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संकष्टी चतुर्थी: हर महीने गणेश का व्रत

संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर रखा जाने वाला गणेश-व्रत है। धर्मसिंधु के अनुसार वह चतुर्थी ली जाती है जो चंद्रोदय के समय हो, क्योंकि व्रत चाँद को अर्घ्य देकर ही खोला जाता है। मंगलवार को पड़े तो इसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं।

हर महीने गणेश का व्रत, चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर खोला जाता है।

संकष्टी चतुर्थी क्या है

हर चांद्र महीने में दो चतुर्थी आती हैं। शुक्ल पक्ष वाली को बहुत से लोग विनायकी चतुर्थी कहते हैं, और कृष्ण पक्ष वाली (पूर्णिमा के चार दिन बाद) संकष्टी या संकट चतुर्थी कहलाती है। उत्तर भारत में इसे ‘सकट चौथ’ भी कहते हैं।

मुहूर्त चिंतामणि की टीका तिथियों के स्वामी गिनाते हुए चतुर्थी के स्वामी गणेश बताती है; इसलिए दोनों चतुर्थियाँ गणेश की मानी जाती हैं। संकष्टी की पहचान है: दिन भर उपवास या फलाहार, शाम को गणेश-पूजा, और रात को चाँद निकलने पर उसे अर्घ्य देकर व्रत खोलना।

तारीख कैसे तय होती है

शास्त्र (धर्मसिंधु): संकष्टी चतुर्थी चंद्रोदय-व्यापिनी ली जाती है, यानी वह दिन जिसकी रात में चाँद निकलते समय चतुर्थी चल रही हो।

  • चंद्रोदय पर चतुर्थी केवल पहले दिन हो → पहला दिन।
  • केवल दूसरे दिन हो → दूसरा दिन।
  • दोनों दिन हो → पहला दिन, क्योंकि धर्मसिंधु तृतीया से जुड़ी चतुर्थी लेने को कहता है।
  • किसी दिन न हो → दूसरा दिन।

निर्णयसिंधु भी चंद्रोदय-व्यापिनी लेने को कहता है, और दोनों दिन चंद्रोदय पर चतुर्थी होने की स्थिति में दो मत बताता है: कुछ तृतीया-योग के कारण पहला दिन लेते हैं, कुछ दूसरा। हमारा कैलेंडर धर्मसिंधु वाला नियम (पहला दिन) लेता है; आपके इलाक़े का पंचांग कभी-कभी अलग दिन दिखा सकता है।

चाँद रोज़ लगभग 50 मिनट देर से उगता है, इसलिए संकष्टी का चंद्रोदय अक्सर रात 8 से 10 बजे के बीच होता है; ठीक समय शहर के हिसाब से बदलता है।

धर्मसिंधु क्या और कहता है

  • अंगारकी: धर्मसिंधु कहता है कि मंगलवार वाली चतुर्थी भी पवित्र है। मंगलवार की संकष्टी को परंपरा अंगारकी संकष्टी कहती है और महाराष्ट्र में इसका ख़ास चलन है।
  • व्रत की अवधि: धर्मसिंधु बताता है कि यह व्रत श्रावण की कृष्ण चतुर्थी से शुरू करके सब महीनों की कृष्ण चतुर्थियों में किया जाता है; कोई जीवन भर, कोई इक्कीस वर्ष या एक वर्ष रखता है, और जो न रख सके वह हर साल श्रावण वाली चतुर्थी पर ही रख ले। यानी यह अपनी सामर्थ्य का व्रत है।
  • रात का भोजन: धर्मसिंधु कहता है कि संकष्टी के व्रत में भोजन रात में ही किया जाता है, यानी चंद्रोदय और पूजा के बाद।
  • करवा चौथ: आश्विन (पूर्णिमांत कार्तिक) की कृष्ण चतुर्थी करक-चतुर्थी, यानी करवा चौथ है; धर्मसिंधु उसका भी यही चंद्रोदय-नियम देता है।

कथा और परिवार की रीतियाँ: परंपरा

परंपरा में संकष्टी की कई कथाएँ हैं। एक लोक-कथा में गणेश जी ने एक बार चंद्रमा को उसकी हँसी पर टोका, फिर क्षमा भी दी; इसीलिए गणेश-व्रत चाँद को अर्घ्य देकर खोला जाता है। ‘संकष्ट’ का अर्थ है कठिनाई; लोग इस दिन गणेश को ‘विघ्नहर्ता’ रूप में याद करते हैं। इन कथाओं को हम परंपरा के रूप में रखते हैं, किसी पुराण के अध्याय का दावा नहीं करते।

