से शुरू होता है, इसलिए वहाँ संक्रांति महीने का पहला दिन भी है।

संक्रांति चाँद से नहीं, सूर्य से तय होती है, इसलिए यह किसी तिथि पर नहीं, सूर्य के राशि-प्रवेश की घड़ी पर टिकी है। भारतीय पंचांग राशियाँ नक्षत्रों से जोड़कर (निरयण) गिनते हैं; हमारा इंजन भी यही करता है।

पुण्यकाल कैसे तय होता है

शास्त्र (धर्मसिंधु): संक्रांति का ‘पुण्यकाल’, यानी स्नान-दान का समय, प्रवेश की घड़ी के पहले या बाद होता है, और यह राशि पर निर्भर है (एक घड़ी = 24 मिनट):

  • मेष, तुला: प्रवेश से पहले और बाद 15-15 घड़ी (कुछ आचार्य 10-10 कहते हैं)।
  • वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ: पहले की 16 घड़ी।
  • मिथुन, कन्या, धनु, मीन: बाद की 16 घड़ी।
  • कर्क: पहले की 30 घड़ी।
  • मकर: बाद की 40 घड़ी।

मुहूर्त चिंतामणि एक सामान्य नियम देता है: संक्रांति से पहले और बाद 16-16 घड़ी। हमारा कैलेंडर धर्मसिंधु की राशि-वार सूची लेता है।

रात में प्रवेश (शास्त्र, धर्मसिंधु और मुहूर्त चिंतामणि):

  • आधी रात से पहले प्रवेश → उसी दिन का उत्तरार्ध (दूसरा आधा) पुण्यकाल।
  • आधी रात के बाद प्रवेश → अगले दिन का पूर्वार्ध (पहला आधा)।
  • ठीक आधी रात में → दोनों: पहले दिन का उत्तरार्ध और अगले दिन का पूर्वार्ध।

धर्मसिंधु कहता है कि यह रात वाला नियम मकर और कर्क को छोड़कर बाकी सब संक्रांतियों पर लगता है। मकर रात में हो तो हर हाल में अगला दिन (इसकी पूरी बात मकर संक्रांति के पेज पर है)। कर्क का प्रवेश सूर्योदय से पहले हो, तो मुहूर्त चिंतामणि पहला दिन लेता है।

रात में प्रवेश हो तब भी स्नान आदि दिन में ही किया जाता है; धर्मसिंधु कहता है कि यह सबको मान्य है और बहुत से इलाक़ों का आचार भी यही है।

चार प्रकार की संक्रांतियाँ

धर्मसिंधु और मुहूर्त चिंतामणि बारह संक्रांतियों को चार नामों में बाँटते हैं:

  • अयन: मकर (उत्तरायण का आरंभ) और कर्क (दक्षिणायन का आरंभ)।
  • विषुव: मेष और तुला।
  • षडशीति (षडशीतिमुख): मिथुन, कन्या, धनु, मीन।
  • विष्णुपद: वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ।

धर्मसिंधु कहता है कि इन चारों में क्रम से (विष्णुपद से अयन की ओर) पुण्य अधिक माना गया है; इसीलिए मकर, कर्क, मेष और तुला की संक्रांतियाँ सबसे बड़े पर्व बनीं।

दान: धर्मसिंधु हर संक्रांति के लिए अलग दान गिनाता है, जैसे तुला में तिल और गोरस (दूध-दही), वृश्चिक में दीपक, मकर में लकड़ी और अग्नि (सर्दी में ईंधन), कुंभ में गायों को जल और घास। साथ में वह कहता है कि ऐसे और भी दान देखे जा सकते हैं; यानी दान अपनी सामर्थ्य और ज़रूरत देखकर।

उपवास: अयन और विषुव संक्रांति पर कुछ लोग उपवास रखते हैं; धर्मसिंधु इसे काम्य (अपनी इच्छा का) बताता है, नित्य (रोज़ का नियम) नहीं।