  • महाराष्ट्र: हर महीने की संकष्टी पर मंदिरों में भीड़; अंगारकी पर पुणे और मुंबई के गणपति मंदिरों में लंबी कतारें। मोदक और उकडीचे मोदक।
  • उत्तर भारत: माघ (पूर्णिमांत) की ‘सकट चौथ’ पर माताएँ बच्चों के लिए व्रत रखती हैं; तिल और गुड़ का ‘तिलकुट’ बनता है।
  • दक्षिण भारत: मंदिरों में शाम को गणपति-होम और अभिषेक।

सरल पूजा

  1. सुबह स्नान और संकल्प: ‘आज गणेश जी का स्मरण और व्रत करूँगा/करूँगी।’
  2. दिन में फलाहार, या अपनी सेहत के हिसाब से हल्का भोजन।
  3. शाम को गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीया, दूर्वा (दूब घास), लाल फूल, और मोदक या लड्डू का भोग।
  4. ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का जप, या गणपति-अथर्वशीर्ष या कोई गणेश-स्तुति।
  5. चंद्रोदय होने पर लोटे से जल, थोड़ा दूध, अक्षत और फूल लेकर चाँद को अर्घ्य।
  6. फिर भोग का प्रसाद लेकर भोजन।

बादल हों और चाँद न दिखे, तो पंचांग के चंद्रोदय-समय पर उसकी दिशा में अर्घ्य देना परंपरा में ठीक माना जाता है।

सेहत

उपवास और सेहत: उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। जिनकी तबीयत ठीक न हो, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, डायबिटीज़ वाले, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के सादे भोजन वाला हल्का रूप चुनें, या डॉक्टर से पूछ लें। दवा का समय न बदलें। निर्जला (बिना पानी) व्रत की कोई ज़रूरत नहीं; दिन में पानी पीते रहें। चंद्रोदय देर से हो तो शाम को फल या दूध ले लेना भी परंपरा में है।

सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा है; कोई व्रत इसकी जगह नहीं लेता। छत पर अर्घ्य देने जाएँ तो अँधेरे में सीढ़ियों और मुंडेर का ध्यान रखें।

ePandit में

ePandit में: त्योहार का दिन हमारा कैलेंडर आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त से दिखाता है। दिन एक बार उज्जैन के हिसाब से तय होता है, आपके शहर का समय अलग दिखता है। हम अभी मुहूर्त नहीं निकालते, और किसी त्योहार को किसी के लिए अच्छा या बुरा नहीं बताते।

उपवास अपनी सेहत के हिसाब से रखें। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्ग या नियमित दवा लेने वाले लोग फल, दूध या एक समय के भोजन वाला हल्का रूप चुन सकते हैं; सेहत के लिए डॉक्टर ही पहला सहारा। बादल हों तो पंचांग के चंद्रोदय समय पर अर्घ्य देना परंपरा में ठीक माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चंद्रोदय ही क्यों देखा जाता है?

व्रत चाँद को अर्घ्य देकर खोला जाता है, इसलिए धर्मसिंधु वह चतुर्थी लेता है जो चंद्रोदय के समय हो।

अंगारकी संकष्टी क्या है?

मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी। धर्मसिंधु मंगलवार वाली चतुर्थी को पवित्र कहता है, और परंपरा इसे ख़ास मानती है।

दोनों दिन चंद्रोदय पर चतुर्थी हो तो?

धर्मसिंधु पहला दिन लेता है, क्योंकि उसमें तृतीया का योग है। निर्णयसिंधु दूसरा मत भी बताता है, इसलिए कुछ पंचांग अलग दिन दिखा सकते हैं।

करवा चौथ से क्या रिश्ता है?

करवा चौथ आश्विन (पूर्णिमांत कार्तिक) की संकष्टी है। धर्मसिंधु दोनों का एक ही चंद्रोदय-नियम देता है।

चाँद न दिखे तो?

पंचांग के चंद्रोदय-समय पर उसकी दिशा में अर्घ्य देना परंपरा में ठीक माना जाता है।

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