पूरे भारत में संक्रांति: परंपरा

  • मेष संक्रांति: पंजाब में बैसाखी, केरल में विषु, तमिलनाडु में पुथांडु (नया साल), असम में रोंगाली बिहू, ओडिशा में पणा संक्रांति, बंगाल में पोइला बोइशाख, कई जगह सौर नववर्ष।
  • कर्क संक्रांति: दक्षिणायन का आरंभ; ओडिशा और दक्षिण के मंदिरों में विशेष पूजा।
  • सिंह संक्रांति: उत्तराखंड में ‘घी संक्रांत’ (घ्यू त्यार)।
  • कन्या संक्रांति: बंगाल, ओडिशा, बिहार में विश्वकर्मा पूजा: औज़ारों और मशीनों की पूजा।
  • तुला संक्रांति: कर्नाटक के कोडगु में कावेरी संक्रमण।
  • मकर संक्रांति: पोंगल, लोहड़ी, उत्तरायण, माघ बिहू, खिचड़ी; इसका अलग पेज है।

बाकी संक्रांतियों पर बहुत से परिवार बस स्नान, सूर्य को जल और थोड़ा दान करते हैं। रीतियाँ इलाक़े के हिसाब से अलग हैं, और सब अपनी-अपनी जगह ठीक हैं।

सरल पूजा

  1. पुण्यकाल में (या उस दिन सुबह) स्नान।
  2. तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और अक्षत लेकर सूर्य को अर्घ्य।
  3. सूर्य का कोई सरल मंत्र, जैसे ‘ॐ सूर्याय नमः’, या गायत्री का जप।
  4. अपनी सामर्थ्य से दान: अन्न, कपड़ा, तिल-गुड़, या मौसम के हिसाब से कुछ ज़रूरी चीज़ किसी ज़रूरतमंद को।

परंपरा मानती है कि महीने के इस मोड़ पर सूर्य को याद करने से दिनचर्या में एक ठहराव और कृतज्ञता का भाव आता है।

सुरक्षा और सेहत

नदी-स्नान: किनारे पर ही नहाएँ, गहरे पानी और तेज़ बहाव से दूर। मेलों की भीड़ में बच्चों और बुज़ुर्गों का हाथ थामें। ठंड में गुनगुने पानी से घर पर स्नान भी पूरा माना जाता है।

उपवास: संक्रांति पर उपवास रखें तो अपनी सेहत के हिसाब से। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती महिलाएँ, डायबिटीज़ वाले या नियमित दवा लेने वाले लोग हल्का रूप (फल, दूध या एक समय का सादा भोजन) चुनें या डॉक्टर से पूछ लें। निर्जला व्रत की कोई ज़रूरत नहीं। सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता।

सूर्य को अर्घ्य देते समय सीधे सूरज की ओर देर तक न देखें।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

नदी-स्नान में किनारे पर रहें; ठंड में गुनगुना पानी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

साल में कितनी संक्रांतियाँ होती हैं?

बारह, हर राशि में सूर्य के प्रवेश पर एक। इनमें मकर, कर्क, मेष और तुला सबसे बड़ी मानी जाती हैं।

निरयण क्यों?

भारतीय पंचांग राशियाँ नक्षत्रों से जोड़कर (निरयण) गिनते हैं; हमारा इंजन भी यही करता है।

रात में संक्रांति हो तो?

आधी रात से पहले हो तो उसी दिन का उत्तरार्ध, बाद में हो तो अगले दिन का पूर्वार्ध। मकर और कर्क के अपने नियम हैं; मकर रात में हो तो अगला दिन।

क्या हर संक्रांति पर उपवास ज़रूरी है?

नहीं। धर्मसिंधु अयन और विषुव संक्रांति के उपवास को भी काम्य, यानी अपनी इच्छा का बताता है।

मकर संक्रांति का नियम अलग क्यों?

मकर के लिए धर्मसिंधु बाद की 40 घड़ी पुण्यकाल देता है, और रात के प्रवेश पर हर हाल में अगला दिन। विस्तार मकर संक्रांति के पेज पर है।

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